सामाजिक सरोकार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सामाजिक सरोकार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

सहायता की व्यथा...

 हमारी कॉलोनी में एक बुजुर्ग महिला प्लास्टिक का कट्टा (थैला) उठाये अक्सर चली आती है घर के बाहर झाड़ू लगाने या सफाई करने की आवाज लगाते. पूरी तरह सीधे भी खड़ी नहीं हो पाती उस स्त्री को देखकर करूणा उपजती है कि क्या कारण होगा जो इस उम्र में वह इस तरह शारीरिक श्रम कर पैसे कमाना चाहती है. पहले सफाईकर्मी नहीं होने के कारण उसे कई घरों में काम मिल जाता था परंतु इधर लगभग डेढ़ दो वर्ष से  उन्हें काम नहीं मिलता अधिक.  कुछ उनकी शारीरिक अवस्था देखकर भी लोग काम नहीं देते। मेरी एक सखी जब तब उनकी सहायता कर देती है थोड़ा बहुत काम करने पर . ऐसे ही इधर काफी समय से कुछ सफाई का कार्य नहीं होने के कारण उन्हें यूँ ही दस बीस रूपये दे दिया करते. अब होता यह कि वे हर तीसरे दिन चक्कर लगाने लगीं. 

बरसात के समय में हमारी तरफ सड़क का ढ़लान होने के कारण आगे से  बहुत सारी मिट्टी बहती हुई यहाँ इकट्ठी हो जाती है जिसे मैं स्वयं ही उठा लेती हूँ . मगर एक दिन उन बुजुर्ग स्त्री के आने पर मैंने उन्हें पूरी मिट्टी उठाकर बाल्टी में भर देने को कहा क्योंकि इसमें अधिक श्रम की आवश्यकता नहीं थी. मैं वहीं खड़ी होकर देख रही थी ताकि बाल्टी भरने पर स्वयं ही उठा लूँ जिससे उन्हें तकलीफ न हो. मैंने ध्यान दिया कि मिट्टी इकट्ठा करती कुछ बड़बड़ा रही थीं. पास जाकर पूछा तो बोली कि उधर किसी ने सफाई की थी इतने पैसे दिये, इतने लूँगी आदि आदि . 

मुझे मन ही मन हँसी आई कि इन्हें इतना भरोसा भी  नहीं कि जब मैं कुछ साफ सफाई करे बिना ही महीनों से कुछ न कुछ दे रही हूँ तो क्या अभी कुछ नहीं दूँगी . परंतु इस बार उनकी अपेक्षा बहुत अधिक थी.

मैंने कहा- माताराम, उनका तो आपने गिना दिया कि इतने दिये, उतने दिये. और मैं जो इतने समय से दे रही हूँ तो क्या अब आपसे काम करा कर भी नहीं दूँगी!

एकदम से उनके व्यवहार में नरमी आ गई - हाँ बाई, देओ थे तो.

खैर, काम करके अपनी अपेक्षानुसार पैसे लेकर वे चलीं गईं. बात यहाँ समाप्त नहीं हुई.  मुहल्ले के दूसरे सम्पन्न घरों को छोड़कर  कुछ समय से उनसे कुछ कम उम्र की स्त्री भी उनके साथ ही आती है. जब उनको दस-बीस रूपये दूँ तो कहती है - बाई मन्ने भी दयो थोड़ा पीसा!  जाने उनको कैसे गलतफहमी हो गई है कि बाकी सबकी तुलना में हम ही अधिक धनवान है. 

नतीजा पिछले कुछ समय से उनकी पुकार कई बार अनसुनी करनी पड़ रही है !

छोटी -मोटी सहायता की यह व्यथा है तो बड़े -बड़े मददगार, समूह किस तरह झेलते होंगे उन लोगों, समूह की अनपेक्षित अपेक्षा को....


बुधवार, 11 जनवरी 2017

कुछ तो करें हम भी.....

आज फिर से दरवाजे पर दस्तक थी खाना माँगने वाले की...एक बच्चा गोद में एक अँगुली पकड़ा हुआ....कानों में , गले में,  पैरों में आभूषण पहने हुए युवती को माँँगते देख दिमाग गरम होना ही था और मेरी किस्मत भी अच्छी थी कि वह मेरी बात सुनने को तैयार भी हो गई....
तुम्हें शर्म नहीं आती ....तुम्हें अपने बच्चों पर दया नहीं आती ....इन मासूम बच्चों से भीख मँगवा रही हो....
कुछ काम नहीं कर सकती...
क्या काम करें आँटीजी कोई काम नहीं देता....नोट बंद हो गये....
और जो चौराहे पर औरतें बच्चे गुब्बारे , अखबार और अन्य छोटी चीजें बेचते हैं...औरतें घरों में , दुकानों पर झाड़ू पोंछा करती हैं, खाना बनाती हैं....क्या वो पागल हैं....वे भीख नहीं माँग सकती थीं मगर उन लोगों ने इज्जत से रोटी  खाने का रास्ता चुना...तुम भी ऐसा कोई काम कर लो....
वह बिना कुछ बोले चली गई मगर मेरी आँखों के सामने ट्रैफिक लाइट पर अपनी गाड़ी के शीशे चढ़ाते लोग गुजर गये....
इन चौराहों पर छोटी -छोटी चीजें बेचने वालों की अनदेखी करते हम लोग ही इन्हें भीख माँगने पर मजबूर करते हैं...यदि हम रोज इनसे दस रुपये का सामान भी खरीद लें तब हमारे ज्यादा से ज्यादा 300 ही खर्च होते हैं मगर  इस तरह हम देश में भिखारियों की संख्या पर अंकुश लगाते हैं.....सड़क किनारे खाली कागज या कपड़ा बिछाकर सामान बेचते लोगों से वस्तु खरीद कर काम में लेना नागवार गुजरे तो इन्हें उन लोगों में भी बाँटा जा सकता है जिनके लिए यही बहुत बड़ी या दुर्लभ चीजें हैं....
इस तरह दोतरफा सहायता होगी ...पहले सामान बेचने वाले को और दूसरा जिन्हें वे चीजें प्राप्त होंगी....भीख माँगने वालों से घर के छोटे मोटे काम जैसे साफ सफाई , गेहूँ साफ करना, लॉन साफ करना, गमले में पौधे लगवाने आदि कार्य करने पर ही पैसे, खाना , कपड़े आदि दें ताकि वे स्वावलंबन का पाठ भी पढ़ें.... वृद्ध  अथवा लाचार की सहायता उनके सामर्थ्य को देखकर करें....

मंगलवार, 16 जून 2015

छोटू घडी नहीं उतारता..... समय को मुठ्ठी में रखना चाहता है !!


मध्यप्रदेश से गर्मी की छुट्टियों में धर्मेन्द्र अपने भाई के पास यहाँ आया हुआ है. मिस्त्री का काम करता है उसका भाई . सात भाई बहनो में सबसे छोटा धर्मेंद्र नवीं कक्षा में पढता है. गर्मी की छुट्टियों का उपयोग परिवार की अतिरिक्त आमदनी में मदद करता है. उसका भाई पास में ही दूसरी साइट पर काम कर रहा है .
छोटू (धर्मेन्द्र) का साथी बताता है कि ये उसके साथ काम नहीं करता . वहाँ भारी समान उठाते रहना पड़ता है इसलिये हम अपने साथ रख लिये.
प्रतिदिन 1100 में से 700 स्वयं रखता है और 400 छोटू को. दोनों एक ही गाँव के हैं.

पुरानी दीवार पर टाइल लगाना बहुत मेहनत का कार्य है . पहले पूरी दीवार को खरोंचना पड़ता है. पूरा दिन मेहनत करके भी कुछ काम दिखता नहीं . मालिक पूछ लेता है कि आज दिन भर क्या किये तो क्या बतायें.
मैं सोचती हूँ कि अब उसको क्या बतायें कि सब गृह कार्य अपने हाथों से दिन रात करने वाली गृहिणी से भी लोग कई बार पूछ लेते हैं कि सारा दिन क्या करती हैं.... कैसे टाइमपास होता है सारा दिन घर में....

अब तक कितने कमा लिये!!
 उसके साथ काम कर रहा कारीगर बताता है 4000 रूपये.
क्या करेगा इन पैसों का?
टूशन रखूँगा...
सोचती हूँ कि ट्यूशन मतलब स्कूल फ़ीस देना होता होगा. श्रमिक वर्ग की शिक्षा के प्रति यह रूचि सुखद लगती है.
श्रम और बुद्धि का मेल अति हितकारी है व्यक्ति के स्वयं के लिये, परिवार के लिये, समाज के लिये , राष्ट्र के लिये भी .
अच्छा... माँ के लिये क्या लेकर जायेगा...साडी?
क्या ले जायें... सकुचाते हुए कहता है . साडी वहीं खूब मिल जाती है.

मगर जयपुर जैसी नहीं मिलेगी न!

जयपुर में महँगी मिलेगी उसका साथी बोला
.
मैं उसकी बात मान लेती हूँ.  जयपुर महँगा शहर है . 28 वर्ष पहले जब जयपुर की धरती पर कदम रखा था तब भी मान लिया था. सबसे पहला सामना औटो रिक्शा से ही हुआ. हैदराबाद के मुकाबले दुगुना किराया ही नहीं  सेंडिल से लेकर खाना पीना तक भी  महँगा ही लगा था. तब से अब तक कहाँ -कहाँ घूम आये मगर धारणा वही सही साबित होती है आज भी.,
धर्मेन्द्र (छोटू ) से उसकी पढाई के बारे में बात करता देख उसके साथी कारीगर के चेहरे पर बेचारगी के भाव साफ़ पढे जा सकते थे. अपने स्थान पर खडा ही इधर उधर होता रहा बेचैनी में जैसे कि कश्मकश में हो कि यदि उससे पूछा जायेगा तो वह क्या जवाब देगा.
पूछ लिया उससे भी कि तुम कितना पढे हो.

हम नहीं पढे हैं!

ऐसे कैसे हो सकता है. यह सब नाप जोख करना , हिसाब लगाना , हिसाब से सेट करना कैसे करते हो!

ओही आठ तक पढे हैं खाली. हमारे पिताजी तभी खतम हो गये थे. कोई घर सम्भालने वाला नहीं था.उसीसे हमको पढाई छोड़ कर काम करना पडा. हम पंद्रह साल मद्रास मे काम किया. अब कुछ साल से यहाँ जयपुर में. मद्रास बहुत दूर पड़ता है. यहाँ से गाँव पास है. महीने में एक बार गाँव चल जाते हैं.
एक साँस में अपनी पूरी बात कहने के बाद  उसकी बेचैनी कम होती सी दिखी. जैसे उसने भी कोई परीक्षा उत्तीर्ण कर ही ली.

तभी बाहर दरवाजे पर कर्कश स्वर उभरा. बाहर जाकर देखा तो कान, नाक , गले , पैर में आभूषण पहने टेर लगाने वाली स्त्री को दो तीन बच्चे घेरे खडे थे . सोचती हूँ इनकी भी कूछ मजबूरी होती होगी. अपनी ही लिखी हुई कविता याद आ गई -
पेट की आग से
क्या बडी होती है
इनके तन की आग!
उसी समय मन की आंखों के आगे अखबार में छपी उस लड़की की तस्वीर आ जाती है जो बीमार पिता और भाई की तीमारदारी के बीच कई घरों में काम करते हुए भी मेरिट में स्थान लाती है.
पीछे खडे मजदूर, सामने खडी वह स्त्री और दिमाग में वह लडकी तीनों मिलकर जैसे किसी प्रोजेक्ट का विवरण सा खींच रहा हो कागज में. एक साथ मस्तिष्क कितने आयाम में विचरता है.

छोटू को देखती हूँ मुड़ कर . वह कभी अपने हाथ की घडी नहीं उतारता. पता नहीं किसी ने उसे उपहार दिया था अथवा अपने मेहनत की कमाई से खरीद लाया मगर उसका मोह देखते बनता है. काम समाप्त कर हाथ मुँह धोते या सीमेन्ट बजरी मिलाकर मसाला तैयार करते या कि सर पर रख कर परात उठाते समय हर समय घडी उसके हाथ में होती है . पूछा भी मैने क्या घडी खराब नहीं होती इस तरह...
इंकार में सर हिलाते हौले से हाथ फेरता है . चेहरे पर किंचित नाराजगी सी दिख पडी . जैसेकहीं उसकी घडी को नजर न लग जाये. जिन चीजों से हम प्रेम करते हैं हम कितनी बार उनके प्रति निर्मम हो जाते हैं .
मन से ही गूंजा - चीजों नहीं, इन्सानों से भी . व्यामोह की यह कौन सी दशा है... कैसी विवशता है!! भावनाओं के कितने रहस्य अबूझ होते है.  रिश्तों के उलझे धागे!!

करनी, फीता, धागा, हथोडा जल्दी जल्दी थैले में डालते छोटू की हड़बडी पढती हूँ. दिन भर के श्रमके बाद हाथ में आये हरे नोट की चमक उसकी मासूम आंखों में लहराती है हरियाली सी. 
छोटू घडी नहीं उतारता. समय को मुठ्ठी में रखना चाहता ही नहीं, प्रयास भी करता है . श्रम भी करता है. ईश्वर इन छोटूओं का स्वयं पर विश्वास डिगने न दे. सफल ता हासिल हो इसी ईमानदारी और श्रम की पीठ पर सवार होकर.
एक नि:शब्द दुआ निकलती है दिल से!!





गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

"आख़िर लाचार कौन था ...??"

 महिलाओं की दान प्रवृति और अपाहिजों तथा गरीब ,लाचारों की मदद कर अपना यह लोक और परलोक एक साथ सुधारने की मानसिक संतुष्टि धार्मिक स्थलों पर अपाहिजों , लाचारों और भिखारियों के संख्या में दिनोदिन बढोतरीकरने का एक मुख्य कारक है, हालाँकि इन्ही महिलाओं को अक्सर पसीने से भीगे हांफते   रिक्शाचालकों व मेहनत से रोजी -रोटी कमाने वाले सब्जी के ठेले वालों से एक -दो रुपये के लिए सर फुट्टवल करते देख वह आश्चर्य में पड़ जाती है ।

वृंदा भी बहुत पसीजती थी और घर के दरवाजे पर अपने भूखे बच्चों के लिए खाना मांगने वाली की आर्त्र पुकार को अनसुना नही कर पाती। उसकी करुणा देखकर खाने की गुहार वस्त्रों और चप्पलों तक जा पहुँचती।

"देख बाई ..बच्चा कैसे सियां मरे है ..कोई टाबरों का फटा पुराना गरम कपड़ा ही दे दे।"

वृंदा की आँखों के सामने बच्चों की पुराने कपडों की पोटली घूम जाती और उसे रुकने का इशारा कर अन्दर भागी चली जाती ,तब तक उस मांगने वाली को पुरानी चादर और चप्पलों की जरुरत महसूस हो जाती। उसकी इस आदत पर पति और बच्चे बहुत हँसते ..
"देखना किसी दिन हमारे नए कपड़े भी यूँ ही गायब मत कर देना "

इधर एक मांगने वाली हर दो या तीन दिन बाद आ धमकती। वृंदा भी उसे कभी खाली हाथ नही लौटाती और अपने परिवार के फलने फूलने की आशीष लेती फूली ना समाती । खाने से होते हुए चादर, चप्पलें , पुरानी साड़ी , खाली डब्बे कब उसकी भेंट चढ़ जाते , ख़ुद वृंदा को भी पता नही चलता...

मगर जब अगले ही दिन बच्चों को बिना चप्पल देख वृंदा इस बाबत कोई प्रश्न करती तो जवाब मिलता ...

 बाई ... इसका भाई सियां मरे था ..इसको तो गोद में भी टांग लूंगी " और वृंदा घर में और पुराने चप्पल जुटे  ढूँढने में लग जाती।  मगर जब एक दिन कस्बे में मंगलवार को लगने वाले विशेष हाट बाजार में उसी औरत को बोली लगाकर मांगे हुए वस्त्र आदि बेचते हुए देखा तो उसे बहुत गुस्सा आया । अब किसी मांगने वाली को कुछ भी नहीं देने का फैसला कर बैठी पर  जब अगले ही दिन वह महिला अपने  भूखे नंगे बच्चे के साथ उसकी चौखट पर आ खड़ी हुई तो उसका फैसला धरा का धरा रह गया ।
वह सोचने लगी आखिरकार भूख और लाचारी ही तो उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करती है।

 कुछ अनमने मन से लॉन में बिखरी हुए सूखे पत्तों की ओर इशारा करते हुए उसने कहा.

मैं अभी खाना लेकर आती हूँ , तब तक तू यह कचरा समेट ले "

जब खाना लेकर वृंदा बाहर आयी तो वह मांगने वाली जस की तस वहीं खड़ी मिली। अब तो वृंदा भी अड़ गयी ।

तुझे खाना तभी मिलेगा , जब कुछ काम करेगी।"
इतने में तो उसका बडबडाना शुरू हो गया ...

 बाई ...मेरे से तो ना होवे सफाई ...रोटियों पर इतना गुमान ... और घणी मिल जावेगी "

और पडोसन के दरवाजे की घंटी बजाकर अलापना शुरू कर दिया । जब पडोसन खाना लेकर आयी तो उसे ढेरों आशीष देती हुए वृंदा को मुंह चिढाती -सी सर्र से निकल गयी। वृंदा खड़ी मुंह ताकती रही .

"आख़िर लाचार कौन था ...??"







शनिवार, 1 मार्च 2014

किसी ने कहा था - अपना हाथ जगन्नाथ !!


रे ईर्ष्या! तू न गयी मन से रे . मन का क्या कहें , जितना समझाए कोई की मद , मोह , ईर्ष्या , लालच के फेर में मत पड़ रे बन्दे , मगर मन पर किसका अंकुश है . उस पर स्वयं ईश्वर की भी नहीं चलती . उस ईश्वर के भय के मारे व्यक्ति कोई ऐसा कार्य नहीं करे जो उसके मोक्ष में बाधक हो , मगर व्यक्ति अपने मन में क्या करे , ईश्वर भी ना ताड़ सके . वैसे भी बाबा तुलसीदास कहते भये कि कलियुग में मानसिक पाप का दोष नहीं लगता . सो कभी कभार हो जाने वाली मानसिक ईर्ष्या का सुख ले लेवें हम भी !
सखिन लोग बड़ा माथ जोड़ जोड़ कर बतियाती है हमारी कामवाली बाई ऐसी , उसकी कामवाली बाई ऐसी . इ बात और है की उसी समय कही किसी गली में कामवाली बायीं भी माथा जोड़े करती होंगी , हमारी मालकिन ऐसी ,हमारी मालकिन वैसी ! जो हो सो हो , ऐसी निंदा के लिए एक कामवाली बाई का होना भी तो जरूरी है , और वो तो हमरे पास है नहीं !

मायके में हमेशा कामवाली बाइयों को काम करते देखा या फिर घर के काम में सहयोग करने वाले छोटे बच्चों को ,मगर ससुरारी आये तो पता चला की हियाँ सब लोग को अपने हाथ से ही काम करने की आदत है . यह सिर्फ गिने चुने घरों की बात नहीं थी , मध्यमवर्गीय तो क्या , बहुत से उच्चवर्गीय परिवारों में भी लोगो को स्वयम ही गृह कार्य करते पाया . सबसे ज्यादा दिक्कत तो हुई बर्तन साफ़ करने में , जिठानी जी बोले इनको और मलो तो राख से सने हाथों की दुर्गति देख कई बार तो मन किया उठा कर बर्तन फेंक ही दें किसी के सर पर. उस पर सासू माँ की ताकीद कि अपने जूठे बर्तन अपने से किसी बड़े को छूने न दे ,  वैसे नई बहू के खांचे में फिट बैठने के लिए काम तो सारे मुस्कुराते हुए ही करते रहे :) . मगर अब तो ऐसी आदत हो गयी है कि बिना उचित कारण के यदि कामवाली बाई के भरोसे ही रहना पड़े तो जीना दूभर हो जाए . लोग विदेशियों की शानशौकत भरी जिंदगी का वास्ता बड़े मजे से देते हैं , मगर भूल जाते हैं कि वहां लोग अक्सर अपने कार्य स्वयं ही करते हैं . फर्क ये है कि वहां घर का प्रत्येक सदस्य अपना योगदान देता है , भारतीयों की तरह पूरी जिम्मदारी सिर्फ गृहिणी पर नहीं छोड़ी जाती .

पिछले वर्ष अपने शहर जाने का मौका मिला तो एक सहेली के घर जाने पर सीढियों में जूठे बर्तनो का टब स्वागत करते मिला . पता चला की बाई दस और ग्यारह के बीच में आएगी , तब तक रात के जूठे बर्तन कौन मांजे . अन्दर से नए बर्तन निकाले जाते रहे ,, जिन्हें साथ के साथ धो पोंछ कर रखा गया . हमने पुछा भाई ये माजरा क्या है , तो बोले कि एक्स्ट्रा बर्तन होने पर बाई बड़ी किटकिट करती है . अब मेहमान के सामने ये बात आ जाए तो अगला पहले ही सोच समझ कर जाए या फिर यह कोशिश करे की उनके कारण ज्यादा बर्तन जूठे न हों . हमको भी याद आया एक दिन मायके में बाई की किटकिट पर ही लड़ पड़े हम कि क्या शादी के बाद मायके आना ही छोड़ दे तुम्हारे कारण !
हालाँकि कुछ समय के लिए गृह सेवक /सेविका की सुविधा का उपयोग करना भी पड़ा . उस  बच्चे को माँ बाप ने भेज दिया शहर में अच्छी जिंदगी के लोभ में . अपनी पढाई के साथ उसे पढ़ाने बैठाती मगर उसकी रूचि पाककला में ही अधिक रही कि किसी अच्छे ढाबे या होटल या किसी बड़े घर में काम मिल जाये . उस समय खीझ होती थी , मगर अब लगता है कि व्यावहारिकता का तकाजा उसका यही रहा होगा . भूखे को दो रोटी से अधिक क्या सूझता है /सूझेगा ! 
 तो बात हो रही है काम वाली बाइयों की . अरे नहीं, बात है शायद हम हिन्दुस्तानियों के आरामपसंदगी की . यदि भारत में  पुरुषों से गृह कार्य में सहयोग करने को कहा जाए तो झट कह दे , काम वाली बाई क्यों नहीं बुला लेती . हालाँकि मैं क्षेत्रीयता पर बात करने से परहेज करती हूँ मगर  बिहार और उत्तरप्रदेश के मुकाबले राजस्थान में पुरुष वर्ग गृहकार्य में हाथ बंटाने में संकोच नहीं करता. जयपुर के शहरी इलाके में बहुत कम घरों को काम वाली बाइओं के दर्शन नसीब हो पाते थे , चारदीवारी से बाहर फैले क्षेत्र में जहाँ बड़ी संख्या में दूसरे प्रदेशों से आये लोग निवास करते हैं , विशेष कर बिहार , बंगाल और उत्तरप्रदेश से , उनके घरों में अक्सर कामवाली बाईं ही संभालती है घर और इनमे बड़ी संख्या शरणार्थी बांग्लादेशियों की लगती है . यह सिर्फ मेरा अनुमान हो सकता है , संभव है की ये औरतें पश्चिम बंगाल से काम की तलाश में यहाँ आई हो . 
सोचती हूँ कि राजस्थान जैसे अपेक्षाकृत सूखे स्थानों पर मध्यमवर्गीय परिवारों में घर घर काम करने वाले बाशिंदों की कमी का कारण क्या रहा होगा !! यहाँ लोग अधिक स्वाभिमानी है , या श्रम का उचित पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं या फिर उत्तर भारत जैसा आय वर्ग विभाजन नहीं है !!
इसके उलट उत्तर प्रदेश , बिहार और बंगाल जैसे उपजाऊ इलाकों में खेती एक बड़ा उद्योग है , जहाँ श्रमिक वर्ग की आवश्यकता अधिक है , वहां से ये लोग घर बदर हुए यहाँ श्रमिक बन जीवन यापन करने को क्यों मजबूर है ! 
शायद उन प्रदेशों में श्रमिकों को उचित मानदेय अथवा सम्मान नहीं मिल पाता. कृपया जाति विशेष की दयनीय स्थिति का तकाजा मत दीजियेगा क्योंकि यहाँ बसने वाले श्रमिकों ,  कामगारों की बड़ी संख्या तथाकथित उच्च जातियों की है !
किसी  भी बहाने से कुछ लोगो की रोजी रोटी चलती है तो सही भी है . श्रम सहित जीवन यापन उस जीवन से हर प्रकार श्रेष्ठ है जहाँ गुलामी में सौ पकवान है !

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

बच्चों को खूब पढ़ाया लिखाया , मगर अपनी सोच का क्या किया ……

घर क्या होता है 
तुम क्या जानो 
तुम जानते हो जमीन के छोटे बड़े टुकड़े 
कमरा इतने फीट बाई इतने फीट 
कैसे बताऊँ - इसे घर नहीं कहते !
घर एक एहसास है 
जहाँ किसी एक का ज़ख्म 
दूसरे की तकलीफ बन जाता है 
घर वह नहीं
जहाँ रोटी की कीमत आंकी जाती है
घर -
ज़रूरी नहीं कि आलीशान हो !
छोटा हो
पर प्यार से भरा हो
जहाँ बचपन, सपने, खिलौने
सब एक साथ रजाई में दुबककर सोते हों
सुबह होते शोर हो
'आज कौन चाय बनाएगा'?
और फिर एक ख़ामोशी पसर जाए
थोड़ी देर बाद माँ की आवाज आए
'मैं ही बना लेती हूँ'
और फिर धम धम कोई रसोई तक जाये बड़बड़ाते हुए
'इमोशनली ब्लैक मेल करती हो !'
और पूरा घर खिलखिलाने लगे ....
घर ऐसा होता है !
(रश्मि जी की वॉल से चुराया हुआ)
-
 Rashmi Prabha

कुछ दिनों पहले  रश्मिप्रभा जी ने फेसबुक पर घर को घर बनाने वाली स्नेह पगी मीठी सी कविता पोस्ट की। उनके स्नेह और वात्सल्य से अभिभूत हम धड़ल्ले से चोरी /डाका डालने में अपराध नहीं समझते सो बाकायदा अपने फेसबुक वॉल पर भी चिपका दिया । गुदगुदाया मन फिर भी आशंकित हुआ कि घर के भीतर इमोशनली ब्लैकमेल माताएं अथवा पुत्रियां ही अधिक होती है। इसी सोच के आलोक में कुछ परिवार आँखों के सामने आये , जिनसे कुछ समय पहले या अक्सर मिलना -जुलना होता रहता है। 

पतिदेव का अपना ही शहर है ,  एक ही विद्यालय/मोहल्ले /ऑफिस  में साथ रहे /पढ़े लोगों का विस्तृत दायरा है मगर व्यस्त शहरी दिनचर्या में रिश्तदारों , परिचितों , मित्रो आदि से मिलना जुलना किसी ख़ास पारिवारिक कार्यक्रम अथवा कोई कार्य होने पर ही हो पाता है।  एक ही शहर में होने के बावजूद कई वर्ष गुजर जाते हैं हालाँकि फोन/मोबाइल /इंटरनेट  की सुविधा के कारण बातचीत होती रहती है। कुछ सप्ताह पहले वीकेंड पर परिचितों से मेल-  मिलाप का कार्यक्रम बना। 

मित्र केंद्रीय सेवा में हैं तो उनकी पत्नी बैंक में अधिकारी है। एक ही पुत्र है जो अपनी उच्च शिक्षा /करियर के लिए दूसरे शहर में रहता है , बस छुट्टियों में ही  आना  हो पाता है।  अच्छी लोकेशन में पार्क के सामने  मकान है उनका , बालकनी में खड़े उनकी पत्नी से कहा मैंने कि अच्छी जगह है , सामने पार्क है।  
पार्क है तो क्या , कभी सामने देखने का समय ही नहीं मिलता।  सुबह उठते ही रसोई नजर आती है , चाय -नाश्ता -खाना बनाया और भागे बैंक।  वीकेंड में देर से उठना , साप्ताहिक कार्य निपटाने में ही समय गुजर जाता है।  
नारी -शक्ति जाग उठती ही भीतर कभी  , तो  हम भी उसी भाव में ज्ञान देते हुए बोल पड़े ,  क्यों , इतने वर्षों में भाई साहब को नाश्ता बनाना नहीं सिखाया क्या। पत्नी सिर्फ मुस्कुराकर रह गयी। 
भाई साहब  तीखी नजरों से घूरते पतिदेव से मुखातिब हुए , ये क्या सिखा रही है मेरी बीबी को, हमारा झगड़ा करवाएंगी क्या। और दोनों मित्र खुल कर  हंस लिए। 
मैंने कहा उनकी पत्नी से , जागो नारी शक्ति और हम भी हँस  ही लिए !
 भाई साहब बड़े गर्व से बता रहे थे अभी ये नई गाडी खरीदी तो पुरानी पत्नी को दे दी। मैं समझती हूँ कि उनकी पत्नी की तन्खवाह उनसे कही अधिक ही रही होगी। 
पूरे समय मैं देखती रही , पानी लाने से लेकर जरुरी कागज़ , चश्मा , चाय पकड़ाते उनकी पत्नी ही चकरघिन्नी बनी रही। वर्षों से जानती हूँ इस परिवार को।  दोनों के बीच अच्छा सामंजस्य रहा है , कही कोई मनमुटाव या तानाकशी नजर नहीं आई।  यूँ तो भारतीय परिवारों में आम रहा है यह सब , मगर आजकल थोडा अखरता है।
   
एक और रिश्तेदार के घर जाना हुआ। संयुक्त परिवार था , सास -ससुर , बेटा बहू , पोता।  दो बेटे ही हैं उनके , इस परिवार में भी चाय पानी नाश्ता लिए श्रीमती जी ही चकरघन्नी बनी रही। अक्सर रश्क करते हुए कहती हैं , आपका अच्छा है , चाय -नाश्ता बेटियां सम्भाल लेती हैं. हैरानी अधिक इसलिए होती है कि  ये वह  महिला है जिन्होंने अपने घर में पिता और भाइयों को हमेशा माँ का हाथ बंटाते देखा है। 

एक और परिवार है , दो बेटे हैं उनके भी।  वे स्वयं  एकलौती पुत्री रही है , मगर मानसिकता वही , बेटियां सब कर लेती हैं , हमें तो स्वयं ही  करना पड़ता है।
 
एक और रिश्तेदार हैं।  दो पुत्रियों और एक पुत्र की माँ  अपने परिवार की एकलौती पुत्री रही हैं और उनकी संपत्ति की   इकलौती वारिस भी मगर जब अपना पुश्तैनी कार्य सम्भालने की बारी आई तो बड़ी बेटी के कार्य सँभालने की सम्भावना को सिरे  से  नकार दिया , यह कहते हुए कि व्यावहारिकता  का तकाजा यही है कि बेटा ही सम्भाले। 

एक और परिचित दो पुत्रियों और एक पुत्र की माता हैं।  उनका भरा -पूरा परिवार रहा छह बहनों और एक भाई का।  घर के काम में पति के हाथ न बंटाने  की शिकायत करती ये माताजी भी यही मानती है कि बेटियों को ही घर का काम सीखना है , बेटों का क्या है !!
 
ये सारे उदाहरण अच्छे- खासे पढ़े- लिखे परिवारों के हैं। माताएं भी पढ़ी- लिखी है , कोई सरकारी सेवा में हैं तो किसी का अपना व्यवसाय है। ये स्त्रियां पुत्र एवं पुत्रियों को रोजगार के लिए समान शिक्षा की वकालत तो करती हैं मगर घर के भीतर उनका अपना  दृष्टिकोण भिन्न है। 
  
कभी -कभी मुझे  लगने  लगता है कि पढ़ने- लिखने से आखिर होता क्या है !! अपने बच्चों को वकील , डॉक्टर , इंजीनियर , वैज्ञानिक , सीए आदि बना ले तो क्या , अपनी सोच का क्या करे। 
 
स्वयं पर भी संशय होने लगता है कि कही मैं भी पुत्रियों की माता होने के कारण ही तो निष्पक्षता की मंशा/भावना  नहीं रखती हूँ ! मानसिक स्थिति का उचित प्रकटन तो उन परिवारों में ही सम्भव है जो पुत्र और  पुत्री दोनों के माता -पिता है और उनके व्यवहार में अपनी संतान के लिए कोई भेद न हो , ना घर में , ना बाहर। 

क्या सच में पुत्र और पुत्री के जीवन को दिशा /शिक्षा देने के सम्बन्ध  में एक ही दृष्टिकोण सम्भव नहीं है !!! 

सोमवार, 6 जनवरी 2014

रोशनी है कि धुआँ .... (4 )

(तेजस्वी की कहानी को कम में समेटना चाहती थी , मगर नए किरदार जुड़ते जा रहे हैं , कैसे लिखोगी कम में , हमें अनसुना कर !
यह कहानी उपन्यासिका में ही परिवर्तित होती  प्रतीत हो रही है) . 

वायब्रेंट मीडिया हाउस में कार्यरत तेजस्वी के उत्साह पर सामान्यतः ऑफिस में होने वाली राजनीति ने उदासी के छींटे डाले।  घर से बाहर की विचित्र दुनिया से रुबरु  होते हुए तेजस्वी का सफ़र जारी है.

अब आगे --- 

माँ ने पहले से ही उसके सलवार कमीज हैंगर पर लटका रखे थे।  जल्दी तैयार हो जाओ ,हमें काफी देर हो चुकी है।  खाने के समय कार्यक्रम में पहुंचना अच्छा नहीं लगता। 

हाथ मुंह धोकर   क्रीम और पीले रंग के अनारकली सूट पहने आईने के सामने बाल संवारती तेजस्वी पर  मुग्ध दृष्टि डालते  माँ  ने थूथकारा डाला , नजर न लगे !

दोनों  कार्यक्रम में पहुंची तब तक महिला संगीत समाप्त ही होने को ही था।  लाया डाक बाबू लाया रे संदेसवा , मेरे पिया जी को भाये न बिदेसवा पर एक लड़की मंच पर थिरक रही थी। 
तेजस्वी और उसकी माँ  ने सीमा के पास जाकर सीमा को  बधाई  दी।
भड़कीले लाल रंग के सलवार कमीज में लकदक मिसेज वालिया चहकती हुई तपाक  से बोली ," हमने तो समय से अच्छा लड़का देखकर सगाई कर दी , अब आप भी तेजस्वी के लिए लड़का  देखना शुरू  कर दो।  बराबर- सी ही तो  हैं दोनों।
माँ ने कुछ कहा नहीं , सिर्फ मुस्कुरा कर रह गयी।  

 संयोगवश सीमा का जन्मदिन भी था उसी दिन।  मंच के पास ही केक काटने की तैयारी  भी थी। सीमा और उसका भावी पति सौरभ मंच के सबसे आगे एक सुन्दर झूलनुमा बेंच पर साथ बैठे थे। उस  मंच के सामने लगी बेंच पर पीछे की तरफ बैठ कर दोनों संगीत का आनंद ले रही थी। मिसेज वालिया चहकती हुई बता रही थी ,  सीमा के ससुर बहुत खुश  हैं इस रिश्ते से , केक पर सजावट उन्होंने अपने हाथों से की है।  कहने लगे कि मेरी बहू लाखों में एक है तो इसका तोहफा तो मैं ही सजाऊंगा। अभी थोड़ी देर पहले ही नृत्य के लिए बहू का हाथ पकड़कर स्टेज पर ले गए। पूरे परिवार ने साथ नृत्य किया। ख़ुशी में उनकी आँखें छलछला रही थी।

संगीत के बाद केक काटा गया ,  वर- वधू  को अंगूठी पहनाई गयी, मेवा -बताशे से गोद भरी गयी। पूरे कार्यक्रम में सीमा के स्वसुर का उत्साह देखते बनता था।  बहू का हाथ पकड़कर केक कटवाने से लेकर अंगूठी पहनाने  तक वे साये की तरह सीमा के आसपास ही मंडराते नजर आ रहे थे।  महिलाओं की खुसुर- पुसुर चालू थी , बहुत खुशकिस्मत है सीमा।

रोशनी  , संगीत , उल्लासमय वातावरण , अच्छा भोजन , घर लौटते तेजस्वी का मानसिक तनाव काफी कम हो चूका था, मगर माँ कुछ अनमनी -सी दिख रही थी।
 क्या  हुआ माँ  , तुम्हे कैसे लगे सीमा के ससुराल वाले।  
कुछ नहीं।  अच्छे हैं।  शोरशराबे से थकान हो जाती है मुझे !
निकलते समय कॉफी पी लेनी थी।  कोई नहीं , घर चल कर पी लेते हैं। 

घर आकर माँ काफी देर तक सीमा के श्वसुर  के अत्यंत उत्साही व्यहार पर सोचती रही , मगर किसी से कहा कुछ नहीं। 
गहराती रात में खिड़की के परदे सरकाकर बाहर चाँद निहारते तेजस्वी भी सोचती रही देर तक।  हर दिन एक अँधेरे में डूबता है और सवेरा फिर सूर्य की रोशनी में जगमगाता। यूँ तो अँधेरा किसे भाता है मगर  चांदनी रात में अँधेरा भी कितना सम्मोहक होता है , रोशनी भी आँखों को चौंधियाए नहीं तभी भाती है वरना  तो वेल्डिंग मशीने भी कितनी किरणे बिखेरती है , आँखों पर चश्मा न हो तो आँखे खराब। 
क्या -क्या सोचने लगी वह।
लैंप की बत्ती बुझा सूर्य के संतुलित प्रकाश की  सम्भावना लिए नींद पलकों पर भारी हो आई। 

आलिया के केबिन में अनाथाश्रम , बालश्रम ,  बालश्रमिकों के शोषण आदि  विषयों पर चर्चा करते हुए तेजस्वी की नजरे बार -बार टेबल पर रखी   लाल फ़ोल्डर वाली फाईल पर टिक जाती।  उसका हेडिंग  जाना -पहचाना सा लग रहा था।  चर्चा समाप्त होकर कमरे से बाहर निकलते आखिर उसने फाईल उठाकर पलट ही ली।  वह शक्ति सदन की विस्तारित  रिपोर्ट थी जिस पर प्रस्तुतकर्ता का नाम पढ़ा उसने - सिमरन बर्वे। तेजस्वी हतप्रभ उदास सी  कमरे से बाहर निकल आयी।  उसका प्रोजेक्ट किसी और  नाम से पूर्ण हो चूका था।
सिमरन ने भी काफी काम किया था इस पर , एक गहरी सांस लेकर तेजस्वी ने स्वयं को समझाया मगर मित्रता का यह नया रूप देखकर तेजस्वी चकित थी।  सिमरन के साथ ही उसे सुचित्रा के व्यवहार पर  भी अचम्भा हो आया था। स्वयं मन को टटोला उसने , दृढ महिला के रूप में उनकी छवि में क्या बचा रह गया था उसकी समझ से परे।  उसे समझ आने लगा था कि  घर से बाहर की दुनिया बहुत विचित्र है।  माँ -पिता  की समझाइशें इतनी व्यर्थ नहीं थी।   

वह सिमरन के साथ अपनी मित्रता के पलों को स्मरण करती रही। एक दिन उसके लिखे  आलेख  पर बहस करते  अंग्रेजी में धाराप्रवाह अपने विचार प्रस्तुत कर रहे मनीष को  सिमरन ने  उसे टोका था  , क्यों अंग्रेजी झाड़ रहे हो , उससे क्या फायदा होगा , तुम्हे पता नहीं कि तेजस्वी हिंदी मीडियम से है। 
साथियों के होठों की दबी मुस्कान के साथ  सिमरन  का विजयी भाव उसे सब समझा तो रहा था , मगर आँखों पर बंधी मित्रता की पट्टी ने उसे बतौर  मजाक अथवा  टांग खिंचाई जैसे ही लिया था। जब -तब बहनजी कह देना भी वह इग्नोर ही करती आई थी। 
पीछे छोड़ आये कुछ और पन्ने भी उलटे उसने। उसने सोचा फिर से, एक लेख पर मनीष की उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया पर भी सिमरन का व्यवहार अखरना चाहिए था उसे।  एक साथ ही संस्कृत , हिंदी ,अंग्रेजी और उर्दू भाषा पर अपनी तीव्र पकड़  के साथ प्रखर प्रतिभाशाली मनीष अपने साथियों ही नहीं ,वायब्रेंट मीडिया हाउस से जुड़े  पाठकों , दर्शकों में भी अत्यंत लोकप्रिय था। अपने कार्यक्षेत्र में प्रगति करते विद्वानों की प्रशंसा बहुत मायने रखती है , तेजस्वी फूली नहीं समा रही थी मगर सिमरन ने विशेष कुछ भी कहा नहीं था बल्कि स्वयं की अन्य उपलब्धियों के बारे में बात करते विषय ही बदल दिया था।  

यह सब कुछ अखरा क्यों नहीं उसे , तो क्या मित्रता के रिश्तों में  अब तक वह सिर्फ मूर्ख ही बनती  आई थी, सोचते स्मृतियों के तार  उलझते जाते थे. खैर तेजस्वी को अटकना नहीं था , आगे ही बढ़ना था।  नाम तेजस्वी यूँ ही तो नहीं रख गया था।  

 बाल श्रमिकों की वर्त्तमान स्थितियों पर अपनी खोज पर कई हैरतअंगेज चौंकाने वाले तथ्य  उसके सामने थे।   बाल कल्याण के लिए निर्मित की जाने  वाली सरकारी संस्थाओं के आंकड़े मानवता को शर्मसार करते नजर आते थे। बाल  कल्याण के लिए निर्मित विभिन्न आश्रय स्थलों से भागने अथवा गायब होने वाले बच्चों की संख्या उसे विस्मित कर रही थी।  दर दर भीख मांग कर गुजर करने वाले बच्चे इन सुविधाजनक आश्रय स्थलों पर टिकना क्यों नहीं चाहते , क्यों बार- बार भागने के प्रयास करते हैं , सम्मान पूर्वक मिलने वाला भोजन और आश्रय इन्हे क्यों नहीं सुहाता , घर पहुँचते , खाना खा कर विश्राम करते भी उसके दिमाग में प्रश्न अटके ही थे।  

चींचीं के मधुर कलरव से नींद खुली उसकी , नारंगी आभा के साथ सूर्यदेव प्रकट हुआ ही चाहते थे , माँ बालकनी में पक्षियों के लिए अनाज और पानी रख कर आयी थी। बहुत बचपन से माँ को  पक्षियों को दाना खिलाते देखा है उसने। दाना चुगने आती नन्ही चिड़िया , कबूतर , तोते उसे सदा लुभाते रहे थे। एक बार  पिंजरे में पक्षी पालने के लिए वह कितना मचली थी , मगर माँ ने सख्ती से मना कर दिया था। तेजस्वी को समझाया था माँ  ने कि पंछी तो उड़ते- फिरते ही लुभाते हैं , तुमने देखा नहीं उन्हें , वे यहाँ रखें पानी और दाने से ज्यादा इधर -उधर बिखरे हुए दाने  या बहते पानी की ओर ही अधिक भागते हैं। घायल पक्षी के संरक्षण के लिए बेहतर स्थान उपलब्ध करवाना उचित है , मगर आकाश में उन्मुक्त उड़ते पक्षी को पिंजरे की कैद में रखना आमनवीय है। ये पक्षी मनुष्य से अधिक स्वतंत्रता प्रेमी होते हैं !

पक्षियों की चहचहाहट के बीच उसे आश्रम के बच्चों का ख्याल हो आया  और अपना  कार्य भी।  उसे बाल विकास मंत्रालय से जुड़े आश्रयस्थलों और  बाल भवन के अतिरिक्त कुछ स्वयंसेवी संस्थानों से भी जानकारी प्राप्त करनी थी। ऑफिस में मनीष व अन्य साथियों के साथ  ग्रुप डिस्कशन के बाद उन्होंने अपनी खोज की रुपरेखा तय की और उत्साही  कदम चल पड़े एक नयी मंजिल  की राह पर  । 


क्रमशः  
रुकावटें  जीवन का सहज हिस्सा है, कई बार इंसान टूट जाता है , बिखर जाता है तो कई बार दृढ बनता है .... 

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

प्रगतिशीलता बनाम पूर्वाग्रह …

"राँझणा फिल्म  में एक दृश्य है --  जे एन यू में पाईप के सहारे चढ़ते को एक प्रगतिशील ग्रुप के छात्र देख लेते हैं और चोर समझ कर पुलिस के हवाले करने  से पहले काफी विमर्श करते हैं कि इसका क्या किया जाए . यह इस तरह पाईप पर क्यों चढ़ रहा था !
 पुलिस को सौंपने का तात्पर्य कि हम सिस्टम पर भरोसा कर रहे हैं जबकि हमें सिस्टम का विरोध करना है . इसकी गरीबी का कारण अशिक्षा है आदि -आदि  . 
अंग्रेजी में  गरीबी और अशिक्षितों पर हो रहे इस विमर्श के बीच नायक कहता /सोचता है -- इस समय मेरी सबसे बड़ी समस्या भूख है और उसका हल  चाय -समोसा है।  (निर्देशन की कुशलता से इस दृश्य की और अधिक मारक बनाया जा सकता था )

सामाजिक समस्याओं पर होने वाले विमर्श की परतें उधेड़ता बहुत ही मारक है यह दृश्य। हमारे देश /समाज में होने वाले अधिकांश विमर्शों की यही दशा /दिशा है।  गरीबों और मजदूरों की समस्याओं पर पर विमर्श होता है फाईव स्टार होटल या होटल जैसी ही सुविधाओं वाले एयरकंडीशंड कमरों में खाए पिए अघाए व्यापारियों द्वारा . देश के ग्रामीण अशिक्षितों की समस्याओं पर विचार होता है महज अंग्रेजी में ही गिटरपिटर करते डिग्रीधारकों द्वारा।  विमर्शकर्ता  इन विमर्शों की सीढ़ी  चढ़ते  पहुँच जाते है समाज के उच्चतम श्रेणी में और  जिस पर विमर्श किया जा रहा है वह अनगिनत वर्षों से वहीँ  का वहीँ जमा। विमर्श जिस पर किया जा रहा है ,  उन्हें इन विमर्शों में शामिल किया जाता , उनकी भी राय ली जाती तो शायद इन विमर्शों का स्वरुप कुछ और होता. समस्या वास्तविक धरातल पर समझी जाय तब ही  उसका निराकरण संभव है।  

यही हाल स्त्री और उससे जुड़ी समस्याओं के विमर्श का है।  इस  करवा चतुर्थी  पर भी प्रगतिशीलों का विमर्श बदस्तूर जारी रहा  . एकतरफा घोषणा या दिशा -निर्देश जारी करने  से पहले  इन रस्मों को धारण /निभाने वाली स्त्रियों की राय तो ले लेते कि वे चाहती क्या हैं  या शायद इनके लिए इन स्त्रियों की राय मायने नहीं रखती क्योंकि व्रत उपवास का मतलब पति की गुलामी करना ही होता है।  यह मान  बैठना कि व्रत /उपवास करने वाली सभी विवाहित स्त्रियाँ बेड़ियों में जकड़ी है , एकतरफा  सोच है , पूर्वाग्रह है।   
 
आप जिनकी समस्या पर बात कर रहे हैं , दरअसल वे अपनी समस्याओं का हल किस प्रकार चाहते हैं , यह अधिक मायने रखता है. ना कि आप द्वारा थोपे गए विचार। जब आप धर्म विशेष द्वारा थोपी गयी धारणाओं का विरोध धूमधाम से करते हैं तो यह भी निश्चित होना चाहिए कि आप थोपे गए विचारों का विरोध करते हैं  , स्वयं  अपने विचार थोपते नहीं। जो कार्य आप नहीं करते वह दूसरे  के लिए लिए गुलामी ही हो यह आवश्यक नहीं।  मुश्किलें तब आती है जब सभी समस्याओं के  हल हम एकतरफा सोच के साथ करना चाहते हैं। या वे  शायद यह मान कर ही चलते हैं कि विवाहित स्त्रियाँ  का कोई वजूद / स्वतंत्र व्यक्तित्व ही नहीं है और यदि आप ऐसा ही मानकर चलते हैं तो आपसे मूढ़ और कोई नहीं।

(इस विषय पर कविता जी का यह लेख उल्लेखनीय है )

व्यक्ति की स्वतन्त्रता में विश्वास करने वालों को स्त्रियों को स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने में सहायता करनी चाहिए , ना कि अपनी बनी बनाई सोच परोसकर उसपर ही अमल करने की समझाईश।  

इसी प्रकार सामाजिक समस्याओं के हल सिर्फ अंतरजातीय विवाहों में ढूँढने वाले लोग भी  मुझे ऐसी ही एक तरफ़ा सोच वाले नजर आते हैं .  समाज के विरोधाभास पर प्रश्नचिन्ह लगाते  इन लोगों के   विचारों में कितना विरोधाभास है , ये स्वयं भी नहीं जानते।  एक और ये  सिर्फ प्रेम विवाह की स्वीकृति चाहते हैं  . दूसरी ओर इनकी धारणा  है कि विवाह अपनी जाति  धर्म में करना जाहिली है।  मतलब यह प्रगतिशील  समूह  सिर्फ यह मानकर ही चलते हैं कि दो इंसानों के बीच प्रेम तभी संभव है जब वे विजातीय हो। 
क्या यह भी अपने आप में एक भयंकर पूर्वाग्रह  नहीं है। 

हम सभी जानते हैं कि एक ही  या एक जैसे माहौल में रहने वाले लोग एक दूसरे  के साथ ज्यादा सुविधाजनक होते हैं।  क्या किसी शाकाहारी के लिए मांसाहारियों के साथ तालमेल बैठना आसान है ! पान सुपारी भी नहीं खाने वाले लोग क्या मादक द्रव्यों के सेवन करने वालों के साथ सुविधानाजक निबाह कर  सकते हैं ? यह सही  है कि व्यवहार या विवाह यदि प्रेम के लिए हो तो लोग तालमेल बैठाना /सामंजस्य /समझौता करना पसंद करते हैं …. यानि घूम फिर कर बात तो समझौते और सामंजस्य पर ही आई . विवाह या व्यवहार प्रेम /पसंद से हो या प्रायोजित !!

अब आँखें खोलकर बताएं कि पूर्वाग्रही कौन है ! एकतरफा सोच किसकी है !!

सोमवार, 24 जून 2013

महज आर्थिक स्वतन्त्रता ही स्वतंत्र व्यक्तित्व की परिचायक नहीं है !


गिफ्ट शॉप पर एक शाम पड़ोस की टीवी रिपेयरिंग की दूकान में  नजारा देखने को मिला . बड़ी सी कार खुद चला कर लाई महिला स्वय निर्णय नहीं ली पा रही थी कि टीवी ठीक होने के लिए यहीं छोड़ा जाय या नहीं . अपने पति से फोन पर बात की उन्होंने , फिर निर्णय किया कि टीवी वापस घर जायेगा फिर उनके पति ही उसे ठीक करवाएंगे , खैर , यह मामला  इतना संजीदा नहीं था इसके क्योंकि इसके कई और कारण हो सकते थे .

निम्नतम  आय वर्ग जैसे मजदूर , घरो में या खेती में काम करने वाली स्त्रियाँ , धोबी (प्रेस करने वाले ) इत्यादि  अक्सर कामकाजी या आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर ही माने जा सकते हैं  , मगर अक्सर उनकी तनखाह पर स्वयं उनका हक़ नहीं . घर लौटकर शराबी पति की मारपीट या खर्चा उनके हाथों में सौंप देना आम है .(हालाँकि अपवाद हर वर्ग में हैं !)   

मगर एक पारिवारिक चर्चा   में जब सामने बैठे एक परिचित कह बैठे - हमारा परिवार पुरुष प्रधान है ,घर/बाहर   से सम्बंधित कोई भी निर्णय मेरी स्वीकृति होने पर ही लिए जा  सकते हैं तो मेरा चौंकना स्वाभाविक था  .  भारतीय मध्यमवर्गीय समाज में परिवारों में घर परिवार से सम्बंधित महत्वपूर्ण आखिरी निर्णय पुरुष ही लेता है , यह सर्वविदित है मगर अक्सर परिवारों में महिला सदस्यों की राय लिया जाना भी सहज है इसलिए उनका  दम्भपूर्ण बखान मुझे अच्छा नहीं लगा . आखिर घर/ परिवार की प्रमुख धुरी स्त्री को नजरअंदाज कर  निर्णय कैसे लिए जा सकते हैं !! 
उनकी यह दम्भोक्ति उतनी अखरती नहीं यदि वह  कहते कि सारे निर्णय हम मिलजुल कर लेते हैं .  उक्त सज्जन की पत्नी सरकारी नौकरी में है ,पति के बराबर (बल्कि हो सकता है ज्यादा ही )   तनखाह लाती है , यानि घर चलाने में आर्थिक सहयोग उनका बराबरी का है , मगर घर में हक़ बराबरी का नहीं ??  

माने कि महज आर्थिक स्वतन्त्रता ही आपके स्वतंत्र  व्यक्तित्व की परिचायक नहीं है .  नौकरी और आमदनी आपको अपनी सुविधानुसार खर्च करने या घर से बाहर रहने में तो मदद कर सकती है , (हालाँकि इसमें भी शक किया जा सकता  है कि  खर्च भी वे अपनी इच्छानुसार कर सकती हों ) मगर आपके व्यक्तित्व को गढ़ नहीं सकती . 

 जो व्यक्ति /स्त्री इस प्रकार अपने अस्तित्व को महसूस करता है और दूसरों को उसके अस्तित्व को स्वीकारे जाने को बाध्य करे , व्यक्तित्व वही पूर्ण है . सिर्फ ऊँची डिग्रियां या कामकाजी होना आपके अस्तित्व और व्यक्तित्व की उपस्थिति  दर्ज नहीं कराता . व्यक्तित्व को पुष्ट करती है आपकी कार्यशैली , बिना डरे  /हिचके अपने विचार व्यक्त करने और महत्वपूर्ण निर्णय लेने में आपकी भागीदारी , वर्ना एक इंसान और रबर स्टाम्प में फर्क क्या रह जाता है !! 

स्त्रियों की अस्मिता , गौरव और आत्मसम्मान के लिए किये अभी कितना कार्य किया जाना शेष है , कभी -कभी बहुत निराशा होती है , लगता है कि एक गोल घेरे में ही घूमते चले जा रहे है हम सब , जहाँ से चले , वहीँ पहुँच जाते हैं !!


 आपकी राय का स्वागत है !

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

बातें है बातों का क्या ....


संवेदनाओं को झकझोरने वाली घटनाएँ इन दिनों आम है . ट्रैफिक  सिग्नलों पर लगे छिपे कैमरे आम जनता की संवेदनहीनता को बड़ी मुस्तैदी से रिकोर्ड कर उनका चेहरा बेनकाब करने में जुटे हैं  जैसा की अभी कुछ दिन पहले जयपुर में  एक दुर्घटना में घायल परिवार से राह से  गुजरते लोगों की संवेदनहीनता को उजागर किया . सुसंस्कृत और परम्पराओं से गहरे जुड़े होने वाले इस शहर की संकल्पना को जबरदस्त झटका लगा  . जागरूक नागरिक ठगा सा खड़ा सोचता ही रहा है कि आखिर हमारे अपने इस शहर के लोगों को हुआ क्या है.  संवेदनहीनता का ग्रहण  लगा कैसे !
एक भागमभाग लगी है इन दिनों . सबको चलते जाना है जैसे भीड़ का हिस्सा बनकर . कौन राह में खो गया , किसी को खबर नहीं और  ना ही जानने की उत्सुकता .   जब तक हमारे काम का है  तब तक पूछ है उसके बाद जैसे कोई पहचान ही नहीं ...गीत याद आता है " मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं , जा रहे हैं ऐसे जैसे हमें जानते नहीं ". इससे भी बढ़ कर यह की जिससे मतलब ही नहीं , उसे पहचाने क्यों !! 
कब घर कर गया यह चरित्र हम सबमें,  हमारे शहर  में , पता ही नहीं चला ....

मैं लौटती हूँ पीछे .  ज्यादा नहीं यही कोई लगभग दस वर्ष पहले ही घर से ऑफिस की डगर पर पतिदेव के स्कूटर को पीछे से टक्कर मारी जीप ने .  स्कूटर सहित गिरे तो बाएं पैर में वहीँ फ्रैक्चर नजर आया .  आस पास खड़े लोगो में से एक सहृदय ने उनके स्कूटर पर बैठकर घर छोड़ा और गेट से अन्दर तक गोद में उठा कर छोड़ कर गया . इस घटना से भी कई वर्षों  पहले  एक दिन राह चलते पुरानी  मोपेड में साड़ी अटकी और सँभालते हुए भी  आखिर गिरने से बचे नहीं . गोद में छह महीने की बच्ची साथ में , पटलियों में से साड़ी तार -तार . आस पास के घरों से ही एक महिला सहारा देकर अपने घर ले गयी .  अपनी साड़ी पहनने को दी .अजनबी होने के बावजूद उसे हिचक नहीं थी कि  पता नहीं मैं साड़ी वापस करुँगी भी या नहीं . 
खट्टे- मीठे , अच्छे- बुरे अनुभवों का सार ही है ये जीवन , एक पल में ही आशा टूटती है तो कोई दूसरा पल आस बंधाता  भी  मगर टूटन का समय और अनुभव अधिक लम्बा हो तो भीतर एक शून्य भरता जाता है ...
कैसे बदल गया यह  माहौल , यूँ ही तो नहीं ...
कुछ घाव कहीं तो लगे होंगे जिसने भीतर की करुणा के कलकल बहते स्त्रोत को सोख लिया . प्रशासनिक , सामाजिक ,आर्थिक मजबूरियां लग गयी है हमारे कोमल स्वभाव , परदुखकातरता को दीमक की तरह ...

शब्दों में लिख कर , बोल कर उस घटना की संवेदनहीनता पर खूब चर्चा कर लें मगर कैसे ...

क्या राह पड़े किसी राहगीर को घायल देखकर हम रुक पाते हैं ....रुकना चाहे तो याद आ जाते है वे किस्से  कि  रुके थे कुछ लोग जो अपना पर्स , घड़ियाँ , गंवाने के अलावा  मारपीट के भी  शिकार हुए . अविश्वास ही भारी तारी रहता है हर समय !

बदल गया है ये जहाँ ..हो हल्ला कर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने वालों का मजमा लगा होगा. वास्तव में भले किसी गिरे हुए को सिर्फ हाथ पकड़कर भी ना उठाया होगा  मगर नाम लाभ  लेने को तैयार ...प्रेम , करुणा , संवेदना पर सबसे अधिक चर्चा करने वाले वही जिन्होंने कभी कुछ किया नहीं हो  !
  
स्वयं द्वारा कभी की गयी इस  अनदेखी पर ग्लानि हो तो बात समझ आती है वर्ना तो सिर्फ शब्द है , बातें है...
बातें है बातों  का क्या !!

गुरुवार, 7 मार्च 2013

स्त्रियों का सिर्फ एक दिन.... वीमेंस डे पर विशेष

आज आठ मार्च है ,महिला दिवस ...मुफ्त बांटी जाने वाली रेवड़ियों की तरह एक दिन तुम्हारा भी ले लो , बाकी दिन तो हमारे ही हैं, क्या कहना चाहता है समाज हमसे .


न न ...मैं महिला दिवस की विरोधी नहीं हूँ , निरंतर घटती उनकी संख्याओं और सामाजिक उत्पीडन की बढती घटनाओं के बीच उनके जिन्दा मुक्त अस्तित्व को याद रखने वाला एक दिन तो आवश्यक है .
मगर क्या बस यह काफी है !!

हमारे समाजों ने , सरकारों ने बस हर गंभीर समस्या पर बस एक सतही दृष्टि डालनी शुरू कर दी है . बुजुर्ग उपेक्षित दिखें  , उनका एक दिवस मना  लो . परिवार अधिक टूटते हैं , एक परिवार दिवस.  महिलाये असुरक्षित नजर आती है तो एक दिवस उनके नाम सही ! समस्या की तह में जाकर उसका निदान , समाधान करने की ओर  कदम कब और कैसे बढ़ेंगे , इस पर कोई दूरदृष्टि नजर नहीं आती. एक दिवस मना लेना ही  सुरक्षा, समृद्धि और शक्ति  की गारंटी होती तो आये दिन इन घटनाओं की पुनरावृति नहीं होती . 

स्त्री इस समाज की एक स्वतंत्र इकाई है . स्त्री के सम्मान और सुरक्षा की व्यवस्था परिवार से , प्रत्येक घर से होते हुए समाजो और देश में विकसित हो , तब ही यह लम्बे समय तक कारगर है , वर्ना तो कुछ दिन का हो हल्ला , फिर वही ढाक  के तीन पात!

परिवार के सहयोग अथवा असहयोग से भी जो स्त्रियाँ  विभिन्न क्षेत्रों में आगे आकर अपनी पैठ बना चुकी हैं , स्वयं उनका अन्य महिलाओं के सम्मान और स्वाभिमान के प्रति क्या रवैया होता है , यह भी स्त्री समाज के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण हो सकता है , मगर एक स्तर पर अपने को सामान्य महिलाओं से अलग मान कर इनकी गोलबंदी होती है , बल्कि कई बार तो इनका व्यवहार असहिष्णुपूर्ण और असहयोगी होता है . बांटा जाता है उन्हें क्लास के नाम पर , जाति के नाम पर , धर्म के नाम पर क्योंकि जब तक वे बँटी   रहेंगी , उनकी मुट्ठी में होंगी . 
माफ़ कीजियेगा , यहाँ मैं पुरुषों की बात नहीं कर रही , उस पर तो प्रखर  नारिवादियाँ कह देंगी , लिख भी देंगी . 

मेरी शिकायत स्वयं स्त्रियों से हैं .

नारीवाद पर लम्बे चौड़े आख्यान लिख कर यदि ये अपने घर परिवार या समाज , देश की अन्य स्त्रियों के प्रति असहिष्णु हो जाती है तो इनका क्या औचित्य हुआ . नारी सम्मान पर चीखती स्त्रियों के पारिवारिक अथवा सामाजिक व्यवहार पर वे स्वयं ही एक चोर दृष्टि डालें तो असलियत सामने होंगी . नारीवाद का झंडा लिए कितनी स्त्रियाँ ऐसी होंगी जो अपने परिवार की अन्य स्त्रियों के स्वतंत्र व्यक्तित्व को स्वीकारते हुए उनको यथोचित सम्मान दे सके , दिला  सके . अपने लिए हक़ की मांग करती हुई इन स्त्रियों के बीच ही कुछ ऐसी स्त्रियाँ भी मिल जायेंगी जिनका अपनी सास अथवा बहू ही नहीं , अन्य स्त्रियों  के प्रति भी बहुत ही असम्मानजनक व्यवहार होता है . और ये स्त्रियाँ पढ़ी -लिखी  संभ्रांत परिवारों की हैं . दहेज़ विरोधी होने का मुलम्मा चढ़ाये कितनी स्त्रियाँ इस बात पर सहमत होंगी की उनके घर दहेज़ लिया या दिया नहीं जाएगा , नारी के लिए सम्पूर्ण स्वतन्त्रता   की मांग करने वाली कितनी स्त्रियाँ होंगी जिन्होंने अपने  परिवारों में भ्रूण हत्या का विरोध किया होगा , बताएं जरुर क्योंकि इस पर ही तो नारी सशक्तिकरण के आंकड़े तय किये जायेंगे . 

सैंतालिस वर्ष की उम्र में जब एक बुजुर्ग ने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया तो मैं चौंक उठी , क्योंकि उस परिवार में सबसे समृद्द और सबसे ज्यादा कमाऊ  उनकी सबसे छोटी पुत्री दूर शहर में पूर्ण आत्मनिर्भर जीवन यापन करती हुई उनके लिए विभिन्न सुविधाएँ जुटाती  रही है . उसी परिवार की एकमात्र पुत्रवधू सर पर आँचल लिए बड़े हो चुके बेटे के जूते लाने  से लेकर हर सदस्य की फरमाईश के अनुसार कार्य करने में जुटी रहती है . उक्त आत्मनिर्भर युवती की माताजी अपनी बहु के प्रति बेहद कठोर व्यवहार रखते हुए पोते के खाना पसंद नहीं आने पर थाली उठा कर फेंक देने जैसे बर्ताव को सही ठहराते हुए बहु के काम में मीनमेख निकालती मिल जायेंगी . 

ये  सिर्फ एक दो उदहारण है , ऐसे अनेकानेक मिल जायेंगे .  

यहाँ इसे लिखने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि   मैं सिर्फ लिखने के लिए नहीं लिखती . मुझसे असहमत होने से पहले जान ले कि ये जीवन के अनुभव है , महज किताबी ज्ञान नहीं . महज  कुछ गोष्ठियों में सम्मिलित होकर , नारी सशक्तिकरण पर भाषणबाजी कर हम किसी मुकाम पर नहीं पहुँच सकते.

"फिर कभी मांग लेंगे  दुनिया से हक़ अपना 
अभी तो लडाई घर में बड़ी लम्बी है "

नारियों के लिए स्वयं नारियां आगे आये , परिवारों और समाजों में अन्य स्त्रियों के अधिकार और विकास के लिए सहयोगी बने . परिवार में प्रत्येक स्त्री के सम्मान को स्वयं स्त्री ही सुरक्षित करे , अपने  अधिकारों पर बात करते हुए अन्य स्त्रियों के प्रति अपने कर्तव्यों को ना बिसराएँ , परिवार में स्त्री के विरुद्ध होने वाले अन्याय अथवा अत्याचार के खिलाफ डट कर खड़ी हो , स्त्री सशक्तिकरण  परिवार से  प्रारंभ होकर समाज ,देश और सम्पूर्ण मानवजाति तक पहुंचे  . प्रत्येक  स्त्री जड़ से शुरुआत करें , हमें किसी एक दिवस की आवश्यकता नहीं होगी , हर दिवस हमारा हो ....
यह स्वप्न पूर्ण होने की आशा रखते हुए फिलहाल इस "वीमेंस डे" की बधाई  भी स्वीकार कर लें !!

सोमवार, 16 जुलाई 2012

कब मिल पायेगा लड़कियों को एक सुरक्षित समाज ....


कहीं किसी शहर के एक कमरे (कमरा कहा है , कौन लोंग हैं --अंदाज़ा लगायें ) में कुर्सियां लगा कर विडियो पर फिल्म देखी जा रही थी  . दृश्य देखते अचानक इन्ही लोगों के बीच एक पत्रकार जैसा व्यक्ति  बदहवास- सा नजर आता है . साथियों के पूछने पर  कुछ नहीं कहता , अचानक उठ कर चल देता है . दूसरे दिन उस व्यक्ति की बहन  की  आत्महत्या की खबर अख़बारों में . 
नहीं जानती कितनी सच्चाई थी इन उडती -सी ख़बरों में , मगर इस तरह हुआ एक बेइन्तहा खौफनाक काण्ड का खुलासा जिसने सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न राज्य में अफरातफरी मचा दी  . जिस तरह परते खुलती गयी , लड़कियों की आत्महत्याओं की संख्या बढती गयी. 
सुनने में आया कि इस दलदल में लड़कियां अपनी मर्जी से जानबूझकर नहीं आई ...एक लड़की, उसकी सहेली  , फिर उसकी सहेली , किसी की ननद , किसी की भाभी , किसी की कोई  ...अपने बचाव के लिए दूसरे को फंसाने  से शुरू हुए इस  ब्लैकमेलिंग के  सफ़र की गिरफ्त में संभ्रांत परिवारों की जाने कितनी लड़कियां भंवर की तरह उलझती  गयी . 
हममे से शायद ही कोई इस तथ्य से अपरिचित होगा  कि एक सभ्य माने जाने वाले समाज में व्यापक स्तर पर ब्लैकमेलिंग क्यों कर संभव हो पाती है . लड़कियों/स्त्रियों के भीतर अपनी या परिवार की बदनामी का भय या फिर  अपने  अपने साथ हुई अनहोनी का जिक्र अपने परिवार से करने का साहस ना हो पाना,  साहस कर भी लिया तो दोषी उन्हें ही ठहराया जाना ...सबसे दुखद यह है ऐसे संगीन मामलों की शुरुआत अक्सर  नजदीकी रिश्तेदार , करीबी मित्रों से ही होती है .  
यदि उस दिन उस व्यक्ति ने वह विडियो नहीं देखा होता तो जाने यह सीरिज जाने कितनी लम्बी चलती .... जिन लोगों का जिक्र यहाँ हैं वे शायद अपनी ड्यूटी निभा रहे थे , मगर ऐसे लोगो की कमी नहीं है जो अपने शौक के लिए ऐसी  फ़िल्में देखते हैं और बड़े फख्र से मनोवैज्ञानिक कारणों का तर्क देते हुए उसका स्पष्टीकरण भी देते हैं . कहा जाता है कि जब लड़कियां खुद अपने आप को उघाड़ रही है तो हमें देखने में हर्ज़ क्या, बल्कि उन्हें बोल्ड होने की संज्ञा देते हुए उनकी प्रशंसा की जाती है . कितने ही तर्कों से इसे ढांकने की कोशिश की जाए मगर सच यह है कि इस तरह की फ़िल्में या साहित्य समाज में एक निम्न स्तर की घृणित उत्सुकता जगाती है जिसकी आंच उन बोल्ड/मजबूर  लड़कियों से होती हुई सामान्य घरों तक पहुँचती है . उच्च वर्ग की बोल्ड लड़कियां अंग प्रदर्शन कर  करोड़ों कमाती हैं मगर इसके बुरे साईड इफ़ेक्ट के रूप में सामान्य घरों की लड़कियां  या स्त्रियाँ उन निम्न स्तरीय निर्माताओं के हाथ की कठपुतली बनती है  जो कम पैसे खर्च कर करोड़ों कमाना चाह्ते हैं ,  लड़कियों की बोल्डनेस को ढाल बनाने वाले उपर्युक्त घटना से जान सकते हैं कि वे बोल्ड किस प्रकार  बनाई जाती है. घृणित उत्सुकता  सस्ते विकल्प के रूप में छिपे कैमरों को किसी मॉल के चेंजिंग रूम से  लेकर किसी होटल के कमरे तक पहुंचाती है . परेशान लड़कियां चीख कर खुले आम कहती हैं कि जब बिकना ही है तो अपने दाम और अपनी शर्तों पर क्यों नहीं---- काश यह समाज   इन शब्दों के पीछे  की गहन  पीड़ा , क्षोभ , दर्द , टीस को महसूस कर सकता . दरअसल उनकी चीख सफेदपोशों के चेहरे पर झन्नाट थप्पड़  है जिससे बौखलाते हैं हम सब मगर  हम उनकी तकलीफ को महसूस नहीं करते , बल्कि उन्हें चालू , कुलटा , वेश्या , लालची, व्यभिचारिणी  के उपनाम दे कर निश्चिन्त हो जाते हैं . 

इस बीच देश को शर्मसार करने गुवाहाटी की घटना से आहत लोंग तर्क देते नजर आते हैं कि इव टीजिंग की घटनाएँ स्त्री- पुरुष को एक- दूसरे से अलग रखने के कारण संभव हो पाती है . तब तो ये निर्माता बड़ा नेक(??) करम कर रहे हैं .
आदि हो जाने का क्या मतलब है , मुझे  यही समझ नहीं आया . क्या ये लोंग अपने घर में अपनी  माँ -बहनों-भाभी -चाची-या अन्य महिला रिश्तेदारों  के साथ नहीं रहते ?  बच्चे कैसे शिक्षा प्राप्त करें यह अलग बात है , वे साथ पढ़ते हैं , लिंग विभेद के बिना आपस में बातचीत करते हैं , इसलिए उन्हें एक दूसरे से बात करने में संकोच नहीं होता , यह बिलकुल अलग बात है . इसका इव टीजिंग से कोई  वास्ता  नहीं है. स्त्रियों के प्रति अभद्र व्यवहार किसी  व्यक्ति/ समाज विशेष की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है .  
यदि स्त्री -पुरुष का अलग संसार ही इन दुष्कृत्यों का कारण है  तो इस दृष्टिकोण  से  हर धर्म के साधू -सन्यासी , ब्रह्मकुमारी , सिस्टर या नन, अविवाहित स्त्री- पुरुष , विभिन्न कारणों से एक दूसरे से दूर रहने वाले  पति- पत्नी आदि, इन  सभी को  दुराचारी या विपरीत लिंग के प्रति अभद्र हो जाना चाहिए. इस प्रकार के तर्क  दुराचरण को सिर्फ एक आवरण प्रदान करते हैं.  

कुछ लोगो का हास्यास्पद तर्क सुना / पढ़ा कि लड़कियों का खुला स्वभाव या उनके छोटे वस्त्र ही इव टीजिंग की घटनाओं का कारण बनते हैं या उकसाते हैं . आये दिन अखबार रंगे होते हैं छोटे बच्चों के साथ दुराचरण की ख़बरों से . क्या मासूम बच्चे किसी प्रकार की उकसाहट का कारण बन सकते हैं .    क्या पूरे वस्त्र पहने स्त्रियाँ अभद्र नजरों, कटाक्षों या व्यवहार से बच पाती हैं ...नहीं .  
बुरी नजरों या अभद्र व्यवहार का कारण  मानसिक रुग्णता ही अधिक होती है . 
दुष्ट प्रवृतियाँ बुरी संगति , घटिया साहित्य या मानसिक रुग्णता के कारण होती है , निराकरण इन परिस्थितियों का किया जाना चाहिए . 
मेरी समझ से दुराचरण या अभद्र व्यवहार के दोष से बचने के लिए स्त्री -पुरुषों को  एक दूसरे के शरीर का  आदि बनाये जाने की बजाय  आत्मनियंत्रण सीखने /सिखाने की आवश्यकता अधिक  है  . विभिन्न समाजों में स्त्रियों या लड़कियों को यह बहुत समय से सिखाया जाता रहा है , इसलिए पुरुषों के प्रताड़ित होने की संख्या ना के बराबर रही है.  यदि हम सामाजिक संतुलन के लिए स्त्रियों को दुर्व्यवहार अथवा अभद्र व्यवहार से बचाना चाह्ते हैं तो पुरुषों को भी उसी मात्रा में संयम और आत्मनियंत्रण सीखने और सिखाये जाने की आवश्यकता अधिक है ना कि स्त्रियों को और अधिक बंदिशों में रहने /रखने अथवा उघाड़ने की सीख दिए जाने की . 

समस्या जिस भी कारण से हो , आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण से बढ़कर और कोई समाधान मुझे नजर नहीं आता .
आत्मसंयम के प्रश्न पर मुझे  स्वामी विवेकानंद से जुडा संस्मरण याद आता है ...  
अमेरिका भ्रमण के समय एक महिला ने स्वामी जी से विवाह की इच्छा प्रकट की क्योंकि वह उनकी विद्वता पर  मोहित थी . स्वामी जी ने जब उस महिला से उनसे विवाह का कारण जानना चाहा तो उसने बताया कि वह विवेकनद जैसे जहीन बच्चे की माँ बनना चाहती है . तब उन्होंने स्वयम को ही उनके बच्चे के रूप में प्रस्तुत किया .  




(यह अधूरा लेख ड्राफ्ट में सेव था , पिछले दो दिन व्यस्तता में रहे , तभी रश्मि रविजा की पोस्ट नजर आ  गयी  . स्त्रियों के प्रति अभद्रता और उन्हें बाजार बना दिया जाना , दोनों ही विषय एक दूसरे से सम्बद्ध नजर आये तो उसकी पोस्ट की टिप्पणी के रूप में लेख को  विस्तार दिया ) 

शुक्रवार, 18 मई 2012

परिवार वही बेहतर हैं जहाँ आपस में प्रेम , विश्वास और अपनापन है , संयुक्त परिवार हो या एकल !


समाजशास्त्र की किताबों में पढ़ा था कि  मनुष्य एक सामाजिक पशु है .   पशु  समूह में रहना पसंद करते हैं , मनुष्य के लिए भी विभिन्न कारणों से अकेले रहना संभव नहीं . वह परिवार , कबीला ,गाँव आदि बनाकर एक समूह में रहना ही पसंद करता है . समूह में रहने के लिए ना सिर्फ भोगौलिक और प्राकृतिक परिस्थितियां जिम्मेदार है बल्कि मनुष्य की मानसिक अवस्था भी प्रकारांतर से परिवार, कबीला आदि  की रचना के लिए प्रोत्साहित करती रही है . 
 एक परिवार का मतलब समझा जाता है , पति- पत्नी और उनके बच्चों का एक साथ मिल कर रहना , मगर वास्तव में यह रक्तसम्बधियों का समूह है , जहाँ कई भाई , चाचा आदि साथ रहते हैं . विश्व के बड़े भूभाग में परिवार को दो प्रकार से निरुपित किया जाता है . पहला एकल परिवार जहाँ एक ही मुख्य सदस्य और उसकी पत्नी और बच्चे साथ रहें और दूसरा संयुक्त परिवार जहाँ एक पिता के कई बेटे अपने परिवारों के साथ रहते हों , जिनमे व्यस्क होने के बाद भी बंटवारा ना हुआ हो , घर की हर चीज , दायित्व और अधिकार साँझा हैं . 
प्रारंभ से हमारे देश में संयुक्त परिवार का प्रचलन ही रहा है . जैसा की ऊपर बताया संयुक्त परिवार ऐसे कई छोटे परिवारों का समूह है जिसमे घर के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी , सुविधाएँ और सुख दुःख भी साझा ही होते हैं . संयुक्त परिवार का एक मुखिया होता है , जो परिवार के सभी सदस्यों के लिए नीतियाँ और निर्देश देता है. इन परिवारों में पुत्र विवाह के बाद अपने लिए अलग रहने की व्यवस्था नहीं करता . परिवार में जन्मे बच्चों के पालन पोषण के लिए एक स्वस्थ वातावरण निर्मित होता है जिसमे वह  समाज में घुल मिल जाने के संस्कार , नीतियाँ , दायित्व आदि सीखता है . एकल परिवार में जहाँ कुछ ही लोगों का लाड़ दुलार मिलता है , वही संयुक्त परिवारों में बच्चा विभिन्न प्रवृतियों वाले एक बड़े समूह  के बीच रहता है , जहाँ उसे लाड़ दुलार के साथ समाज में विभिन्न परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित करने के गुण सीखता है जो उसके भावी जीवन के लिए एक सुदृढ़ नींव का निर्माण करते हैं . इन परिवारों में किसी भी बुजुर्ग, अविवाहित या बेरोजगार को विशेष समस्या का सामना नहीं करना पड़ता क्योंकि बाकी सदस्य उनकी जिम्मेदारी उठा लेते हैं . मनुष्य को अवसाद , उदासी , अकेलेपन से बचाने में इन परिवारों की सशक्त भूमिका होती है .
संयुक्त परिवार एक लुभावनी धारणा है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की दिन प्रति दिन हो रही  आर्थिक और मानसिक उन्नति ने संयुक्त परिवार की अवधारणा को बहुत नुकसान पहुँचाया है . आज एक परिवार कई परिवारों के साथ एक संयुक्त ढांचे में रहकर स्वयं को बंधन में  महसूस करते हैं . पहले तो संयुक्त परिवार बचे ही नहीं है और जो हैं वे क्लेश के घर बने हुए हैं . जिन परिवारों में संयुक्तता  बची हुई है ,उनमे एकल परिवारों को उपहास की दृष्टि से देखा जाता है . ये बात और है कि अक्सर इन दिखावटी संयुक्त परिवारों के मुकाबले एकल परिवारों में बच्चे बेहतर संस्कार पाते हुए सामाजिक होने का गुण सीख रहे हैं .
वास्तव में परिवार कुछ लोगों के साथ रहने से नहीं बनता है . कुछ लोगो के प्यार से साथ रहने , एक दूसरे के सुख दुःख को समझने , साझा करने और संवेदनशीलता और विनम्रता बनाये रखने से ही परिवार की मर्यादा है . पहले संयुक्त परिवारों में सबकी जरुरत के लिए भौतिक सुविधाएँ साझा होती थी मगर आजकल  संयुक्त परिवारों में हर कमरे में एक अलग घर बसा हुआ ही ज्यादा नजर आ जाता है . जो समर्थ है , वह अपने कमरे में सारी भौतिक सुविधाओं का जमावड़ा कर लेता है , असमर्थों द्वारा इनका उपयोग लगभग वर्जित या फिर ताने सुनने का उपक्रम हो जाता है . ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की हालत और भी खस्ता हो जाती है .अपनी युवावस्था में अपने सिंचित धन का उपयोग वे परिवार को सुदृढ़ करने में लगाते हैं और आखिर में होता यह है कि बेटों द्वारा अपने कमरे बाँट लिए जाने के कारण मकान के गलियारे में स्थान पाते हैं . अपनी मेहनत की पूंजी से बनाये गये मकान में उन्हें अपने लिए एक कोना तलासना होता है , क्योंकि अपनी युवास्था में उन्होंने स्वयं के लिए नहीं , परिवार की सुख -सुविधा पर ध्यान केन्द्रित रखा .
अपने एक परिचित परिवार का उदाहरण देना चाहूंगी . भरा -पूरा परिवार है , सात- आठ भाई -बहनों का . बहनों का विवाह हो चुका है , वे अपनी गृहस्थी में मगन हैं और सभी भाइयों का अपना घर अपना परिवार , मगर जब किसी भी परिवार में कोई मंगल कार्य हो या पर्व उत्सव हो , ना हो तब भी महीने में कम से कम एक बार  सभी परिवार किसी एक भाई के घर  इकट्ठा होते हैं , मिलकर खाना -पकाना और उसके बाद मौज मस्ती , ताश- कैरम खेलना ,साथ घूमने जाना . व्यक्तिगत होने के बावजूद इनकी खुशियाँ और सुख दुःख साझा होते हैं . जिस सदस्य को  आर्थिक मदद की आवश्यकता है , दूसरे सक्षम सदस्य मिलकर उनकी सहायता करते हैं . 
अब एक संयुक्त परिवार की बात लें . एक ही घर में कई अलग घर बसे हुए . जो सबल है , अर्थ में , जबान में वह जीत में .  मकान में दरारें पडी हैं , घर में बुजुर्ग बीमार है , कोई साझा मेहमान आया है ...ये इस परिवार की समस्या है क्योंकि साझेदारी का काम है . कोई एक पहल क्यों करे , जिम्मेदारी क्यूँ उठाये . महँगी कटलरी , अचार  , मिठाई आदि प्रत्येक कमरे में उनके ससुराल पक्ष के लिए सुरक्षित होती हैं .  कौन आया , कौन गया , घर का बुजुर्ग सदस्य देखेगा क्योंकि यह घर तो उसका ही बसाया है . जब तक बच्चे छोटे हैं , उनकी देखभाल के लिए परिवार की जरुरत है , बुजुर्ग के पास धन है , तब तक उनकी जरुरत है , वरना घर के एक कोने में रहते हुए  बाकी सदस्यों के चेहरे देखने , बात करने को तरस जाते हैं . कई दिनों तक आपस में संवादहीनता बनी रहती है .  
संयुक्त परिवार ही पारिवारिक सद्भाव की गारंटी नहीं है . इसके भी भी अपने गुण- दोष है . 
ऐसे संयुक्त परिवारों का क्या लाभ जिसमे संयुक्त रहने के नाम पर बुजुर्गों का जीवन भर दोहन करने के बाद  एक कोने में पटक दिया जाए और उनकी संपत्ति अपर अपना हिस्सा काबिज करने के लिए उनके मरने का इंतज़ार किया जाए .  जबकि एकल परिवारों में बच्चे या बड़े ज्यादा समय अकेले रहते हैं , उनके घर आने वाले मेहमान अथवा दूसरे पारिवारिक सदस्यों की जिम्मेदारी उनकी अकेले की होती है , जिसे वे बेहतर तरीके से निभाते हैं , साझा करना सीखते हैं वरना तो साझा परिवारों में बच्चे मिठाई , फल तक अपने कमरे में छिप कर खाना सीख लेते हैं . संयुक्त परिवार के पक्ष में एक बड़ी दलील दी जाती है कि इसमें बच्चे ज्यादा सुरक्षित होते हैं . संयुक्त परिवारों में प्रत्येक सदस्यों का अपना परिचय क्षेत्र , मित्र आदि होते हैं, ऐसे में अवान्छितों  का घर में प्रवेश रोक पाना इतना सरल नहीं होता . परिवार के दूसरे सदस्यों के बीच मनमुटाव का कारण बन जाता है . एकल परिवार में  संघर्षपूर्ण जीवन परिवार के सदस्यों के  बीच आपसी समझ को बढाता है , जो रिश्तों को मजबूत करता है .  
हम भारतीय अपने परम्पराओं और संस्कृति पर बहुत गर्व करते हैं, मगर उन्हें परिष्कृत कर बदलते समय के अनुकूल बनाने में उतनी रूचि नहीं रखते . परिवार प्रेम , विश्वास और सहयोग की बुनियाद पर इकट्ठे रहने चाहिए , ना कि सिर्फ लोक लुभावनी संस्कृति के दिखावटी  पोस्टर के रूप में . 
इसलिए परिवार वही बेहतर हैं जहाँ आपस में प्रेम , विश्वास और एक दूसरे के सुख- दुःख में शामिल होने का अपनापन है , वह चाहे संयुक्त परिवार हो या एकल !
मनोजजी कि इस प्रविष्टि ने सोचने पर विवश किया कि क्या वाकई संयुक्त परिवार ही पारिवारिक प्रेम की कसौटी हैं , एकल परिवार में बच्चे या बड़े सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं . 

मनोज जी की इस प्रविष्टि  और फेसबुक पर पर हुई चर्चा ने सोचने पर मजबूर किया कि क्या वाकई सिर्फ संयुक्त परिवार ही अच्छे पारिवारिक रिश्तों की गारंटी है , एकल परिवार सिर्फ स्वार्थी ही होते हैं!! फेसबुक पर भी विचार मंथन हुआ जिसके नतीजे में यह पोस्ट आई .   

फेसबुकिया विचार विमर्श ---
बकौल रश्मि प्रभा जी ...परिवार एक सोच है , रिश्तों का संस्कारों का - जहाँ इसका अस्तित्व है , वह एकल हो या संयुक्त - सही मायने में परिवार वही है . ढोने जैसी भावना का निर्वाह नहीं होता , वह ख़त्म ही हो जाता है ! दिखावे का संयुक्त परिवार ही अधिक देखा है ... जहाँ कई चूल्हे जलते हैं और घिनौनी लडाइयां होती हैं -चूल्हा एक भी हो तो अपने खाने पीने का सामान बेडरूम में भेजने के बाद डाल और सब्जी में ढेर पानी की मिलावपर दिखावा ही अधिक है .... हाँ मर जाने पर यूँ चीत्कार करते हैं कि .... खैर मुझे कोई भ्रम अब नहीं होता ! क्योंकि शांति की लकीरें उस चीत्कार में मुझे दिखी हैं . हमेशा आटे दाल का भाव बढा ही है ... आज के हिसाब से जो महंगाई पहले कम थी , तो वेतन कम था ... पर उस वक़्त दिलों में जगह थी . परिवार में एक उत्साह था , मिल बांटकर खाने का सुख था ...... अब तो बस अपना आराम ! पहले एक आलसी था , अब पलड़ा बराबर है इस आज का भयानक रूप कल होगा .... स्व जब चलने से लाचार होगा तो कोई देखनेवाला नहीं होगा पहले ये दिवस नहीं थे .... तब हर दिन माँ का था , प्यार का था , बुजुर्गों का था , पिता का था , बच्चों का था ------- अब एक दिन का कार्ड , इतिश्री

शिखा वार्ष्णेय ने कहा --आजकल संयुक्त परिवारों में भी सबका अपना कमरा, अपनी अलमारी , अपना फ्रिज, अपना टीवी , अपने नाश्ते ,मेवे, मिठाई के डिब्बे आदि आदि होते हैं..संयुक्त परिवार में नाम के अलावा कुछ भी संयुक्त रहा कहाँ है .मनोज जी जितना ज्यादा कमाते हैं उतना ही लालच बढ़ता जा रहा है.."मैं" के अलावा किसी की जगह ही नहीं बची है इंसानी रिश्तों में .

सोनल जी ने बताया --मैं एक बहुत बड़े संयुक्त परिवार से हूँ पहले त्याग ,सामंजस्य और ममता थी पर आज ,चालाकी दिखावा और चालबाजी ज्यादा है.
बढती महंगाई , लोगो की महत्वाकांक्षा और स्वार्थ ने इसका रूप विकृत कर दिया है.

मनोज जी बोले --परिवार कुछ लोगों के साथ रहने से नहीं बन जाता। इसमें रिश्तों की एक मज़बूत डोर होती है, सहयोग के अटूट बंधन होते हैं, एक-दूसरे की सुरक्षा के वादे और इरादे होते हैं। हमारा यह फ़र्ज़ है कि इस रिश्ते की गरिमा को बनाए रखें।
कभी-कभी दोनों खूब कमाते हुए होते हैं पर एक छत के नीचे रहकर भी वह परिवार परिवार नहीं लगता रह पाता। मुझे लगता है कि त्याग और उदारता की भावना का लोप होता जा रहा है। मानवता के गुणों का ह्रास। हमने (जिस दादी - नानी के ज़माने की बात आपने की है) कि उस ज़माने में एक बेरोज़गार भी संयुक्त परिवार का ऐसेट हुआ करता था।