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शनिवार, 17 सितंबर 2016

लेखन के अपने अभिनय.....

लेखक अपनी मर्जी से तथ्यों को तोड़ता मरोड़ता है ही कहानी को अपने मन मुताबिक लिख पाने के लिए !
एक पहलू यह है कि कई लेखकों को देखा है जो वो लिखते है , वो स्वयं हैं नहीं ...इसलिए मेरा तर्क होता है कि यह कत्तई आवश्यक नहीं कि लेखक के आचरण का असर उसके लेखन पर भी हो ...
दूसरा पहलू देखे तो कहीं न कही लेखक उस जैसा ही हो जाना चाहता है , जो वह लिखता है ! जैसा वह नहीं है ,वैसा नहीं हो पाने की पीड़ा में वह वही रचता है जो वह हो जाना चाहता है ...
यही हमारी आँख भी करती है ...कई बार वही दिखाती है जो हम देखना चाह्ते हैं !
सकारत्मक पक्ष यह भी है कि मुस्कुराने का अभिनय करते- करते मुस्कराहट सच्ची हो जाती है !

अभिनय की भी अनगिनत परतें होती हैं।  हो सकता है जो आपको सच्चा /तेजस्वी नज़र आ रहा हो उसके व्यक्तित्व के छिलके किसी अन्य के सामने उधड़े हुए हों।  भारत का दिन अन्य महाद्वीपों में रात भी हो सकता है !
व्यक्ति के सापेक्ष भी विचार /अनुभव बनते बिगड़ते हैं और यह लेखन में भी दृष्टिगोचर होता है।

सौम्य विचार लिखते लिखते मैं अपने मनोबल को मजबूत करता रहा हूँ। जैसे निरंतर के व्यायाम से आपका शरीर स्वस्थ और सुदृढ़ होते जाता है ठीक वैसे ही वैचारिक अभ्यास से आपका मनोबल भी सुदृढ़ होते जाता है। (हंसराज सुज्ञ)

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

बच्चों को खूब पढ़ाया लिखाया , मगर अपनी सोच का क्या किया ……

घर क्या होता है 
तुम क्या जानो 
तुम जानते हो जमीन के छोटे बड़े टुकड़े 
कमरा इतने फीट बाई इतने फीट 
कैसे बताऊँ - इसे घर नहीं कहते !
घर एक एहसास है 
जहाँ किसी एक का ज़ख्म 
दूसरे की तकलीफ बन जाता है 
घर वह नहीं
जहाँ रोटी की कीमत आंकी जाती है
घर -
ज़रूरी नहीं कि आलीशान हो !
छोटा हो
पर प्यार से भरा हो
जहाँ बचपन, सपने, खिलौने
सब एक साथ रजाई में दुबककर सोते हों
सुबह होते शोर हो
'आज कौन चाय बनाएगा'?
और फिर एक ख़ामोशी पसर जाए
थोड़ी देर बाद माँ की आवाज आए
'मैं ही बना लेती हूँ'
और फिर धम धम कोई रसोई तक जाये बड़बड़ाते हुए
'इमोशनली ब्लैक मेल करती हो !'
और पूरा घर खिलखिलाने लगे ....
घर ऐसा होता है !
(रश्मि जी की वॉल से चुराया हुआ)
-
 Rashmi Prabha

कुछ दिनों पहले  रश्मिप्रभा जी ने फेसबुक पर घर को घर बनाने वाली स्नेह पगी मीठी सी कविता पोस्ट की। उनके स्नेह और वात्सल्य से अभिभूत हम धड़ल्ले से चोरी /डाका डालने में अपराध नहीं समझते सो बाकायदा अपने फेसबुक वॉल पर भी चिपका दिया । गुदगुदाया मन फिर भी आशंकित हुआ कि घर के भीतर इमोशनली ब्लैकमेल माताएं अथवा पुत्रियां ही अधिक होती है। इसी सोच के आलोक में कुछ परिवार आँखों के सामने आये , जिनसे कुछ समय पहले या अक्सर मिलना -जुलना होता रहता है। 

पतिदेव का अपना ही शहर है ,  एक ही विद्यालय/मोहल्ले /ऑफिस  में साथ रहे /पढ़े लोगों का विस्तृत दायरा है मगर व्यस्त शहरी दिनचर्या में रिश्तदारों , परिचितों , मित्रो आदि से मिलना जुलना किसी ख़ास पारिवारिक कार्यक्रम अथवा कोई कार्य होने पर ही हो पाता है।  एक ही शहर में होने के बावजूद कई वर्ष गुजर जाते हैं हालाँकि फोन/मोबाइल /इंटरनेट  की सुविधा के कारण बातचीत होती रहती है। कुछ सप्ताह पहले वीकेंड पर परिचितों से मेल-  मिलाप का कार्यक्रम बना। 

मित्र केंद्रीय सेवा में हैं तो उनकी पत्नी बैंक में अधिकारी है। एक ही पुत्र है जो अपनी उच्च शिक्षा /करियर के लिए दूसरे शहर में रहता है , बस छुट्टियों में ही  आना  हो पाता है।  अच्छी लोकेशन में पार्क के सामने  मकान है उनका , बालकनी में खड़े उनकी पत्नी से कहा मैंने कि अच्छी जगह है , सामने पार्क है।  
पार्क है तो क्या , कभी सामने देखने का समय ही नहीं मिलता।  सुबह उठते ही रसोई नजर आती है , चाय -नाश्ता -खाना बनाया और भागे बैंक।  वीकेंड में देर से उठना , साप्ताहिक कार्य निपटाने में ही समय गुजर जाता है।  
नारी -शक्ति जाग उठती ही भीतर कभी  , तो  हम भी उसी भाव में ज्ञान देते हुए बोल पड़े ,  क्यों , इतने वर्षों में भाई साहब को नाश्ता बनाना नहीं सिखाया क्या। पत्नी सिर्फ मुस्कुराकर रह गयी। 
भाई साहब  तीखी नजरों से घूरते पतिदेव से मुखातिब हुए , ये क्या सिखा रही है मेरी बीबी को, हमारा झगड़ा करवाएंगी क्या। और दोनों मित्र खुल कर  हंस लिए। 
मैंने कहा उनकी पत्नी से , जागो नारी शक्ति और हम भी हँस  ही लिए !
 भाई साहब बड़े गर्व से बता रहे थे अभी ये नई गाडी खरीदी तो पुरानी पत्नी को दे दी। मैं समझती हूँ कि उनकी पत्नी की तन्खवाह उनसे कही अधिक ही रही होगी। 
पूरे समय मैं देखती रही , पानी लाने से लेकर जरुरी कागज़ , चश्मा , चाय पकड़ाते उनकी पत्नी ही चकरघिन्नी बनी रही। वर्षों से जानती हूँ इस परिवार को।  दोनों के बीच अच्छा सामंजस्य रहा है , कही कोई मनमुटाव या तानाकशी नजर नहीं आई।  यूँ तो भारतीय परिवारों में आम रहा है यह सब , मगर आजकल थोडा अखरता है।
   
एक और रिश्तेदार के घर जाना हुआ। संयुक्त परिवार था , सास -ससुर , बेटा बहू , पोता।  दो बेटे ही हैं उनके , इस परिवार में भी चाय पानी नाश्ता लिए श्रीमती जी ही चकरघन्नी बनी रही। अक्सर रश्क करते हुए कहती हैं , आपका अच्छा है , चाय -नाश्ता बेटियां सम्भाल लेती हैं. हैरानी अधिक इसलिए होती है कि  ये वह  महिला है जिन्होंने अपने घर में पिता और भाइयों को हमेशा माँ का हाथ बंटाते देखा है। 

एक और परिवार है , दो बेटे हैं उनके भी।  वे स्वयं  एकलौती पुत्री रही है , मगर मानसिकता वही , बेटियां सब कर लेती हैं , हमें तो स्वयं ही  करना पड़ता है।
 
एक और रिश्तेदार हैं।  दो पुत्रियों और एक पुत्र की माँ  अपने परिवार की एकलौती पुत्री रही हैं और उनकी संपत्ति की   इकलौती वारिस भी मगर जब अपना पुश्तैनी कार्य सम्भालने की बारी आई तो बड़ी बेटी के कार्य सँभालने की सम्भावना को सिरे  से  नकार दिया , यह कहते हुए कि व्यावहारिकता  का तकाजा यही है कि बेटा ही सम्भाले। 

एक और परिचित दो पुत्रियों और एक पुत्र की माता हैं।  उनका भरा -पूरा परिवार रहा छह बहनों और एक भाई का।  घर के काम में पति के हाथ न बंटाने  की शिकायत करती ये माताजी भी यही मानती है कि बेटियों को ही घर का काम सीखना है , बेटों का क्या है !!
 
ये सारे उदाहरण अच्छे- खासे पढ़े- लिखे परिवारों के हैं। माताएं भी पढ़ी- लिखी है , कोई सरकारी सेवा में हैं तो किसी का अपना व्यवसाय है। ये स्त्रियां पुत्र एवं पुत्रियों को रोजगार के लिए समान शिक्षा की वकालत तो करती हैं मगर घर के भीतर उनका अपना  दृष्टिकोण भिन्न है। 
  
कभी -कभी मुझे  लगने  लगता है कि पढ़ने- लिखने से आखिर होता क्या है !! अपने बच्चों को वकील , डॉक्टर , इंजीनियर , वैज्ञानिक , सीए आदि बना ले तो क्या , अपनी सोच का क्या करे। 
 
स्वयं पर भी संशय होने लगता है कि कही मैं भी पुत्रियों की माता होने के कारण ही तो निष्पक्षता की मंशा/भावना  नहीं रखती हूँ ! मानसिक स्थिति का उचित प्रकटन तो उन परिवारों में ही सम्भव है जो पुत्र और  पुत्री दोनों के माता -पिता है और उनके व्यवहार में अपनी संतान के लिए कोई भेद न हो , ना घर में , ना बाहर। 

क्या सच में पुत्र और पुत्री के जीवन को दिशा /शिक्षा देने के सम्बन्ध  में एक ही दृष्टिकोण सम्भव नहीं है !!! 

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

प्रगतिशीलता बनाम पूर्वाग्रह …

"राँझणा फिल्म  में एक दृश्य है --  जे एन यू में पाईप के सहारे चढ़ते को एक प्रगतिशील ग्रुप के छात्र देख लेते हैं और चोर समझ कर पुलिस के हवाले करने  से पहले काफी विमर्श करते हैं कि इसका क्या किया जाए . यह इस तरह पाईप पर क्यों चढ़ रहा था !
 पुलिस को सौंपने का तात्पर्य कि हम सिस्टम पर भरोसा कर रहे हैं जबकि हमें सिस्टम का विरोध करना है . इसकी गरीबी का कारण अशिक्षा है आदि -आदि  . 
अंग्रेजी में  गरीबी और अशिक्षितों पर हो रहे इस विमर्श के बीच नायक कहता /सोचता है -- इस समय मेरी सबसे बड़ी समस्या भूख है और उसका हल  चाय -समोसा है।  (निर्देशन की कुशलता से इस दृश्य की और अधिक मारक बनाया जा सकता था )

सामाजिक समस्याओं पर होने वाले विमर्श की परतें उधेड़ता बहुत ही मारक है यह दृश्य। हमारे देश /समाज में होने वाले अधिकांश विमर्शों की यही दशा /दिशा है।  गरीबों और मजदूरों की समस्याओं पर पर विमर्श होता है फाईव स्टार होटल या होटल जैसी ही सुविधाओं वाले एयरकंडीशंड कमरों में खाए पिए अघाए व्यापारियों द्वारा . देश के ग्रामीण अशिक्षितों की समस्याओं पर विचार होता है महज अंग्रेजी में ही गिटरपिटर करते डिग्रीधारकों द्वारा।  विमर्शकर्ता  इन विमर्शों की सीढ़ी  चढ़ते  पहुँच जाते है समाज के उच्चतम श्रेणी में और  जिस पर विमर्श किया जा रहा है वह अनगिनत वर्षों से वहीँ  का वहीँ जमा। विमर्श जिस पर किया जा रहा है ,  उन्हें इन विमर्शों में शामिल किया जाता , उनकी भी राय ली जाती तो शायद इन विमर्शों का स्वरुप कुछ और होता. समस्या वास्तविक धरातल पर समझी जाय तब ही  उसका निराकरण संभव है।  

यही हाल स्त्री और उससे जुड़ी समस्याओं के विमर्श का है।  इस  करवा चतुर्थी  पर भी प्रगतिशीलों का विमर्श बदस्तूर जारी रहा  . एकतरफा घोषणा या दिशा -निर्देश जारी करने  से पहले  इन रस्मों को धारण /निभाने वाली स्त्रियों की राय तो ले लेते कि वे चाहती क्या हैं  या शायद इनके लिए इन स्त्रियों की राय मायने नहीं रखती क्योंकि व्रत उपवास का मतलब पति की गुलामी करना ही होता है।  यह मान  बैठना कि व्रत /उपवास करने वाली सभी विवाहित स्त्रियाँ बेड़ियों में जकड़ी है , एकतरफा  सोच है , पूर्वाग्रह है।   
 
आप जिनकी समस्या पर बात कर रहे हैं , दरअसल वे अपनी समस्याओं का हल किस प्रकार चाहते हैं , यह अधिक मायने रखता है. ना कि आप द्वारा थोपे गए विचार। जब आप धर्म विशेष द्वारा थोपी गयी धारणाओं का विरोध धूमधाम से करते हैं तो यह भी निश्चित होना चाहिए कि आप थोपे गए विचारों का विरोध करते हैं  , स्वयं  अपने विचार थोपते नहीं। जो कार्य आप नहीं करते वह दूसरे  के लिए लिए गुलामी ही हो यह आवश्यक नहीं।  मुश्किलें तब आती है जब सभी समस्याओं के  हल हम एकतरफा सोच के साथ करना चाहते हैं। या वे  शायद यह मान कर ही चलते हैं कि विवाहित स्त्रियाँ  का कोई वजूद / स्वतंत्र व्यक्तित्व ही नहीं है और यदि आप ऐसा ही मानकर चलते हैं तो आपसे मूढ़ और कोई नहीं।

(इस विषय पर कविता जी का यह लेख उल्लेखनीय है )

व्यक्ति की स्वतन्त्रता में विश्वास करने वालों को स्त्रियों को स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने में सहायता करनी चाहिए , ना कि अपनी बनी बनाई सोच परोसकर उसपर ही अमल करने की समझाईश।  

इसी प्रकार सामाजिक समस्याओं के हल सिर्फ अंतरजातीय विवाहों में ढूँढने वाले लोग भी  मुझे ऐसी ही एक तरफ़ा सोच वाले नजर आते हैं .  समाज के विरोधाभास पर प्रश्नचिन्ह लगाते  इन लोगों के   विचारों में कितना विरोधाभास है , ये स्वयं भी नहीं जानते।  एक और ये  सिर्फ प्रेम विवाह की स्वीकृति चाहते हैं  . दूसरी ओर इनकी धारणा  है कि विवाह अपनी जाति  धर्म में करना जाहिली है।  मतलब यह प्रगतिशील  समूह  सिर्फ यह मानकर ही चलते हैं कि दो इंसानों के बीच प्रेम तभी संभव है जब वे विजातीय हो। 
क्या यह भी अपने आप में एक भयंकर पूर्वाग्रह  नहीं है। 

हम सभी जानते हैं कि एक ही  या एक जैसे माहौल में रहने वाले लोग एक दूसरे  के साथ ज्यादा सुविधाजनक होते हैं।  क्या किसी शाकाहारी के लिए मांसाहारियों के साथ तालमेल बैठना आसान है ! पान सुपारी भी नहीं खाने वाले लोग क्या मादक द्रव्यों के सेवन करने वालों के साथ सुविधानाजक निबाह कर  सकते हैं ? यह सही  है कि व्यवहार या विवाह यदि प्रेम के लिए हो तो लोग तालमेल बैठाना /सामंजस्य /समझौता करना पसंद करते हैं …. यानि घूम फिर कर बात तो समझौते और सामंजस्य पर ही आई . विवाह या व्यवहार प्रेम /पसंद से हो या प्रायोजित !!

अब आँखें खोलकर बताएं कि पूर्वाग्रही कौन है ! एकतरफा सोच किसकी है !!

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

जीवन की सम्पूर्णता ....



सैद्धांतिक या पारिभाषिक रूप में देखे तो
विवाह (Marriage) दो व्यक्तियों (प्राय: एक नर और एक मादा) का सामाजिक, धार्मिक या/तथा कानूनी रूप से एक साथ रहने का सम्बन्ध है। विवाह = वि + वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना

(साभार ..विकिपीडिया )

विवाह एक सूत्र/डोर /धागा है जिससे दो अपरिचित बंधते हैं और जीवन भर साथ चलने और उत्तरदायित्व वहन करने का प्रण करते हैं ...हालाँकि दो व्यक्तियों के आपस में बंधने का करना प्रेम ही होना चाहिए था मगर हमारे सामाजिक ढांचे ने एक तरह से इसे दो व्यक्तियों की एक दूसरे पर निर्भरता में तब्दील कर दिया है ... इसमें कोई शक नहीं कि जीवन के कठिन रास्तों पर एक हमसफ़र का होना बहुत सुकून देता है ...हर व्यक्ति कभी न कभी ऐसा साथी चाहता ही है जिससे वह अपना सुख दुःख साझा कर सके और आनंद और सुकून के कुछ पल बिता सके ...मगर यदि यह निर्भरता प्रेम के कारण हो तभी आनंददायक हो सकती है , वरना सिर्फ समझौता हो कर रह जाती है ...जबकि सच्चा प्रेम वह है जो किसी भी प्रकार की निर्भरता , आशा या अपेक्षा से बंधा नहीं होता ... व्यवहार में विवाह को प्रेम के आनंद पर आधारित होना चाहिए मगर जब समझौते का रूप ले लेता है तो प्रेम छू मंतर हो जाता है ...

मानव जाति के विकास , सृष्टि की निरंतरता और व्यक्ति के जीवन में सरलता के लिए विवाह एक आवश्यक प्रक्रिया है लेकिन विवाह में व्यक्ति संकुचित हो जाता है और परिवार उसकी प्राथमिकता हो जाती है . मेरे विचार में यही होना भी चाहिए ...प्रेम दो व्यक्तियों के बीच बढ़कर , परिवार , समाज , देश और फिर सृष्टि तक विस्तार पाए ..

विवाह में प्रेम नर और नारी के बीच का व्यवहार है जब कि जीवन जीने की आदर्श स्थिति मानव से मानव के प्रेम में है ...जीवन की सम्पूर्णता प्रेम में है ....मानव से मानव का , प्रकृति, पशु , पक्षियों , समाज , देश , पृथ्वी सबसे प्रेम ..मानवता का अस्तित्व बनाये रखने लिए भी यही आवश्यक है ....अपने प्रकृति प्रदत्त, वैधानिक या ईश्वर द्वारा निर्धारित रिश्तों से प्रेम तो सभी करते हैं , कर लेते हैं मगर लोक कल्याण के लिए प्रेम , करुणा और स्नेह के स्थाई भाव की आवश्यकता है ...जो लुप्तप्राय सा हो चला है ... नफरतें , रंजिशें , आतंकवादी घटनाये , बढ़ते अपराध स्नेह और करुणा के सूखते स्रोतों के कारण ही अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं !

विवाह में प्रेम और समस्त मानव जाति के प्रेम में बहुत अंतर है.… विवाह में बंधा प्रेम दो व्यक्तियों और परिवारों के बीच संचारित है , जबकि मानव से मानव अथवा मानव  का प्रकृति और उसके सभी अवयवों से प्रेम अपने दिव्य रूप में प्रसारित है. 


सृष्टि में मानव श्रृंखला की सतत गति बने रहने के लिए जहाँ परिवारों और समाजों की स्थापना आवश्यक है ,वही विभिन्न समाजों और प्रकृति की जीवन्तता कायम रखने के लिए मानव का मानव और प्रकृति से प्रेम आवश्यक  है. किसी भी प्रकार से परिवारों के सदस्यों के पारस्परिक प्रेम  और मानव से मानव/प्रकृति के प्रेम को छोटा अथवा  बड़ा कर देखा अथवा  परिभाषित नहीं किया जा सकता  …. 
मानव जीवन के अस्तित्व के लिए प्रेम का होना आवश्यक है , वह परिवार , समाज , मानव अथवा प्रकृति  (इस धरा पर स्थित उपस्थित भूभाग , नदिया , झरने , पर्वत ,पठार , जीव जंतु इत्यादि  )  से भी हो , सभी से हो !!  

डॉ महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'प्रेम' की व्याख्या कुछ इस तरह की है कि -

 'प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।'
प्रेम चतुर मनुष्यों के लिए नहीं है। वह तो शिशु-से सरल हृदय की वस्तु है।' सच्चा प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता, बल्कि उसकी खुशियों के लिए बलिदान करता है। प्रिय की निष्ठुरता भी उसे कम नहीं कर सकती।
प्रेम एक दिव्य अनुभव , एहसास है जो स्नेह , करुणा और दुलार से पूरित होता है ...वह चाहे मानव से मानव का , मानव से प्रकृति का , माता- पिता से अपनी संतान का ,या प्रेमी -प्रेमिका और पति- पत्नी के बीच हो ...

निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा के रूप में हमारे शास्त्रों और धार्मिक प्रसंगों में राधा कृष्ण के प्रेम के अनेक दृष्टान्त है ...हालाँकि यह प्रेम भी दो व्यक्तियों नर /नारी के बीच का ही उदाहरण है मगर समूची सृष्टि इस के आनंद से अभिभूत है ...
उन्हीं के अनुसार एक बार राधा से श्रीकृष्ण से पूछा- हे कृष्ण तुम प्रेम तो मुझसे करते हों परंतु तुमने विवाह मुझसे नहीं किया, ऐसा क्यों? मैं अच्छे से जानती हूं तुम साक्षात भगवान ही हो और तुम कुछ भी कर सकते हों, भाग्य का लिखा बदलने में तुम सक्षम हों, फिर भी तुमने रुक्मिणी से शादी की, मुझसे नहीं।
राधा की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- हे राधे, विवाह दो लोगों के बीच होता है। विवाह के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। तुम मुझे यह बताओं राधा और कृष्ण में दूसरा कौन है। हम तो एक ही हैं। फिर हमें विवाह की क्या आवश्यकता है। नि:स्वार्थ प्रेम, विवाह के बंधन से अधिक महान और पवित्र होता है। इसीलिए राधाकृष्ण नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं और सदैव पूजनीय हैं।
प्रकृति से मानव के प्रेम के सन्दर्भ में राजस्थान के खेजडली ग्राम के निवासियों के प्रयास और योगदान को बिसराया ही नहीं जा सकता. उत्तराखंड की वर्तमान त्रासदी के मद्देनजर यह दृष्टांत अत्यंत ही उपयोगी /अनुसरणीय प्रतीत होता है। 


राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है ..."सर सांठे रुंख रहे तो भी सस्तो जान " यानी यदि सर कटकर भी वृक्षों की रक्षा की जाए तो भी फायदे का ही काम है .जोधपुर के किले के निर्माण में काम आने वाले चूने को बनाने के लिए लकडि़यों की आवश्यकता महसूस होने पर लिए खेजड़ली गांव में खेजड़ी वृक्षों की कटाई का निर्णय किया गया। इस पर खेजड़ली गांव के लोगों ने निश्चय किया कि वे वृक्षों की रक्षा के लिए के लिए अपना बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटेंगे . आसपास के गांवों में संदेशे भेजे गए ..लोग सैकड़ों की संख्या में खेजड़ली गांव में इकट्ठे हो गए तथा पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उनसे चिपक गए। पेड़ों को काटा जाने लगा, तो लोगों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े होकर गिरने लगे। एक व्यक्ति के कटने पर तुरन्त दूसरा व्यक्ति उसी पेड़ से चिपक जाता। धरती लाशों से पट गई . कुल मिलाकर 363 स्त्री-पुरूषों ने अपनी जानें दीं। जब इस घटना की सूचना जोधपुर के महाराजा को मिली, तो उन्होंने पेड़ों को काटने से रोकने का आदेश दिया !


प्रकृति प्रेम का इससे बड़ा और क्या उदाहरण हो सकता था ..  उनके  लिए जीवन की सम्पूर्णता वृक्षों /प्रकृति से प्रेम में ही रही!!

इस तरह समाज में अनेकानेक उदाहरणों ने साबित किया है कि जीवन की सम्पूर्णता सिर्फ विवाह में ही नहीं  अपितु  आध्यात्मिक उन्नति , और मानव से मानव के मध्य  स्नेह, प्रेम और करुणा के विस्तार में भी है ! 

स्वामी विवेकानंद , मदर टेरेसा , अटल बिहारी बाजपेयी , अब्दुल कलाम आज़ाद, बाबा रामदेव , आदि महत्वपूर्ण हस्तियों ने अपने जीवन को मानव कल्याण के लिए समर्पित किया और उनके जीवन की सम्पूर्णता पर किसे शक है !!!


 

गुरुवार, 14 मार्च 2013

अथ श्री लड़ाई- झगडा पुराणम !!


बचपन शब्द याद आते ही जो सबसे पहली बात जबान से निकलती है वह है...वह बचपन का लड़ना- झगड़ना.  
 बचपन की मासूमियत और निष्पाप हृदय को अभिव्यक्ति करती है ये पंक्तियाँ - 
बच्चों सी मुहब्बत कर लो 
मुझसे लड़ना -झगड़ना, रूठना-मनाना. 
दिन भर खेलना कूदना 
शाम पड़े पर घर जाना 
और सब कुछ भूल जाना सुनो. 

 मानो  बचपन का नाम ही लड़ना झगड़ना हो . और ऐसा होता भी है . कैरम ,सितोलिया , गिल्ली डंडा , कंचे , क्रिकेट आदि खेलते हुए कई बार झगडे होंगे बचपन में . 

 जाओ नहीं खेलते तुम्हारे साथ . तुमने बेईमानी की और खेल वही  समाप्त हो जाता . परंतु  अगले ही दिन जब खेल का समय हो तो आवाज़ लगते ही सारे एक साथ दौड़े चले आते . कभी तो कल का झगडा याद ही नहीं होता  और जो याद होता तो  कल जैसी बेईमानी की  तो फिर कभी नहीं खेलेंगे . यह जानते हुए भी कि खेल में बेईमानी तो होनी है . किसी ने ना की तो लगातार हारते हुए हम यही बहाना  बनाकर तो खेल समाप्त करेंगे . 


ग़ज़ल की पंक्ति सुनते ...  वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,  वो गुड़िया की शादी में लड़ना झगड़ना "  मन किसका ना भीग जाता होगा .

 सच यह है की कपट रहित  लड़ने- झगड़ने का  सौभाग्य सिर्फ बचपन में ही  नसीब होता है . बड़े होते सभ्यता के मारे लडाई- झगडा बंद हो जाता है और यदि होता भी है तो कुटिलता के साथ जिसमें परस्पर मान सम्मान की हानि पहुंचाते हुए   दुर्भावना साफ़ नजर आती है।  

बच्चों और बड़ों के/से  झगडे में सबसे बड़ा अंतर यह होता है कि बच्चे जितनी शीघ्रता से लड़ते झगड़ते हैं , उसी शीघ्रता  से मान भी जाते हैं . बड़ी बातो के छोटे झगडे होते हैं जबकि बड़े होने पर पर छोटी बाते बड़े झगडे़ की वजह बन जाती है .

बड़े होने पर झगडे भूले नहीं जाते /पाते और बुरे व्यवहार की यह याद आपस में वैर भाव बढाती ही जाती है और हृदयों के बीच कभी ना पाटने वाली खाई बन जाती है . 

लडाई -लड़ाई माफ़ करो , गाँधी जी को याद करो ....बड़े होने पर अधिकांश मामलों में सही हो सकता है पर  यदि इसकी आड़ में आत्मसम्मान और स्वाभिमान लगातार प्रताड़ित हो तो भूलना या माफ़ करना मुश्किल होता है और होना भी चाहिए .  
माफ़ करो का मतलब यह थोड़े ना है कि पड़ो सी आपके घर में अपना कचरा उठा कर डालता रहे  और आपसे उम्मीद करे , आप भूल जाएँ . 
बचपन के लड़ने- झगड़ने और प्रताड़ना में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव जितना ही अंतर होता है . 

कई  कलहप्रिय लोगो के लिए लड़ना झगड़ना भी एक शौक सा बन जाता है  . कई बार ये लोग  बिना बात दूसरों से उलझते  हैं तो कभी  दूसरों को उकसा कर लड़वा कर  और फिर हाथ बंधे खड़े होकर तमाशा देख अपना मुफ्त  का मनोरंजन करने वालों में शामिल हो जाते हैं .  
क्रोध में अपना नुकसान ना कर ले , संयत वाणी का प्रयोग करें , जैसे उपदेशों के साथ हममे से अधिकांश ने वह कहानी सुनी ही होगी . वही  कहानी, जिसमे   झगड़े को मिटाने के लिए साधारण पानी को दवा बताते हुए क्रोध के समय अपने मुंह में भर लेने की सलाह दी जाती है . 

मगर इससे अलग एक कहानी भी सुनी हमने कभी ....सुन लीजिये आप भी ! 

एक लड़ाका स्त्री थी.  ( खिल गयी ना बांछे , यहाँ भी मानसिकता हावी होगी, कभी किसी लड़ाका पुरुष की कहानी कभी कही सुनी  ही नहीं गयी ). 

 खैर , सुनते हैं आगे .

 उस स्त्री को रोज लड़ने का बहाना चाहिए था क्योंकि उसके बिना उसे कुछ अच्छा नहीं लगता था . जैसे सामान्य मानव के लिए पेट भरने के लिए रोज भोजन  का सेवन आवश्यक है , उसके लिए झगडा ही औषधि थी . ना लड़े  तो  बीमार हो जाए , मगर रोज एक पड़ोसी से ही कब तक लड़े . बोरियत होती थी उसे और बेचारा  पड़ोसी भी परेशान . 

पडोसी ने ही एक  समाधान सुझा दिया कि  क्यों ना हफ़्तावसूली की ही तर्ज पर वह प्रतिदिन अलग -अलग घर में जाकर लड़ना झगड़ना कर ले . इससे किसी एक पर ही मानसिक दबाव नहीं होगा और दूसरों का मुफ्त मनोरंजन भरपूर होगा .
 नए लोग , नई बातें , नए झगडे . उस स्त्री को यह सुझाव जम  गया . अब वह हर दिन नए घर में जाती , उल्टा -सीधा बोलती तो उस घर के लोगों से रहा नहीं जाता , वे भी जम कर उसे वापस सुनाते। मोहल्ले के बाकी लोग उनका झगडा देख मुसकी काटते हुए घबराते कि कल उनका नंबर भी आने वाला है . 

 भयंकर तू- तू मैं -मैं होती ,  जब लड़ते हुए दोनों पक्ष थक जाते तब वह शांति से अपने घर लौट आती . झगड़े का मनोरंजन भी आखिर कब तक . 

कुछ   शांतिप्रिय लोग मन से लोग डरे सहमे रहते कि उनका नंबर भी आने वाला है . ऐसे ही एक घर में नई  शादी हुई थी .  नई  बहू आई  , द्वाराचार तथा अन्य रस्म निभाते हुए सासू माँ का डरा सहमा चेहरा और अन्य स्त्रियों की कानाफूसी देख बहू ने कारण पूछ ही लिया . पड़ोस की एक स्त्री ने बताया कि कल उस लड़ाका स्त्री का तुम्हारे घर लड़ने आने का कार्यक्रम है . सास इसलिए ही सूखी  जा रही है . नई  बहू के सामने बहुत तमाशा हो जाएगा .

 बहू बड़ी समझदार थी , सासू माँ के चरण पकड़ लिए .

 माँ , आप परेशान ना हो , मैं स्वयं उससे निपट लूंगी .

 सास ने ममता भर उड़ेलते हुए चिंतित मुख बहू को गले लगा लिया ," ना री , तू क्या उससे मुकाबला करेगी.  उससे तो आजतक कोई ना जीत सका " 

 माँ, आप चिंता ना करें , बस मुझ पर विश्वास रखे  . 

बहू ने कौल  ले लिया सबसे कि उसके अलावा आँगन में कोई नहीं रहेगा  . सब लोग कमरा बंद कर चुपचाप रहेंगे .

क्या करती सासू माँ . नई बहुरिया का आग्रह टाल  भी नहीं सकती , और साथ में चिंता भी कि यह नई  नवेली सुकुमारी गालियां  , अपशब्द कैसे सुनेगी/ सहेगी .

दूसरे दिन नियत समय पर वह लड़ाका स्त्री आ पहुंची .  देखे तो आँगन में सिर्फ एक स्त्री घूंघट निकाले खड़ी है , घर में कोई और नहीं है . 

अब वह बड़ी प्रसन्न . आज आएगा मजा लड़ने में . नई  बहू है ,नया जोश होगा . एक कहूँगी तो चार सुनाएगी  फिर मैं आठ सुनाऊंगी . आज ही आएगा मजा लड़ने में . 

लड़ाका स्त्री शुरू हो गयी  - अरे! कहां  मर गये नासपीटों . कहाँ छिपे हो सब करमजलों  और भयंकर गालियाँ  बकना शुरू कर दिया . 
नई नवेली बहू आँगन में चुपचाप वैसे ही घूंघट काढ़े खड़ी रही , एक शब्द भी ना कहा . लड़ाका स्त्री परेशान , एकतरफा झगडा आखिर कितनी देर तक हो सकता था . आज और लड़ने का कोई फायदा नहीं था. 

वह मुड़ कर जाने लगी . अभी दरवाजे तक पहुंची भी ना थी की बहू ने घूंघट हटाया , धीरे से बोली ." कहाँ चली नासपीटी , करमजली " . जाते- जाते लड़ाका स्त्री के कान में यह शब्द पड़े. 

अब आया है मजा लड़ने में सोचते वह पुलकती गालियाँ बकते लौट आयी . देखे तो बहू फिर से उसी तरह घूंघट निकाले आँगन में खड़़ी  . मुंह से एक शब्द ना निकाले . जी भर कर गालियाँ बकते थक गयी वह स्त्री मगर बहू तो कुछ ना बोले . आखिर फिर से घर लौटने का रास्ता पकड़ते दरवाजे तक आयी कि  बहू  ने घूंघट हटाया और फिर वही  दुहराया -   कहाँ चली नासपीटी , करमजली ! 

अब तो लड़ाका  स्त्री के क्रोध का पारावार ना रहा . पलट कर अनगिनत गालियाँ बकते लौट आई . और बहू उसी तरह फिर से घूंघट निकाले चुपचाप खड़ी . जब तक वह स्त्री लड़ती , बहू  कुछ ना कहती मगर जैसे ही वह पलट कर जाने लगती बहू फिर उसे छेड़ देती . ऐसा कई बार होते आखिर वह स्त्री थक गयी . इस बार बहू के कहने पर भी नहीं पलटी और धीमे- धीमे घर से बाहर निकल गयी . रास्ते भर अपने आपसे प्रण करती रही कि आज के  बाद  वह किसी के घर झगड़ने नहीं जायेगी .  

अथ श्री लड़ाई- झगडा पुराणम !! 

मॉरल पर हम कुछ नहीं कहेंगे . काहे से कि फिर इलज़ाम लगेगा ज्ञान बांटने का इसलिए जिसको जो उचित लगे ,वही समझ ले !!


चित्र गूगल से साभार !

गुरुवार, 7 मार्च 2013

स्त्रियों का सिर्फ एक दिन.... वीमेंस डे पर विशेष

आज आठ मार्च है ,महिला दिवस ...मुफ्त बांटी जाने वाली रेवड़ियों की तरह एक दिन तुम्हारा भी ले लो , बाकी दिन तो हमारे ही हैं, क्या कहना चाहता है समाज हमसे .


न न ...मैं महिला दिवस की विरोधी नहीं हूँ , निरंतर घटती उनकी संख्याओं और सामाजिक उत्पीडन की बढती घटनाओं के बीच उनके जिन्दा मुक्त अस्तित्व को याद रखने वाला एक दिन तो आवश्यक है .
मगर क्या बस यह काफी है !!

हमारे समाजों ने , सरकारों ने बस हर गंभीर समस्या पर बस एक सतही दृष्टि डालनी शुरू कर दी है . बुजुर्ग उपेक्षित दिखें  , उनका एक दिवस मना  लो . परिवार अधिक टूटते हैं , एक परिवार दिवस.  महिलाये असुरक्षित नजर आती है तो एक दिवस उनके नाम सही ! समस्या की तह में जाकर उसका निदान , समाधान करने की ओर  कदम कब और कैसे बढ़ेंगे , इस पर कोई दूरदृष्टि नजर नहीं आती. एक दिवस मना लेना ही  सुरक्षा, समृद्धि और शक्ति  की गारंटी होती तो आये दिन इन घटनाओं की पुनरावृति नहीं होती . 

स्त्री इस समाज की एक स्वतंत्र इकाई है . स्त्री के सम्मान और सुरक्षा की व्यवस्था परिवार से , प्रत्येक घर से होते हुए समाजो और देश में विकसित हो , तब ही यह लम्बे समय तक कारगर है , वर्ना तो कुछ दिन का हो हल्ला , फिर वही ढाक  के तीन पात!

परिवार के सहयोग अथवा असहयोग से भी जो स्त्रियाँ  विभिन्न क्षेत्रों में आगे आकर अपनी पैठ बना चुकी हैं , स्वयं उनका अन्य महिलाओं के सम्मान और स्वाभिमान के प्रति क्या रवैया होता है , यह भी स्त्री समाज के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण हो सकता है , मगर एक स्तर पर अपने को सामान्य महिलाओं से अलग मान कर इनकी गोलबंदी होती है , बल्कि कई बार तो इनका व्यवहार असहिष्णुपूर्ण और असहयोगी होता है . बांटा जाता है उन्हें क्लास के नाम पर , जाति के नाम पर , धर्म के नाम पर क्योंकि जब तक वे बँटी   रहेंगी , उनकी मुट्ठी में होंगी . 
माफ़ कीजियेगा , यहाँ मैं पुरुषों की बात नहीं कर रही , उस पर तो प्रखर  नारिवादियाँ कह देंगी , लिख भी देंगी . 

मेरी शिकायत स्वयं स्त्रियों से हैं .

नारीवाद पर लम्बे चौड़े आख्यान लिख कर यदि ये अपने घर परिवार या समाज , देश की अन्य स्त्रियों के प्रति असहिष्णु हो जाती है तो इनका क्या औचित्य हुआ . नारी सम्मान पर चीखती स्त्रियों के पारिवारिक अथवा सामाजिक व्यवहार पर वे स्वयं ही एक चोर दृष्टि डालें तो असलियत सामने होंगी . नारीवाद का झंडा लिए कितनी स्त्रियाँ ऐसी होंगी जो अपने परिवार की अन्य स्त्रियों के स्वतंत्र व्यक्तित्व को स्वीकारते हुए उनको यथोचित सम्मान दे सके , दिला  सके . अपने लिए हक़ की मांग करती हुई इन स्त्रियों के बीच ही कुछ ऐसी स्त्रियाँ भी मिल जायेंगी जिनका अपनी सास अथवा बहू ही नहीं , अन्य स्त्रियों  के प्रति भी बहुत ही असम्मानजनक व्यवहार होता है . और ये स्त्रियाँ पढ़ी -लिखी  संभ्रांत परिवारों की हैं . दहेज़ विरोधी होने का मुलम्मा चढ़ाये कितनी स्त्रियाँ इस बात पर सहमत होंगी की उनके घर दहेज़ लिया या दिया नहीं जाएगा , नारी के लिए सम्पूर्ण स्वतन्त्रता   की मांग करने वाली कितनी स्त्रियाँ होंगी जिन्होंने अपने  परिवारों में भ्रूण हत्या का विरोध किया होगा , बताएं जरुर क्योंकि इस पर ही तो नारी सशक्तिकरण के आंकड़े तय किये जायेंगे . 

सैंतालिस वर्ष की उम्र में जब एक बुजुर्ग ने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया तो मैं चौंक उठी , क्योंकि उस परिवार में सबसे समृद्द और सबसे ज्यादा कमाऊ  उनकी सबसे छोटी पुत्री दूर शहर में पूर्ण आत्मनिर्भर जीवन यापन करती हुई उनके लिए विभिन्न सुविधाएँ जुटाती  रही है . उसी परिवार की एकमात्र पुत्रवधू सर पर आँचल लिए बड़े हो चुके बेटे के जूते लाने  से लेकर हर सदस्य की फरमाईश के अनुसार कार्य करने में जुटी रहती है . उक्त आत्मनिर्भर युवती की माताजी अपनी बहु के प्रति बेहद कठोर व्यवहार रखते हुए पोते के खाना पसंद नहीं आने पर थाली उठा कर फेंक देने जैसे बर्ताव को सही ठहराते हुए बहु के काम में मीनमेख निकालती मिल जायेंगी . 

ये  सिर्फ एक दो उदहारण है , ऐसे अनेकानेक मिल जायेंगे .  

यहाँ इसे लिखने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि   मैं सिर्फ लिखने के लिए नहीं लिखती . मुझसे असहमत होने से पहले जान ले कि ये जीवन के अनुभव है , महज किताबी ज्ञान नहीं . महज  कुछ गोष्ठियों में सम्मिलित होकर , नारी सशक्तिकरण पर भाषणबाजी कर हम किसी मुकाम पर नहीं पहुँच सकते.

"फिर कभी मांग लेंगे  दुनिया से हक़ अपना 
अभी तो लडाई घर में बड़ी लम्बी है "

नारियों के लिए स्वयं नारियां आगे आये , परिवारों और समाजों में अन्य स्त्रियों के अधिकार और विकास के लिए सहयोगी बने . परिवार में प्रत्येक स्त्री के सम्मान को स्वयं स्त्री ही सुरक्षित करे , अपने  अधिकारों पर बात करते हुए अन्य स्त्रियों के प्रति अपने कर्तव्यों को ना बिसराएँ , परिवार में स्त्री के विरुद्ध होने वाले अन्याय अथवा अत्याचार के खिलाफ डट कर खड़ी हो , स्त्री सशक्तिकरण  परिवार से  प्रारंभ होकर समाज ,देश और सम्पूर्ण मानवजाति तक पहुंचे  . प्रत्येक  स्त्री जड़ से शुरुआत करें , हमें किसी एक दिवस की आवश्यकता नहीं होगी , हर दिवस हमारा हो ....
यह स्वप्न पूर्ण होने की आशा रखते हुए फिलहाल इस "वीमेंस डे" की बधाई  भी स्वीकार कर लें !!

बुधवार, 23 मई 2012

बारिश से तरबतर एक सप्ताहांत ....


केंद्रीय विभागों की तर्ज पर ही राजस्थान में कर्मचारियों के लिए पांच दिन का सप्ताह किये जाने की घोषणा पिछली सरकार के समय की गयी थी, जिसके अंतर्गत पेट्रोल की खपत में कमी के एक उपाय के रूप में सरकारी विभागों में कामकाज की अवधि सोमवार से शुक्रवार तक की गयी . इसके तहत कार्यालयों में प्रतिदिन के कामकाज के समय में भी परिवर्तन किया गया . पहले के 10 से 5 कार्य करने के समय को 9.30 से 6 बजे तक कर दिया .
सरकारी दफ्तरों में कामकाज किस तरह होता है , हम सभी जानते हैं . ऐसे में पांच दिन के सप्ताह से कामकाज प्रभावित होने की सम्भावना ही ज्यादा थी . सर्दियों में दिन छोटा होने से अँधेरा जल्दी ही घिर आने के कारण भी कर्मचारियों के जल्दी दफ्तर छोड़ जाने की पूरी सम्भावना थी , मगर सरकार ने कर्मचारियों को इस समय के नियम का पालन करने को लेकर सख्ती दिखाई और धीरे -धीरे इसके सकारात्मक प्रभाव नजर आने लगे . कम से कम कर्मचारियों के परिवारजनों ने तो इससे राहत ही महसूस की . दफ्तर का समय सुबह 10 से घटाकर साढ़े नौ करने का ख़ास फर्क नहीं पड़ा , मगर इससे परिवार के लिए एक दिन अतिरिक्त मिलने लगा और यहाँ भी सप्ताहांत मनाने का रिवाज़ निकल पड़ा . सरकारी कर्मचारियों की पेट्रोल की खपत में कमी का तो पता नहीं , पारिवारिक सदभाव बढ़ने में जरुर सफलता मिली होगी ..

इस सप्ताहांत पर जब बहुत समय बाद घर से निकलना हुआ तो गाड़ियों की रेलमपेल के बीच दोनों छूट्टियों के दिन भी गुलजार हो रही सड़कें बता रही थी कि इस शहर को भी पांच दिन का सप्ताह रास आने लगा है .
रविवार को सूनी रहने वाली सड़कें अब गुलज़ार रहने लगी हैं . पिछले वर्षों में प्रोपर्टी मार्केट में बूम आने के बाद चौपहिया वाहनों की बढ़ी संख्या ने भी परिवार के साथ छुट्टियों मनाने वालों की संख्या में वृद्धि की है.
इस शनिवार को ट्रैफिक में फंसे हुए समीर जी की उपन्यासिका के कई अंश आँखों के सामने साकार हुए . लोंग भागे जा रहे हैं बाहर , क्या घर में बैठ कर परिवार जनों के साथ अच्छा वक़्त बिताते हुए छुट्टियाँ नहीं मनाई जा सकती या फिर पर्यटन के लिए शहर अथवा देश से बाहर जाना ही क्या आवश्यक है ...

गर्मी की छुट्टियाँ तो बच्चों की परीक्षाओं,शादियों की भेंट चढ़ी , रही सही कसर अस्वस्थता ने पूरी कर दी , नतीजन पूरी छुट्टियाँ घर में भरपूर आराम करते ही बीती . सोचा इस सप्ताहांत पर अपने ही शहर को नवीन दृष्टि से देख लिया जाए .

शनिवार का दिन झाड़खंड महादेव के दर्शन के लिए निकले . द्रविड़ स्थापत्य शैली पर आधारित यह शिव मंदिर इसे राजस्थान के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों से अलग बनाता है . जन्मभूमि ही द्रविड़ों का प्रदेश है तो इस प्रकार की इमारतें , मंदिर, चित्रकारियां मुझे बहुत लुभाती है , इन स्थलों पर जाने पर बहुत दिन बाद बेटी का अपने मायके आने जैसा ही अहसास होता है . हम महिलाएं उम्र के किसी भी पड़ाव पर हों , ससुराल की परम्पराओं ,रीति -रिवाजों को निभाते उनमे ही रच बस गयी हो , मगर मायके की एक छोटी सी झलक भी स्मृतिलोक के कितने ही परदे भेद कर बचपन तक ले आती हैं . माँ को भी कई बार गुजरते देखती हूँ इन्ही अनुभूतियों से जब हुलस कर वे अपने मायके के बारे में बताती हैं ...ये रिश्ता बेटियों का बेटियों से पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता चलता रहता है .

झारखण्ड महादेव , जयपुर
आर्मी एरिया के पास होने के कारण यहाँ का प्राकृतिक वातावरण लुभाता है .मंदिर प्रशासन भी पर्यावरण के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आया . मंदिर के अहाते की छत डालते समय में पीपल या बरगद के बड़े पेड़ों को कटा नहीं गया बल्कि छत का वह हिस्सा खुला ही छोड़ दिया गया है .
मदिर के भीतर पक्षियों के चुग्गे और पानी के लिए बड़ी जगह सुरक्षित है , कबूतरों के ढेर के बीच सफ़ेद कबूतर भी नजर आये . यहाँ बड़ी संख्या में मोर भी हैं , हालाँकि मंदिर के बाहर हरे चारे के ढेरों के पास गायों और सांडों का हुजूम थोडा डराता भी है . मैं देख नहीं पाए , शायद कही आस पास ही मंदिर की अपनी डेयरी भी हो . देश में हर तरफ मंदिरों में भारी संख्या में धन मिलने की ख़बरों के बीच यह सब देखना सुखद लगा .
दूर से देखने पर मंदिर की बाहरी बाउंड्री के रंग इसे कहीं से भी मंदिर होने का आभास नहीं देते . सफ़ेद रंग की दीवार और खिडकियों और दरवाजों पर हरा रंग , बच्चों ने आश्चर्य से पूछा ," यहाँ मंदिर है ?"
भक्ति भी भला किस रंग का अवलंबन चाहती है ! हम इंसानों ने इसे अलग -अलग रंगों में बाँट दिया है .
शाम गहराने लगी तो बिरला मंदिर और मोती डूंगरी गणेशजी के दर्शन कर घर लौट आये ...

बिरला मंदिर , जयपुर बिरला मंदिर से ट्रैफिक का नजारा

दूसरे दिन आमेर किले के लिए निकले घर से , जलमहल तक आते -आते मौसम ने तेजी से करवट ली और बारिश के साथ लबालब सड़कों ने रास्ता रोक लिया . जलमहल की पाल से उमड़ते घुमड़ते बादल और बरसात ने इस पर्यटन स्थल की रौनक को चार चाँद लगा दिए थे .

बरसात में जलमहल का नजारा

बारिश में भीगते भुट्टे खाते लोंग जश्न मनाते नजर आये . पानी के निकास की सही व्यवस्था ना होने के कारण बहुत ज्यादा बारिश नहीं होने के बावजूद सड़कों पर नहर बन जाने जैसे हालात को देखते हुए वहीं से वापस लौट आना पड़ा . रास्ते में जयपुर नगर निगम का बोर्ड और उनके शहर को विश्वस्तरीय बनाने की प्रक्रिया का दर्शन कर
लौटे ..
जयपुर विकास प्राधिकरण का आश्वासन


जरा सी बारिश में जो हुए शहर के हालात ...
इस तरह बनेगा हमारा शहर विश्वस्तरीय !
मगर इन्हें नहीं है किसी से कोई शिकायत ....

हवामहल को भी देखा भीगते हुए

झमाझम बारिश के बीच संपत की नमकीन और आलू- प्याज कचौरी का स्वाद लेते हुए लौटे घर तो हमारे इलाके में एक बूँद पानी की नहीं ...कॉलोनी में गाडी को बारिश से भीगे देखते लोग आश्चर्यचकित हुए , कहाँ हो गयी इतनी बारिश ...बच्चे अलग भुनभुनाते रहे " यहाँ इतने पेड़ पौधे लगाने की जरुरत ही क्या है , जब बारिश ना हो तो "
रोज शहर के विभिन्न इलाकों में अच्छी बारिश के समाचार मिल रहे हैं और यहाँ बस बादल गरजते बरसते पानी की कुछ बूँदें बरसाकर चले जाते हैं ...
जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल याद आ रही है ...
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने , किस राह से बचना है , किस छत को भिगोना है ...
वाकई बादल दीवाने ही हो गए हैं ...


सोच रही हूँ कुछ दिनों के लिए ब्लॉगिंग को भी अपनी झमाझम टिप्पणियों से मुक्ति दे दी जाये ...ज्यादा नहीं ,बस कुछ ही दिन रह लीजिये हमारी टीका टिप्पणी के बिना भी !


गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें !


गुरुवार, 11 अगस्त 2011

रक्षा बंधन की बहुत शुभकामनायें ...

रक्षा बंधन भाई -बहन के निश्छल प्रेम का अनूठा त्यौहार है. सूनी कलाईयां और राखियाँ एक दूसरे की बाट जोहती हैं . इस पर्व को मनाये जाने की अनगिनत कहानियां हैं .
कहते हैं कि सर्वप्रथम शिशुपाल के वध के समय कृष्ण की अँगुलियों से बहे रक्त को रोकने के लिए द्रौपदी ने अपने चीर का एक टुकड़ा फाड़ कर कृष्ण को बाँध दिया था. उसी दिन श्रावण पूर्णिमा होने के कारण यह दिन रक्षाबंधन के पर्व के रूप में मनाया जाने लगा . वहीं इतिहास में रानी कर्णवती द्वारा मुग़ल शासक हुमायूँ को राखी बांधे जाने का जिक्र भी है . सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के शत्रु राजा पुरु को राखी बाँध कर सिकंदर को युद्ध में ना मारने का वचन लिया था .
राखी सिर्फ भाई ही नहीं देवमूर्तियों, वृक्षों , पंडितों द्वारा यजमानों को भी बांधी जाती है. राजस्थान में राखियाँ सिर्फ भाइयो को ही नहीं अपितु भाभी को भी विशेष लटकन वाली राखी " लुम्बा " बांधी जाती है .
राखी के अवसर पर राजस्थान के देवड़ा ग्राम का जिक्र ज़रूरी हो जाता है . जैसलमेर गाँव में एक पूरी सदी लड़कों की कलाईयां सूनी ही रही .ठाकुर बहुल इस ग्राम में बार -बार के आक्रमणों से व्यथित होकर लड़कियों को जन्म लेते ही मार देने की परंपरा थी . सदियों तक राखी के पर्व के नाम पर सिर्फ ब्राहमणों द्वारा ही पुरुषों के हाथ पर राखी बांधी जाती थी . शिक्षा और सामाजिक जागरूकता ने अलख जगाई और अब हर घर में लड़कियों की किलकारी और भाई की कलाई पर राखी है .
माँ जसोदा ने भी बांधी थी राखी . सूरदास ने गाया ...

राखी बांधत जसोदा मैया ।
विविध सिंगार किये पटभूषण, पुनि पुनि लेत बलैया ॥
हाथन लीये थार मुदित मन, कुमकुम अक्षत मांझ धरैया।
तिलक करत आरती उतारत अति हरख हरख मन भैया ॥
बदन चूमि चुचकारत अतिहि भरि भरि धरे पकवान मिठैया ।
नाना भांत भोग आगे धर, कहत लेहु दोउ मैया॥
नरनारी सब आय मिली तहां निरखत नंद ललैया ।
सूरदास गिरिधर चिर जीयो गोकुल बजत बधैया ॥ (साभार कविता कोष )


मेरी राखी आभासी दुनिया के उस विशेष भाई के लिए जिसने कभी सार्वजनिक रूप से मुझे दीदी या बहन नहीं कहा , मगर एक दिन उसने मुझे एहसास दिलाया कि जब पहली बार मैंने उसे अनुज कहा , तब से वो मेरा भाई ही है ...

सीमा पर कठिन परिस्थितयों में भी हौसले और उमंग के साथ देश की रक्षा का ज़ज्बा लिए हर सैनिक भाई की सूनी कलाई के लिए भी....




चित्र गूगल से साभार ...

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

चाह्ते कैसी- कैसी !

अलसुबह जो गीत सुन लो , बरबस ही लब पर चढ़ जाता है और दिन भर उसी गीत की धुन लगी रहती है ...अभी एक दिन सुबह पहले अली जी की पोस्ट " तुम्हारा चाहने वाला खुदा की दुनिया में ,मेरे सिवा भी कोई और हो , खुदा ना करे " पढ़ ली , बस फिर क्या था दिन भर यही गीत जबां पर अटका रहा ....जब भी गुनगुन होती इस गीत कि खुद को टोक देती " क्या खतरनाक चाहते हैं " , मगर फिर थोड़ी देर में वही ...गीत का मूड बदलने के लिए ठुमरी , ग़ज़ल , भजन , रॉक संगीत सब सुन लिया , मगर वही ढ़ाक के तीन पात ....जब भी गुनगुनाओ , बस यही गीत फूट पड़ता ....
तुम्हारा चाहने वाला खुदा की दुनिया में
मेरे सिवा भी कोई और हो खुदा ना करे
तुम्हारा चाहने वाला ...

ये बात कैसे गवारा करेगा दिल मेरा
तुम्हारा ज़िक्र किसी और की ज़ुबान पे हो
तुम्हारे हुस्न की तारीफ़ आईना भी करे
तो मैं तुम्हारी क़सम है के तोड़ दूँ उसको
तुम्हारे प्यार तुम्हारी अदा का दीवाना
मेरे सिवा भी कोई और हो खुदा ना करे
तुम्हारा चाहने वाला ...
हे भगवान , कितनी खतरनाक चाह्ते हैं ....ये क्या बात है कि तुम्हारी तारीफ कोई और दूसरा करे ही नहीं , ये प्यार कहाँ , जूनून है , जलन है , ईर्ष्या है ...

यह गीत तो अपनी चाल चल ही रहा था कि इंदु जी अपनी टिप्पणी कर गयी ," कोई कुछ भी कहे , तुम्हारा कृष्ण तो राधे रानी के बिना अधूरा है "....पता नहीं क्यों, कुछ बूँदें आंसुओं की लुढ़क गयी ....

जीवन का गणित इतना कैलकुलेटिव कहाँ होता है ...सिर्फ गणित में ही होता है , दो दूनी चार , आठ दूनी सोलह हमेशा , जिंदगी में नहीं ...उसका तो अपना ही गणित , अपनी ही परिभाषा , हर एक के लिए अलग ...किस बात पर हंसी आये , किस बात पर रोना ....
दिन भर से कितनी खबरे पढ़ी , देखी ... लूटमार , हत्या , धोखाधड़ी ,रोना- पीटना , आँखें गीली नहीं हुई ... कितने सुखद , दुखद पल याद किये मगर पलकें फिर भी नम नहीं हुई , और ये जरा -सी बात कृष्ण की हुई तो आंसू छलक गये ...
जी किया कि झगड़ पडूं इंदुजी से ... छलिया कृष्ण , खुद अधूरा कब रहा , वह तो अपने आप में सम्पूर्ण ही था ... उसने हर उस व्यक्ति को अधूरा किया , जिसने उससे प्रेम किया ...माँ यशोदा, राधा , रुक्मिणी , सत्यभामा ,गोपियाँ , मीरा .... सब तो उसके बिना अधूरे ही रहे !
ओ तेरी ! कृष्ण सबको चाहे तो भी चितेरा ही , सबका दुलारा ही !
कैलाश जी भी पूछ रहे थे ," कान्हा, राधा से क्यों रूठे "
मिल जाए कहीं कान खींच कर कह दूं ..."कान्हा , अब ना चलने की है रे तेरी चतुराई!"

समझाया मन को .... फर्क है कृष्ण में , आम इंसान में ...बहुत फर्क है !


ब्लॉग दुनिया में लौटे फिर से ...देखा तो गिरिजेश जी अपलाप कर रहे हैं ....
"मृत्यु के बारे में सोचना पलायन है। अतार्किक भय की तार्किक परिणति।"
"यह कहना सीमित दृष्टि का परिचायक है। तुमने यह मान लिया कि मृत्यु के बारे में सोचने वाला जीवन संघर्षों से घबराता है और यह भी कि वह भयभीत होता है।"

उधर आनद द्विवेदी जी कह रहे थे ...
"इस जगत में प्रेम से बड़ी कोई सृजनात्मक शक्ति नही है ! इसलिए प्रेम मृत्यु को स्वीकार कर ही नही सकता; वह घटती ही नही | अगर तुम प्रेम करते हो किसी को तो वह मरेगा नही; मर नही सकता | प्रेमी कभी नही मरता | प्रेमी मृत्यु को जानता ही नही | प्रेम अमृत है - ओशो"

मृत्यु, प्रेम भी सबके लिए एक जैसा कहाँ ... किसी को मृत्यु में भय है , किसी को प्रेम ...
कितने रूप है प्रेम के , चाहतों के ....
चाहतें कैसी -कैसी ....

ज्यादा पढना भी कई बार कन्फ्यूज कर देता है !

शनिवार, 14 मई 2011

परदे हमारे चेहरों पर हैं , दिमागों पर नहीं !

रोज सुबह घर के सामने नीम के पेेेड़ के नीचे पक्षियों के लिए मिट्टी के तसले में पानी भर कर रखती हूँ ...जब चिड़ियों का झुण्ड उसमे पानी पी रहा होता है या फिर उसमे नहा कर अपने पंख झाड़ता किलोल करता है तब पानी के छींटे बहुत सुन्दर दृश्य बनाते हैं . कुछ दिनों से पानी भरते समय देखती हूँ कि पानी बहुत ही गन्दला -सा और पूरा भरा ही रहता है जैसे गन्दा पानी होने के कारण किसी पक्षी ने पिया ही ना हो ...गौर किया तो देखा कि एक कौवा कहीं से रोटी का टुकड़ा लेकर आता है  और पानी के पात्र में डुबो देता है ....इस रहस्य को मैं समझ नहीं पाती कि वह कौवा ऐसा क्यों करता है ...रोटी का टुकड़ा आराम से खाने के बाद भी तो पानी पी सकता है  मगर शायद उसे पानी पीना ही नहीं होता . बस उस पानी को गन्दा करना होता है ...और उसकी इस हरकत के कारण पानी के पात्र में काई भी जम जाती है , बदबू मारता है सो अलग ...रोज उसे मांजना पड़ता है . ताजा पानी रखते ही अगर छोटी चिड़ियाँ पानी पी ले तो उनकी किस्मत वरना एक बार कौवे के आने के बाद बस वे दूर से उस पानी को देख ही सकती हैं . कौवा चोंच मार कर उन्हें भगा देता है और फिर उस पानी में रोटी डाल कर चला जाता है ...अब मैं भी दिन में कितनी बार उसका पानी बदल सकती हूँ आखिर ... उस कौवे को देखते जाने कितने इंसानी चेहरे आँखों के सामने घूम जाते हैं  जो बिना अपने किसी फायदे के दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं ...दुष्ट प्रवृति पक्षियों और मनुष्यों में एक -सी ही होती है , अब इसका विश्लेषण कौन और कैसे करे कि किसने किससे सीखा ...अब ये काम तो किसी बुद्धिजीवी के लिए ही उचित है ...

बुद्धिजीवी से याद आया कि एक दिन यहाँ टिप्पणी में लिख दिया " किसी भी लेखक /लेखिका की रचनाओं को पसंद करने के लिए भाई , बहन , माता , मित्र आदि का संबोधन देना आवश्यक क्यों है . आखिर कैसे बुद्धिजीवी हैं हम लोग !
और मैंने इसमें कुछ गलत नहीं लिखा या कहा .... ब्लॉगजगत में बहुत से ब्लॉगर्स ऐसे हैं जो आपके लेखन प्रयास पर आपकी त्रुटियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए अपनी संतुलित प्रतिक्रिया देकर उसे बेहतर बनाने में मदद करते हैं मगर मुझे नहीं लगता कि उन्हें किसी रिश्ते का नाम देकर ही उनका आभार प्रकट किया जा सकता है ....कुछ ब्लॉगर्स से असीम स्नेह और प्रोत्साहन मिला है मुझे मगर वे भली भांति जानते /जानती हैं कि अपनी भावनाओं या उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मुझे उन्हें किसी रिश्ते के संबोधन की जरुरत नहीं है ... हालाँकि इस आभासी दुनिया में मेरे भी कुछ भाई -बहन हैं और वे भली भांति जानते हैं कि मेरे लिए इन शब्दों /रिश्तों के क्या मायने हैं ...इस विषय पर अमरेन्द्र ने बहुत संतुलित और संजीदा टिप्पणी की है ...

मेरी टिप्पणी पर एक विदुषी बहन चिहुंक उठी और विद्वान् ब्लॉगर का तमगा थमा दिया ...वैसे तो हम शत प्रतिशत महिला ही हैं इसलिए विदुषी कहलाया जाना चाहिए था ...अब कोई हमेशा अपने आपको साधारण गृहिणी कहता रहे और अचानक बुद्धिजीवी ब्लॉगर की जमात के में गैर इरादतन ही सही स्वयं को भी शामिल कर ले तो विदुषियों का ऐतराज़ जायज़ है ...

अब आपको वो किस्सा भी बयान कर ही दें जिसने हमें स्वयं को बुद्धिजीवी समझने की धृष्ट अकल प्रदान की ...क्या है कि कुछ बहुत बेहतर लिखने वाले साहित्यकार टाईप ब्लॉगर्स कभी हमारे ब्लॉग पर दर्शन नहीं देते . उनका लिखा हम पढ़ते हैं .वाकई बुद्धिजीवियों टाइप ही लिखते हैं ..तो हम यही सोचे कि इ लोग विशेष लेखन पर ही टिप्पणी देते हैं ...फिर देखा उन्हें उन विषयों पर टिपियाते जिन पर काफी पहले लिखा जा चुका है और ... एक समान विषय पर ही कहीं बड़ी -बड़ी टिप्पणी , तो कहीं उपस्थिति भी दर्ज नहीं तो हमको लगा कि ये महान लेखक लोग बुद्धिजीवी हैं और सिर्फ बुद्धिजीवियों के ब्लॉग पर टिपियाते हैं  तो हमरे ब्लॉग पर नहीं आने का कारण हमारा साधारण लेखन ही रहा होगा ..मगर जब ढेरों अशुद्धियाँ वाले लेखन , टिप्पणी लेनदेन विवाद , गाय -कुत्ते के साथ फोटो खिंचाने के किस्से और तो और आशिकी की खीर के खटाई होते किस्से में तड़का देते देखा तो अपने साधारण होने का भ्रम मिटने लगा ...
एक दिन पतिदेव अमिताभ बच्चन जी के ब्लॉग के बारे में बात कर रहे थे - देखो , इतना व्यस्त होने पर भी समय निकालते हैं लिखने के लिए ....सही बात है ... मगर वे आज प्रतिष्ठा के जिस मुकाम पर हैं , सिर्फ ये भी लिख दे कि आज मुझे छींक आई , जुखाम हुआ , यहाँ गए , वहां गए तो भी लोग आराम से पढ़ लेंगे .
उन्हें आम ब्लॉगर्स की तरह विषय ढूँढने नहीं पड़ते ...तो जरुरत अपने लिए एक ऊँचा मचान बनाने की है . बाद में आप चाहे जो लिखे , छापे ...

उन्ही विदुषी ब्लॉगर पर किसी की टिप्पणी पढ़ी कि आभासी दुनिया क्या होती है . जो ब्लॉगर हैं , वे वास्तविक ही हैं तो ये दुनिया आभासी कैसे हुई ...
बात तो जमी हमको भी मगर हमारे लिए तो यही सच है कि हम सिर्फ अपनी कम्प्यूटर स्क्रीन पर आने वाले नाम से ही परिचित हैं इसलिए हमारे लिए तो ये दुनिया आभासी ही है ...जिस दिन कोई ब्लॉगर सम्मलेन अटेंड कर लेंगे तब शायद हम भी इसे आभासी कहना छोड़ देंगे ...
तो आभासी दुनिया के ही एक विद्वान् /विदुषी ब्लॉगर (पुरुष /महिला सस्पेंस बने रहने दीजिये ) से बात हुई चैट पर कि फलाने ब्लॉग पर फलाना ब्लॉगर सबसे पहले टिपियाता/टिपियाती है ...मुझे तो इसमें कोई भेद नजर नहीं आया क्योंकि ये हर इंसान कि व्यक्तिगत इच्छा है कि वह क्या पढना चाहता/चाहती है . कोई भी पाठक अपनी पसंद का विषय सबसे पहले पढ़ना चाहता है तो संभवतः वही व्यक्ति उसका पहला पाठक भी होगा ...इसमें इश्किया जैसा कोई समीकरण मुझे तो समझ नहीं आया . मैं उनकी सोच को संकुचित मान भी लेती मगर चूँकि बहुत से ब्लॉगर व्यक्तिगत रूप से एक दूसरे के संपर्क में हैं तो शायद वे ज्यादा जानते होंगे . यह सोचकर मन को समझा लिया ...इसी तरह महान बुद्धिवादीयों के ब्लॉग पर ही नहीं उनकी आपसी फेसबुकिया बातचीत में भी धर्म और जाति- विशेष को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी पढ़ने के साथ ही अपने साधारण होने का भ्रम भी मिटता गया ...देखती हूँ अपने आस- पास भी ऐसे /ऐसी ही आधुनिक /आधुनिकाओं को जो , दिखने/दिखाने में पूरी तरह प्रगतिवादी , नए फैशन की हेयर स्टाईल /परिधानों में , मगर कभी उनसे बात कर लो तो सारी असलियत सामने आ जाती है हालाँकि सभी आधुनिक /आधुनिकाएं इस तरह के दोहरे मापदंड वाले नहीं होते हैं ...जब दिमाग पर पर्दा हो तो सिर्फ बेबाकी और बेपर्दगी से ही आधुनिक नहीं बना जा सकता ...इनसे तो हम पर्देदार ही अच्छे , जिनका दिमाग तो खुला है ...क्योंकि परदे हमारे चेहरों पर हैं , दिमागों पर नहीं !


नोट...कुछ कहानियाँ हैं जो दिमाग से कागज पर उतरना चाह रही है  मगर उससे पहले दिमाग की काट -छांट ज़रूरी थी !

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

हम मूरख तुम ज्ञानी .......

दुनिया का चलन है ....हम जो है बस वही सही है , हम चतुर , सत्यवादी , निर्मल हृदय ,ईमानदार , कार्यकुशल , परोपकारी , ज्ञानी , ....जो हैं वो बस हम है ...." तुम मूरख हम ज्ञानी "
कभी न कभी हम सब के मन में यह खयाल जरुर आता है ..
हालाँकि ऐसे लोंग भी होते हैं जो सिर्फ अपने को मूर्ख मानते हैं , उन्हें हर व्यक्ति अपने से ज्यादा बुद्धिमान लगता है , मगर इनकी गिनती सिर्फ अन्गुलियों पर की जा सकती है ..दुर्लभ प्राणियों की इस जमात में खुद को शामिल कर हम इठलाते रहे हैं ... ." हम मूरख तुम ज्ञानी "


खांचों में जीते हैं हम लोंग , हमारे मापदंड , मर्यादायें इन खांचों के साथ बदलती रहती है .... अपनी भूमिका बदलते ही सोच भी अपनी सुविधानुसार परिवर्तित हो जाती है ..क्यों नहीं हम ये मान सकते कि दुनिया में हर रंग जरुरी है , हर शख्स ,हर वस्तु की अपनी खूबियाँ हैं , अपनी खामियां भी हैं ....स्वाद सिर्फ मीठा या तीखा ही नहीं देता ...नमकीन , खट्टा और कसैला मिलकर ही भोजन का स्वाद बढ़ाते हैं ..
देखिये तो जो हम है और जो हम नहीं हैं उसके लिए हम क्या -क्या सोचते हैं ....


मैं विवाहित हूँ
.....इसलिए सभी अविवाहित उत्श्रंखल, चरित्रहीन है ...!
मैं अविवाहित हूँ ...विवाहितों का भी कोई जीवन है जैसे कारागृह  के बंदी हों.

मैंने प्रेम विवाह किया है ....अरेंज मैरिज वही करते हैं जिन्हें कोई लड़का /लड़की घास नहीं डालती , ये तो मां -बाप ने शादी करवा दी वरना कुंवारे ही रह जाते .
मेरा अरेंज मैरेज है .... प्रेम विवाह छिछोरापन है .

मैं धार्मिक हूँ
.....इसलिए सभी नास्तिक पापी हैं , घृणा करने योग्य हैं .
मैं नास्तिक हूँ ....धार्मिक मान्यताओं का पालन करने वाले पाखंडी हैं .

मैं .... धर्म को मानती हूँ ....इसलिए दूसरे धर्मों में कोई सार नहीं है , उनमे कुछ भी अच्छा नहीं है .
मैं .... प्रान्त से हूँ ....सभ्य लोंग बस यहीं बसते हैं .
मैं .... भाषी हूँ ...बस मेरी बोली सबसे मीठी , बाकी सक बकवास .

मैं नेता हूँ ....पूरी जनता मेरी प्रजा है .

मैं अमीर हूँ ....गरीबों को जीने का कोई अधिकार नहीं है .
मैं गरीब हूँ ....अमीर सिर्फ नफरत किये जाने योग्य हैं .

मैं सत्यवादी हूँ ....दुनिया कितनी झूठी है .
मैं शिक्षित हूँ ......इसलिए सभी अशिक्षित जंगली हैं , गंवार हैं ..

मैं साहित्यकार हूँ ... .दूसरों को लिखने का शउर ही नहीं है , क्या -क्या लिख देते हैं .
मैं ब्लॉगर हूँ ...साहित्यकार , लेखक क्या चीज है, पैसों के भरोसे पैसों के लिए लिखते हैं ...मेरी जो मर्जी आये लिखता हूँ .

मैं कवि हूँ ....कवितायेँ लिखना कितना दुष्कर है , कहानी लिखने में क्या है , जो देखा आसपास लिख दो , कोई तुक , बहर का ख्याल नहीं रखना पड़ता .

मैं कहानीकार हूँ ....कवितायेँ तो यूँ ही लिख दी जाती हैं , कोई भी पंक्ति कैसे भी जोड़ दो , बस तुक मिलाने की जरुरत है , आधुनिक कविता में तो तुक की भी जरुरत नहीं .

मैं वैज्ञानिक हूँ ....ज्योतिष पाखंड है , सिर्फ बेवकूफ बनाने का जरिया है .
मैं ज्योतिषी हूँ ....वैज्ञानिकों का भाग्य तो हम ही बता सकते हैं ...

मैं बॉस हूँ ....मातहतों को अपने बॉस के साथ विनम्रता से पेश आना चाहिए ,ऑफिस के कार्य के अलावा थोड़े बहुत घर के काम भी कर दिए तो क्या हर्ज़ है ..
मैं मुलाजिम हूँ ...बॉस को कर्मचारियों से प्यार से पेश आना चाहिए , हम तनख्वाह ऑफिस के काम की लेते हैं , इनके घर का कम क्यों करें ...

मैं पुरुष हूँ .....स्त्रियों की अकल उनके घुटने में होती है !
मैं स्त्री हूँ ......पुरुषों के घुटने कहाँ झुकते हैं , कौन नहीं जानता !
मैं कामकाजी महिला हूँ ...घर बैठे सिर्फ डेली सोप देखना , पास पड़ोस में सास बहू की चुगलियाँ और काम क्या होता है इन गृहिणियों को .
मैं गृहिणी हूँ ....सुबह सवेर सज- संवर कर निकल जाना , घर और बच्चों को आया के भरोसे छोड़कर ...काम तो बहाना है.

मैं सास हूँ ....आजकल की बहुएं ना , आते ही पूरे घर पर कब्जा कर लेती हैं , बहू को ससुराल का हर कार्य आदर पूर्वक करना चाहिए..
मैं माँ हूँ ...बेचारी मेरे बेटी से ससुराल वाले कितना काम करवाते हैं , बहू का हक तो उसे मिलना ही चाहिए .
मैं बहू हूँ ....ये सासू माँ , समझती क्या है अपने आप को , जब देखो हुकम चलाती है .
मैं बेटी हूँ ....माँ ने अपनी बहुओं को कितना सर चढ़ा रखा है .
मैं ननद हूँ ...भाभियाँ भाई को अपने वश में रखती हैं , भाई को अपनी बहनों को तीज त्यौहार पर महंगे गिफ्ट देने चाहिए .
मैं भाभी हूँ ....ननद बिजलियाँ होती हैं , आग लगाने के सिवा कुछ नहीं जानती , तीज त्योहारों पर अपने भाई से महंगे तोहफों की मांग करती रहती हैं .

मैं पिता हूँ ....आजकल बच्चे कितने अनुशासनहीन है , हम तो अपने पिता से कितना डरते थे , उन्हें कभी हमें पढने के लिए कहना ही नहीं पड़ता था ..
हम बच्चे हैं .....हमारे पिता को कभी उनके माता पिता ने पढने के लिए नहीं टोका ,मगर ये हमेशा हमारे सर पर सवार रहते हैं ..

मैं ही मैं हूँ ....इस मैं को तो !!!

और बहुत कुछ "मैं " अभी जुड़ सकते हैं इसमें ....थोड़ी कोशिश आप भी कर ले !


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शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

भैंस पसरी पगुराय ......

चारों ओर बड़ा हड़कंप मचा था ....जैसे कोई अनहोनी हो गयी हो ...अनहोनी ही तो थी ....नगर के बीचों बीच एक भैंस ने डेरा जमा रखा था ....क्या नाम है इस नगर का ...चलिए विद्वान् नगर ही रख देते हैं ...तो इस विद्वान् नगर में जहाँ सभी एक से एक पढ़े लिखे विज्ञ महारथी रहते थे वहाँ भैंस का आ धमकना ....ना सिर्फ आना  बल्कि ऐसे मार्ग पर आ बैठना जहाँ से रोज जाने कितने महा विद्वान् गुजरते थे ....

विद्वान् नगर एक कुनबा-सा है . समाज है धुरंधरों का ...एक से एक बड़े डॉक्टर , इंजिनियर ,वैज्ञानिक , सैनिक अधिकारी , राजपत्रित अधिकारी , तकनीकी विशेषज्ञ , शिक्षाविद , मिडिया पर्सन , लेखक , साहित्यकार , संपादक ......कौन विद्वान नहीं है यहाँ... अपने अपने क्षेत्रों के महारथी ...मगर यहाँ बस वे लेखन का कार्य करते हैं या कर सकते हैं ... इनकी अपनी अभिरुचियों के अनुसार विद्वमंडल हैं ..... एक साथ कई भाषाओँ के जानकार जब धाराप्रवाह लिखते हैं  तो दूसरों की आँखें फटियाई रहती है . पहले तो जड़ स्तब्ध -सी, फिर एक चोर नजर खुद पर डाल लेते हैं - उनकी लिखाई मेरी लिखाई से चमकदार कैसे !


ऐसे विद्वजनों के नित्य आवागमन वाले मार्ग में एक भैंस का जम जाना ....कुफ्र की बात ही थी ...कुछ देर /दिनों मेहमानों का स्वागत करने जैसी औपचारिकता निभाने वाले हम भारतीय पशुओं का भी निरादर नहीं करते ...तभी तो हर चौराहे पर कुत्ते , सूअर आदि घूमते दिखाई दे जाते हैं ...पेट्रोल के बढ़ते दामों से अपनी जेब पर पड़ते असर से चिंतित लोगों के लिए कभी- कभी ईर्ष्या का सबब हो जाते हैं ...इन्हें आवागमन की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती इसलिए बड़े मजे से धरती नाप लेते हैं ...कभी कभी गायें और बछड़े भी इसी तरह सडक किनारे पड़े कचरे में मुंह मारते दिख जाते हैं  मगर इस बार तो भैंस थी . और वो भी सड़क किनारे कचरे में मुंह डालने वाली नहीं व्यस्ततम मार्ग पर पसरी हुए जुगाली करती ...

इसकी ज्यादा देर अनदेखी नहीं की जा सकती थी ...अफरातफरी मची हुई थी . विद्वमंडल की बैठक जुटी .. ये क्या हो रहा है !  हम विद्वानों के बीच एक भैंस . अब इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा . हटाना होगा इसे यहाँ से ....कहाँ हम लोग अपने क्षेत्र के गंभीर विमर्श करने वाले उच्च शिक्षित लोग और कहाँ यह अनपढ़ भैंस जो जुगाली के सिवा कुछ नहीं जानती ...इसे हटाना होगा यहाँ से वर्ना हमारी साख मिट जायेगी .
तय किया गया की सभी विद्वान भैंस के पास जायेंगे और उससे विनम्र निवेदन करेंगे की वह यह स्थान छोड़ कर चली जाए क्योंकि यह स्थान सिर्फ विद्वानों के लिए हैं ....सभी सूटेड बूटेड लोग गए भैंस के पास निवेदन लेकर ...सब अपने अपने तर्क देकर भैंस को समझाने लगे , अब चूँकि सभी विद्वान् थे और सबके विभिन्न मत ...अस्तव्यस्तता हो गयी...जब वे खुद ही एक दुसरे को समझा नहीं पा रहे थे तो फिर भैंस तो आखिर भैंस है ....जिसके आगे कोई कितनी बीन बजाये  मगर वो मस्त पगुराए ....विद्वानों के सर पर पसीना चुहचुहाने लगा ....शोध ,लेखन , सड़केंब नाना , नक़्शे बनाना , नियम कानून बनाना ये सब तो वे जानते थे लेकिन भैंस को कैसे हटाया जाए तत्वज्ञ विद्वान् किसी भी पुस्तक में इसका तरीका नहीं खोज पाए थे ... सामूहिक रूप से कुछ कहने पर तो इसे कुछ असर नहीं हो रहा  क्योंकि सब अपने अलग राग में गा रहे थे तो उन्होंने आपस में तय किया की हममें से एक -एक व्यक्ति बारी- बारी से अपने अर्जित विद्या ज्ञान का उपयोग करते हुए भैंस को समझाएगा की ये स्थान उसके लिए नहीं है ....पहले कौन जाएगा ....लॉटरी निकाली गयी ...एक वैज्ञानिक महोदय के नाम से पर्ची निकली ...भैंस को वहां से हटाने का जुगाड़ करना अब उनकी जिम्मेदारी थी ....


क्रमशः

विद्वान् भैंस को अपने स्थान से हटा पाने में सफल रहे या नहीं ...अगले अंक में ...

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

ब्लॉग की नगरी मा कुछ हमारा भी हक़ होईबे करी ...काहे नही टिपियाएंगे??

ब्लॉग की नगरी मा कुछ हमारा भी हक़ होईबे करी ...काहे नही टिपियाएंगे??

अभी कुछ दिनों पहले चिट्ठाजगत के धड़ाधड़ टिप्पणियां कॉलम में अपनी बहुत सारी टिप्पणियों पर अपने ब्लॉग का पता देखा तो मारे डर के हालत खस्ता हो गयी ... ये कहाँ -कहाँ टिपिया आए हम ..इससे पहले कि  कोई पलटकर हमसे पूछ ले कि आप कौन होती हैं इतनी  टिप्पणियाँ करने वाली आख़िर गीत ,ग़ज़ल, तकनीक , राजनीति , सामाजिक मुद्दे आदि का आपको ज्ञान ही कितना है  आप ठहरी "साधारण गृहिणी  " .  हम तो अपना स्पष्टीकरण पेश कर ही देते हैं।

शुरुआत तो पहले यही से कर लेते हैं कि आख़िर ब्लॉग है क्या ...इतने सारे ब्लॉग्स को पढ़ने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि ब्लॉग हमारी निजी डायरी का वह हिस्सा है जिसे हम सार्वजनिक करना चाहते हैं .. अपने आसपास चलने वाली गतिविधियों में ,सामाजिक दिनचर्या में जो भी रोचक, आश्चर्यजनक और ज्ञानवर्धक नज़र आता है उससे उपजे सवाल अथवा उन सवालों के जवाबों को दूसरों से साझा करने का ही तो एक अच्छा व सुलभ माध्यम।

अब डायरी में अपने विचारों को उतारने के लिए शब्द - संयोजन , वाक्य - विन्यास , अलंकार आदि की ज्यादा समझ और आवश्यकता नहीं  होती है । इन परिस्थितियों के मद्देनजर अगर साहित्य कम लिखा जा रहा है तो ...कि फरक पैंदा है ? हालाँकि ब्लॉग लेखन में साहित्यकारों और तकनीकी विशषज्ञों की भी कोई कमी नहीं है . ऐसे में सामान्य  रचनाकारों को सरल ,सहज भाषा में लिख लेने दीजिए ना ...जितना ज्यादा लिखेंगे कलम की धार ( कम्प्यूटर पर तो टाइपिंग की जाती है ना ..तो टाइपिंग ... नहीं  नहीं  अँगुलियों की धार पैनी होगी तो और कुछ नही तो सितार - गिटार जैसा कुछ बजा कर ही संतोष कर लेंगे !! ) उतनी ही पैनी होगी । 

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान "

जन्मजात प्रतिभावान विरले ही होते हैं । जिन्होंने लताजी के शुरुआती दौर के गाने सुने हैं जान सकते है कि उनके इस सुरीले गले के पीछे उनकी कितनी रियाज़ छुपी है । यदि गुलज़ारजी के गीत लेखन का सफर बीड़ी जलायिले से शुरू होकर हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू से गुजरता हुआ मोरा गोरा अंग लई ले की तरफ़ बढ़ता तो भी क्या उनकी रचनाधर्मिता पर सवाल उठाये जा सकते थे ??

और जब थोड़ा बहुत लिख लिया है तो अपनी रचना को सराहे जाने का का इन्तिज़ार लाजिमी है ..प्रत्येक रचनाकार को अपनी हर रचना प्रिय ही लगती है ...ठीक वैसे ही जैसे कितनी भी बेसुरी मां अगर अपने बच्चों को लोरी सुनाकर सुला रही हो तो किसी स्वरकोकिला से कम नही लगती । प्रशंसा पाने का आग्रह तो वाजिब है मगर दुराग्रह नहीं !!

अब आते हैं टिपियाने की ओर .. अब यह सवाल कि टिप्पणी कौन  करे .. कौन न करे ..क्यों करे ..क्यों न करें ..तो एक बात बता दें कि लोकतंत्र में सबको अपनी अभिव्यक्ति का जितना अधिकार है उतना ही दूसरों की अभिव्यक्ति पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का भी है ।  इसमें  दूसरों की गरिमा को ठेस न पहुंचे इसका ध्यान अवश्य  रखा जाना चाहिए । रचनाकारों का हौसला बढ़ाने के लिए की गयी टिप्पणी पर उस विषय में पारंगत होना कोई आवश्यक नही है ।

अमिताभ जी की आवाज को रेडियो पर नकार दिए जाने के बावजूद वे कला जगत के जिस उच्चतम शिखर पर शोभायमान है. उसके पीछे कारण पत्र - पत्रिकाओं या अन्य दूसरे माध्यमों (टीवी ,इन्टरनेट आदि ) में कला मर्मज्ञों द्वारा लिखी या पढ़ी जाने वाली समीक्षाओं से ज्यादा प्रेरणा अपनी हाड़तोड़ मेहनत की कमाई का हिस्सा खर्च करने वाले कला से अनभिज्ञ मेहनतकशों की वाहवाही अथवा तालियों की गड़गड़ाहट है ...

तो लिक्खाड़ और टिप्पणीकार भाइयों और बहनों, घबराना नहीं डटे रहना ...हतोत्साहित करने वाली टिप्पणियों पर भी जश्न  इस तरह मनाना कि...
अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफिल में है !! "

तो अब आप हमारे लिखे पर लाल ताते होते रहें...हम तो अपना स्पष्टीकरण दे चुके ...इससे पहले कि कोई सवाल उठे !

चलते चलते विविधताओं से भरे इस देश में जन्म लेने पर थोड़ा गर्व भी महसूस कर लें ...कि ..जहाँ लैंग्वेज लर्न पर एक धेला भी खर्च करे बिना भी इतनी भाषाएँ या बोलिया सीख पाये ...और तो गर्व करने लायक इस देश में कुछ बचा नहीं है .....।

नेट पर ज्यादा समय नहीं दे पा रही हूँ ...इसलिए दूसरे ब्लॉग्स पर टिप्पणी नहीं कर पाने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ ...यह लेख ब्लॉग लेखन की शुरुआत के कुछ समय बाद ही लिखा था ...थोड़ा सुधार कर दिया है ...झेल लीजिये ...!