ब्लॉग लेखन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ब्लॉग लेखन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 26 सितंबर 2012

अपने पैसे से उत्कृष्ट साहित्य संग्रहों में अपनी रचनाएँ छपवाने में असहजता का क्या कारण हो सकता है !!

सबसे पहले तो स्वयं को बधाई दे दूं कि बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं . अब लिखा नहीं तो इसमें बधाई देने की क्या बात है !  अकारण व्यर्थ प्रलाप करने का हमें कोई शौक नहीं है , वजन होता है हमारी बात में , इसलिए इस बधाई का भी उचित कारण ही  है . लिख नहीं पा रहे ,  मतलब  साफ़ है कि हम भी राईटर ब्लाक से गुजर रहे हैं , जिससे बड़े -बड़े रचनाकार गुजरा करते हैं . यानि कि  यह तो साबित हो गया ही हम भी लेखक /लेखिका कहलाने योग्य हो चुके हैं , वरना राईटर ब्लाक जैसे साहित्यिक बीमारी से कैसे प्रभावित हो सकते थे !!


अब बात मुद्दे की , लम्बे अरसे से नया कुछ लिखना हो नहीं रहा . कई बार इस स्थिति से हम सब गुजरते हैं . परिस्थितिवश कई बार भावनाओं या विचारों का तीव्र अव्यवस्थित प्रवाह अभिव्यक्ति को अवरुद्ध करता है , वह लेखन की हो या मौखिक !  जो लिखने की इच्छा है लिखना नहीं चाहती हूँ , ऐन वक्त पर दिल और दिमाग में रस्साकसी आरम्भ हो जाती है कि आखिर हमारा ब्लोगिंग में होने का उद्देश्य क्या है . एक कशमकश सी रहती है कि व्यर्थ वाग्जाल में फंसकर अपनी साहित्यिक अभिरुचि को बाधित करना क्या उचित है , वही वाद विवाद में पड़ने  से बचने के लिए कुछ   प्रश्नों /आरोपों का प्रत्युत्तर नहीं देकर बच निकलने जैसी अनुभूति कही स्वयं एवं दूसरों को भी दिग्भ्रमित नहीं करे . जब कुछ कहानी /लेख /संस्मरण नहीं लिखा जा रहा है तो क्यों ना कुछ विचार ही बाँट लिए जाएँ . गृहिणियां रसोई में दाल- सब्जी की छौंक के साथ विचारों का तड़का भी बखूबी लगा सकती है . 

पिछले वर्ष अखबार में लिखे/ छपे   एक आर्टिकल पर सम्बंधित पक्ष की प्रतिक्रिया यूँ मिली " आपने इतनी जल्दी इस विषय पर कैसे लिख दिया , लोंग हमसे पूछ रहे थे कि ख़बरें पैसे देकर लिखवाई जाती हैं " . उस व्यक्ति के लिए यह विश्वास करना जरा मुश्किल था कि मुझे लिखने के लिए पैसे खर्च नहीं करने पड़े थे , बल्कि मुझे पारिश्रमिक दिया गया था . सच कहूं तो उस व्यक्ति द्वारा दी गयी खबर से ही मैंने जाना कि ख़बरें या आर्टिकल पैसे खर्च करके भी लिखवाए/छपवाए  जा सकते हैं . 
 इन दिनों विभिन्न पत्रिकाओं , पुस्तकों या काव्य संग्रहों में पैसे लेकर या देकर कवितायेँ या अन्य रचनाएँ छपवाने के बारे में कई ब्लॉग्स और फेसबुक स्टेटस  में पढ़ा. 
हिंदी ब्लोगिंग के अपने तीन वर्षीय अनुभव में मैंने अनुभव किया कि यहाँ साहित्यिक अभिरुचि रखने वाले वाले प्रतिभाशाली ब्लॉग लेखक /लेखिकाओं या पाठकों की कमी नहीं है . अपनी रचनाओं को ब्लॉग पर लिखने के अलावा पत्र -पत्रिकाओं /पुस्तक रूप में देखने की इच्छा  भी स्वाभाविक ही है . ब्लॉगर्स की  दिन दूनी रात चौगुनी बढती संख्या में से कम ही सौभाग्यशाली रचनाकार होते हैं जिन्हें पत्र- पत्रिकाओं में छपने का मौका मिल पाता है . अक्सर प्रकाशन समूह अपने प्रतिष्ठित रचनाकारों को ही छपने के अधिक अवसर प्रदान करते हैं . कई प्रकाशन समूहों की अपनी तयशुदा नीतियाँ  या मजबूरियां होती है जिसके तहत विशेष विषय की  उत्तम रचनाओं को भी अपनी पत्र- पत्रिकाओं में छापने में असमर्थ होते हैं . रचनाकारों की प्रकाशन - समूहों और संपादकों की मेहरबानी पर  निर्भरता ब्लॉग लेखकों /लेखिकाओं की  निष्पक्ष बेलाग अभिव्यक्ति पर एक बंधन -सी होती है . क्योंकि ब्लॉग पर लिखते समय प्रत्येक रचनाकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र होता है , चाहे जो लिखे . इसके अलावा यदि कहीं रचना भेजी भी तो छपने में , अस्वीकृत होने की अवस्था में जवाब पाने में बहुत समय लगता है .

प्रकाशन समूहों की अपनी मजबूरी है . बढती महंगाई के इस दौर में जब आम आदमी के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण जरूरते रोटी , कपडा , मकान जुटाना मुश्किल हो रहा हो तो अपनी मानसिक खुराक के लिए किताबें / पत्रिकाएं आदि खरीदने की हिम्मत कहाँ से जुटा पायेगा . ईमानदारी से बताये कि पढने के शौक़ीन मध्यमवर्गीय  समाज   में से कितने प्रतिशत लोंग अपने पैसे खर्च कर किताबें खरीद पाते हैं!! 

इन परिस्थितियों के मद्देनजर यदि  कोई प्रकाशन समूह उन ब्लॉग लेखकों /लेखिकाओं की  रुचियों और सुविधा को ध्यान में रखकर कुछ सहयोग राशि  पर उनकी रचनाओं को पत्रिकाओं अथवा पुस्तक के रूप में  सहजने का जिम्मा लेता है तो इसमें परेशानी क्या है . अपराध तब माना जा सकता है जब किसी से धोखे से पैसे ऐंठे गये हो , या उन पर दबाव बनाया गया हो  . यदि कोई रचनाकार असहज मसूस करता भी है तो पुनः इस प्रकार के प्रकाशन में रूचि नहीं लेगा . ब्लॉग रचनाकारों से स्वविवेक की अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वे अपनी रचनाएँ  किस प्रकार और किस कीमत पर सहेजना चाह्ते हैं . मुझे इसमें कुछ बुराई नहीं लगती , कम से कम अपने पैसे देकर आत्मसंतुष्टि के साथ अपना स्वाभिमान तो बना ही रहता  है . जब लोंग अपने पैसे को मन मुताबिक कपड़ों , किताबों , मनोरंजन , कुत्ते- बिल्लियों के रखरखाव,  दारूबाजी  आदि पर खर्च करने में सहज है तो अपने पैसे से उत्कृष्ट साहित्य संग्रहों में अपनी रचनाएँ छपवाने में असहजता का क्या कारण हो सकता है !!   

कुछ कहना है आपको भी ???

रविवार, 10 जून 2012

कुछ अशुद्ध शब्द जो अंतर्जाल पर बहुतायत में हैं ...(हिंदी को पढ़ते हुए --2)


रविवार की एक शाम यूँ ही घूमते -घामते  एक पर्यटक स्थल के प्रवेश द्वार पर कुछ सूचनाओं को पढ़ते हुए  जयपुर विकास प्राधिकरण के एक बोर्ड के "व्यस्क " शब्द पर  नजर टिक गयी .  सही शब्द व्यस्क या वयस्क  क्या होना चाहिए.  इस पर वाद विवाद होता रहा . प्रतिष्ठानों,  पार्कों, चिकित्सालयों जैसे स्थानों पर लिखी गयी सूचनाओं को लिखने अथवा चित्रित करने का कार्य  अक्सर अशिक्षित पेंटर ही करते हैं इसलिए इनमें मात्राओं की गलतियों की अनदेखी कर दी जाती है.  परंतु पिछले कुछ वर्षों में दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल से लेकर प्रिंट मिडिया तक पर कई बार हिंदी के अशुद्ध शब्द आँखों से होकर गुजरते रहे हैं . यहाँ लिखने वालों के अशिक्षित होने का तो सवाल ही नहीं है . विचार करने पर पाया कि  मुद्दा शिक्षित या अशिक्षित होने का नहीं है . कई बार टाईपिंग के कारण होने वाली गड़बड़ियों के कारण भी शब्द अशुद्ध लिख दिए जाते हैं . परंतु क्या सचुमच ऐसा ही है !
 क्या यह अशुद्धियाँ सिर्फ  टाईपिंग की गलतियों के कारण ही है !!

बच्चों की स्कूली शिक्षा के दौरान  उनकी हिंदी की जाँची हुई कॉपी में भी मात्राओं की भयंकर अशुद्धियों को देखकर कई बार बहुत खीझ हुई है .
  बच्चे बड़ी सफाई से कहते -  एक क्लास  में साठ बच्चे हैं. मैम आखिर कितने ध्यान से चेक करेंगी और वह भी इंग्लिश मीडियम से पढने वाले बच्चों की हिंदी की कॉपियां  . ऐसे में मुझे अपने समय के गुरु /गुरुआईन  बहुत याद आते . हिंदी अथवा अंग्रेजी में श्रुतलेखन में अशुद्ध पाए जाने वाले शब्दों को लिखकर दुहराने की सजा मिलती थी . दुहराव  की संख्या संख्या दस से पचास तक भी हो सकती थी .  बच्चे जब किसी शब्द के बारे में पूछते तो भ्रम होने की अवस्था में शब्द को लिखकर देखते ही सही मात्रा याद हो आती . इसे चाहे रट्टा मारना ही कहें परंतु गणित के पहाड़े और हिंदी और अंग्रेजी के शब्द  इसी प्रकार याद कराये जाते थे . अब जब विद्यार्थियों को अशुद्ध  लिखने के लिए टोका ही नहीं जाता तब वे शुद्ध और अशुद्ध शब्द का अंतर कैसे पता कर पायें .  सिर्फ अपनी पुस्तक से ही तो सही लिखना पढ़ना  सीखा नहीं जा सकता . विद्यार्थियों की शंकाओं का समाधान और गलतियों या अशुद्धियों को सही कर पाने में ही विद्यालय और शिक्षकों की उपयोगिता   है . आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में कैलकुलेटर और लैपटॉप पर पढ़ने वाली अथवा हिसाब किताब करने वाली पीढ़ी के लिए कुछ भी रटने की आवश्यकता नहीं है . कुछ याद ना आये तो गूगल है ही . अँगुलियों पर ही जुबानी हिसाब किताब कर पाने वाली हमारी पीढ़ी  कई बार सोच में पड़ जाती है  . क्या यह स्थिति सही है . कहीं  इस प्रकार भावी पीढ़ी के दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित तो नहीं हो रही !!!  
वर्तमान पीढ़ी के गूगल या अन्य सर्च माध्यमों पर निर्भरता को ध्यान में रखते हुए अंतर्जाल   पर लेखकों  की  शब्दों की शुद्धता और सही सूचनाओं को प्रस्तुत करने करने की जवाबदेही बनती है .  मेरी  अपनी ही एक पोस्ट में शेर शब्द के प्रयोग करने पर कुछ वरिष्ठ ब्लॉगर झूम रहे थे . जब लेखन की शुद्धता पर ध्यान देना शुरू किया तब उनका तंज़ समझ आया :). 
कुछ ऐसे ही शब्द हैं यहाँ जो प्रिंट अथवा दृश्य माध्यमों में भी टंकण अथवा फौन्ट्स की त्रुटि के कारण अधिकाधिक अशुद्ध ही लिखे पाए जाते हैं .... 

शुद्ध   --   अशुद्ध 

दीवाली -- दिवाली 
कवयित्री  -- कवियित्री
परीक्षा   --   परिक्षा
तदुपरांत -- तदोपरांत 
निःश्वास -- निश्वास 
त्योहार --  त्यौहार
गुरु      -   गुरू 
निरीह -- निरिह   
पारलौकिक -- परलौकिक 
गृहिणी   --  गृहणी /ग्रहिणी
अभीष्ट -- अभिष्ठ 
पुरुष  --  पुरूष 
उपलक्ष्य -- उपलक्ष 
वयस्क --  व्यस्क 
सांसारिक --  संसारिक
तात्कालिक -- तत्कालिक  
ब्राह्मण  --  ब्राम्हण 
हृदय -- ह्रदय 
स्रोत --स्त्रोत 
सौहार्द --  सौहाद्र 
चिह्न -- चिन्ह 
उददेश्य --  उदेश्य 
श्रीमती -- श्रीमति 
आशीर्वाद --आर्शीवाद 
मध्याह्न  --- मध्यान्ह 
साक्षात्कार --साक्छात्कार 
रोशनी -- रौशनी 
धुँआ -- धुआँ  

मात्राओं का सही ज्ञान नहीं होने के कारण अथवा टंकण या फॉन्ट की गड़बड़ी के कारण  अंतर्जाल  पर  कई ब्लॉग्स  (मेरे या आपके भी हो सकते हैं ) , समाचारपत्रों , साहित्यिक पत्रिकाओं तक में  ये अशुद्धियाँ प्रचुरता में हैं . 

यकीन नहीं होता ना , सर्च कर देखें !!! 
कुछ त्रुटियाँ इस लेख भी हो तो अनदेखा ना करें , टोकें अवश्य  !

रविवार, 3 जून 2012

हिन्दी इतनी सरल भी नहीं.... ( हिंदी को पढ़ते हुए )

हमारी हिन्दी की क्या बात है . हिन्दी से मेरा मतलब है हिन्दी भाषा , वह हिंदी नहीं जो आमतौर पर ईर्ष्यावश लोग एक  दूसरे की कर दिया करते हैं . 
हिन्दी यानि हमारी राष्ट्रीय भाषा . सिर्फ कागजों में दर्ज हो भले ही क्योंकि अक्सर सरकारी कामकाज अंग्रेजी में होते ही देखे हैं . कुछ प्रदेशों में तो ग्रामीण इलाकों में हिन्दी बोलने समझने वाले ढूंढें नहीं मिलेंगे . वही कुछ पढ़े -लिखे बुद्धिजीवी हिन्दी वालों की हिंदी करने में कहीं पीछे नहीं रहते . ख़ुशी यही है कि हम हिन्दी भाषी प्रदेश में हैं तो कम से कम अपनी अभिव्यक्ति के लिए तो दूसरी भाषा का मोहताज़ नहीं होना पड़ता .  

हिन्दी का अपना वृहद् शब्दकोष है जिसने उर्दू , फारसी , संस्कृत , अंग्रेजी के अनगिनत शब्दों को आत्मसात किया है . हिन्दी में शब्द किसी भी वस्तु , व्यक्ति या रिश्ते का सम्पूर्ण परिचय दे देते हैं . अंग्रेजी की तरह नहीं कि तू भी यू , तुम भी यू , आप भी यू ही , किसी पुरुष या स्त्री से यह कह कर मिलवाओ कि मीट माय  आंटी  या मीट माय अंकल ...तो सामने वाला सिर खुजाता ही रह जाए ...अब किसी अंकल की बात कर रहा है . तेरे पिता या माता का भाई और वो भी कौन सा छोटा या बड़ा  या फिर कहीं पड़ोस वाले अंकल की बात तो नहीं कर रहा . ऐसे ही ये आंटी कौन है , तेरी माँ की बहन या पिता की  या पड़ोसी अंकल की ....अंग्रेजी में इनके लिए अलग संबोधन नहीं है शायद उन्हें रूचि ही नहीं होती यह सब जानने में किंतु हम भारतीय तो सब कुछ जान लेना चाहते हैं , खोद -खोद कर पूछते हैं . शायद इसलिए ही शब्दकोष ने हमें यह सुविधा दी है कि ज्यादा मगजमारी ना हो . 

साहित्य के लिए प्रयुक्त शुद्ध हिन्दी और बोलने के लिये आम हिंदी में क्लिष्टता और सहजता का अंतर है . हिन्दी के विद्वानों और आम इंसानों को उनके बोलने और लिखने के अंतर से जाना जा सकता है . हमारे जैसा आम भारतीय हिंदी बोलता तो है परंतु हर किसी का (हमारा भी )हिन्दी भाषा पर सम्पूर्ण आधिपत्य नहीं है और इसलिए कई बार शब्दों की हेराफेरी में  अर्थ के अनर्थ हो जाते हैं . ऐसे ही कुछ शब्दों की पड़ताल है यहाँ जो दिखने/लिखने  में एक जैसे ही लगते हैं  परंतुअर्थ में भिन्न है .

1. प्रणय -परिणय 
प्रेम अथवा प्रीति का नाम प्रणय है जबकि परिणय विवाह को कहते हैं !
उनके प्रणय की परिणिति परिणय में हुई .

2. संपन्न -समापन 
संपन्न शब्द का प्रयोग समाप्ति का द्योतक है .
समापन अर्थात समाप्ति से पूर्व का अंतिम समारोह . 
समापन समारोह संपन्न हुआ . 

3. श्रम -परिश्रम 
श्रम का तात्पर्य शारीरिक श्रम से होता है जैसे श्रमिक का श्रम .
परिश्रम जिसमे शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार का  श्रम शामिल हो , जैसे राम परीक्षा में परिश्रम से उत्तीर्ण हुआ .

4. शंका -आशंका 
शंका अर्थात जिज्ञासा , जानने की उत्सुकता , आपत्ति 
आशंका का प्रयोग संदेह के अर्थ में किया जाता है . " देशों के मध्य बढ़ते तनाव के मद्देनजर गृहयुद्ध की आशंका है ".

5. वेश्या -वैश्या 
वेश्या कुलटा स्त्री है , जो अपने शरीर का व्यापार करती है ...जबकि वैश्या वैश्य स्त्री है ,वह आचार्या भी हो सकती है .

6. भागवत - भगवद् गीता 
भागवत   अठारह पुराणों में से एक पुराण है जबकि भगवद् गीता महाभारत का वह  अंश है जिसमे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निष्काम कर्मयोग का उपदेश दिया था . 

7. नृत्य -नृत 
नृत्य एक कला है , जिसमे भावप्रधानता होती है जबकि नृत नृत्य का बाह्य अनुकरण है . नृत्य नृत और नाट्य का मिश्रण है जबकि नृत  में तालों का प्रयोग होता है.  

8. विस्तर   -विस्तार 
विस्तार का अर्थ फैलाव है जबकि  विस्तर अर्थात विस्तार प्राप्त किया हुआ . 

9. प्रेमिका -प्रिया 
प्रेमिका प्रेम करती है जबकि प्रिया वह है जिससे प्यार किया जाए . 

10. ब्रह्म -ब्रह्मा 
ब्रह्म एक विचार है , व्यक्ति नहीं जबकि ब्रह्मा हिन्दुओं के एक देव हैं . 

ऐसे अनगिनत और भी  शब्द हैं जिनकी पड़ताल उनके भावार्थ के रूप में की जा सकती है .हिन्दी की अधूरी रह गयी शिक्षा के कारण हिन्दी को पढ़ते हुए इन शब्दों के हेरफेर ने खूब चौंकाया . जब इन्टरनेट पर खंगाला तो पाया कि कई शब्दकोशों में भी इनके अंतर / अर्थ को स्पष्ट विभाजित  नहीं किया गया है . शायद  भाषा को  दुरुहता से बचाना और आमजन में लोकप्रिय बनाना इसका एक प्रमुख कारण रहा हो . ब्लॉग जगत के  हिंदी विद्वान /विदुषी इस पर प्रकाश डालें तो मुझ सहित आम हिंदी भाषी का भला हो जाए !

रविवार, 18 मार्च 2012

ताऊ की ब्लॉग लिखाई !

ब्लॉग जगत की सबसे बड़ी लाफ्टर मशीन ताऊ नजर नहीं आ रहे बहुत दिनों से . हंसोड़ों को हंसी कि तलब हो रही थी. क्या करेंअ ब ...जा पहुंचे रामप्यारी के पास ...
कुछ तो करके ताऊ को मना . उनके बिना सब दुखी- उदास हैं. हँसने के लिए अजीब वाहियात तरीके अपनाकर ब्लॉगजगत की हवा ख़राब कर रहे हैं . अब तू ही कुछ समझा सकती है !

रामप्यारी ने भी अब चिंता सताने लगी -- बहुत दिन हो गये वाकई . ताऊ ने समझाना पड़ेगा . जो इतनी लम्बी छुट्टी पर रहे तो कोई नाम तक याद रखने वाला नहीं मिलेगा !

रामप्यारी गई ताऊ के पास . ताऊ बड़ा- सा पैग बनाये उदास सूरत लिए बैठे थे .

क्या हुआ ताऊ . ऐसी रोनी सूरत क्यूँ बना रखी है . जे आप ही ऐसे रहोगे तो क्या होगा . बाकी तो वैसे ही रोना- धोना मचाये रखते हैं .

के करूँ रामप्यारी . लोगां ना हँसाने के फेर में तेरी ताई ने बहुत कुटाई की लट्ठों से ...कि इब तो दिमाग में कुछ आ ही नहीं रहा. के लिखूं , के ना लिखूं ! तू पढ़ी लिखी तो ना है वरना तेरे को समझाता कि इसे राईटर्स ब्लॉक कहते हैं ....

रामप्यारी को एक बार तो बहुत गुस्सा आया . जे ताऊ बड़ा विद्वान् बना फिरता है जैसे कि अब तक जो लिखा है , वह रामायण - गीता से भी बढ़ कर है . थोड़े बहुत संगी- साथियों ने तारीफ़ करके चने के झाड पर चढ़ा दिया है वरना तो लिखता क्या है , घास काटता है ...
मगर फेर थोड़ी सहानुभूति उपजी . ताऊ का इतने दिनों का साथ था आखिर . उनके साथ के कारण ही रामप्यारी की भी इतनी पूछ थी . 
प्रकट में बोली ...चिंता ना कर ताऊ . मैं पता करती हूँ कि तेरी इस समस्या का हल क्या है ...
ओहो . जे मेरी समस्या हल करेगी. ये मुंह और मसूर की दाल...के जमाना आ गया है . अब चेले गुरु को समझायेंगे ...
मन ही मन भड़क रहे थे ताऊ मगर वक़्त की नजाकत देखते प्रकट में प्यार से बोले ...
रे रामप्यारी . तू मेरी इतनी चिंता करती है . मने बहुत अच्छा लगा , पन तेरी चिंता मेरे से कुछ लिखवा नहीं सकती ...

कोई नहीं ताऊ . मैं तेरे लिखने का प्रबंध करने की सोचती हूँ ....

इब रामप्यारी जुट गई समस्या सुलझाने में ...अब उसने तो लिखना आता नहीं  कि शिक्षा देगी ताऊ को पर कुछ करना तो होगा ...
चश्मा लगाये घूम आई बहुत सारे ब्लॉग्स पर ....पढ़ते -पढ़ते उसकी मुस्कराहट चौड़ी होती गई ...
क्या -क्या लिखते हैं लोग . जे ताऊ फ़ालतू ही परेशान हो रिया है ...लिखना कौन बड़ी बात है !
घूम फिर कर पहुंची ताऊ के पास ...
फालतू ही परेशान हो रहे थे ताऊ . जे लिखना कोई बड़ी बात नहीं है . जे वाणी लिख सकती है तो आपके लिखने में कोई दिक्कत ना है . आप लिखने में आओ तो बड़े -बड़ों की छुट्टी कर सकते हो ...

सच रामप्यारी , ऐसा हो सकता है ! मगर परेशानी तो यही है कि समझ नहीं आ रहा क्या लिखूं ...

कौन मुश्किल है ताऊ ...देख सबसे पहले एक पोस्ट अपने जन्मदिन की लिख .  दूसरी ताई से मिला था उस दिन के हुआ था जे लिख . तीसरी शादी की सालगिरह . चौथी पुरानी प्रेमिका . पांचवी नई प्रेमिका . छठी आभासी प्रेमिका और कुछ ना सूझे तो एक राउंड लगा आ दिल्ली का .  तेरे गाँव से दिल्ली कौन दूर है ...तीन -चार पोस्ट बस में बैठने से लेकर दिल्ली पहुचंने तक के के हुआ वो सब लिख डाल ... 
ले ,हो गया दस पोस्ट का जुगाड़ !

ताऊ का सर भन्नाट हो गया ...ताई से मिला.... उस दिन के हुआ था . सिर पर गूमड़ का निशान उसी दिन का है . जोर का लट्ठ पड़ा था सिर पर ! इब ये लिखूंगा तो मेरी गृहस्थी की के इज्ज़त रह जाएगी ...
तू भी ताऊ . के इज्ज़त की परवाह करण लगा है . लिखना बड़ी बात है ...कुछ तो अपने --- से सिखा होता . जे वे अपनी और देश की इज्ज़त की परवाह करते तो हजारपति से अरबपति ना बन पाते ...तू भी ना ताऊ !
पर के ये ठीक रहेगा और ये सब प्रेमिकाओं वाली बात .  ना ...ये ठीक ना लग रहा ...क्या सोचेंगे वे सब मेरे बारे में और ताई को उनके बारे में पता लगा तो फेर तो लिखना लिखण छोड़ , पेन पकड़ने लायक भी नहीं रहूँगा ...ताई कोई घर में पाली पालतू बिल्ली थोड़ी है जो मलाई का कटोरा आगे सरकाया और सब भूल -भाल कर खाणे में जुट जाएगी ...तेरी ताई शेरनी है .कच्चा निगल जायेगी मुझे और डकार भी ना लेगी .. फाड़ खाएगी मेरी बोटी- बोटी . ये प्रेमिकाओं वाली बात रैन दे और कोई टिप्स दे !

जो भी हो , रामप्यारी ताऊ को और पिटते नहीं देख सकती थी ....

तो ताऊ .  आप तो वैसे भी साहित्यकार हो . कई पत्रिकाओं में छपते रहे हो . रेडियो पर लोग सुनते रहे हैं आपको . वही सब लिख दो यहाँ ....के परेशानी है , लोग इम्प्रेस हो जायेंगे कि ताऊ कितना विद्वान् है और ताई से पिटने का डर भी नहीं रहेगा ...

बावली बूच ...अब तो ताऊ माथा ठोकने लगा ... ...वो सब मैं लिखता हूँ , पैसे मिलते हैं ....इन मुफ्तखोरों (ब्लॉग पाठकों ) के लिए अपने अमूल्य ज्ञान को बाटूंगा यहाँ . बावली हुई है के! 
 वह सब तो विशिष्ठ पाठकों या श्रोताओं के लिए हैं ...के करेंगे ये ब्लॉगर... पढेंगे , कुछ समझेंगे , नहीं समझेंगे . दो लाईन ठोक जायेंगे . कोई तो बहुत बढ़िया कहकर खिसक लेंगे ...कोई थोड़े -बहुत अपनी विद्वता का झंडा गाड़ते नया कन्फ्यूजन पैदा कर जायेंगे ...

मगर ताऊ . जो तुम पत्रिकाओं में लिखते हो , रेडियो पर पढ़ते हो , तो कौण से वहां लोग खड़े होकर तालियाँ बजाते हैं . तुरन्त प्रतिक्रिया भी नहीं मिलती !

पिसे मिलते हैं रामप्यारी , पीसे ...तू के समझेगी .कभी कुछ छपवाया होता तो जाणती ....

चित्त भी मेरी , पट्ट भी मेरी ...ताऊ तेरा कुछ नहीं हो सकता !

चल तू रहणे दे ...मैं देखता हूँ के किया जा सकता है ....

जैसे -जैसे सुरा ताऊ के हलक से होती जिगर तक पहुँच रही थी . ताऊ के दिमाग की बत्ती जलने लगी थी ...
रे रामप्यारी , जुगाड़ हो गया पोस्ट का ... थोड़े दिन बाद तेरी ताई जाण वाली है मायके . तब कुछ लिख मारूँगा .आएगी लौट के जब तक मामला ठंडा हो जाएगा ...

अच्छा ताऊ  .  बड़े होशियार ....ताई के जासूस भरे पड़े हैं तेरी फैमिली में ...एक फ़ोन घुमाण की देर है !

जे बात है ....कोई ना ...जब तक ताई यहाँ नहीं है उनके मुंह बंद करने का इंतज़ाम है मेरे पास ..अपने --- से सिखा हुआ हुनर कब काम आएगा . एक बोतल में वही बोलेंगे जो मैं कहूँगा ...

ताऊ के बार की चमाचम बोतलें रामप्यारी को मुंह चिढ़ा रही थी ! रामप्यारी समझ गयी कि ताऊ दुनियादारी के सारे ढब सीख चुका है. लिखने के लिए कुछ न कुछ जुगाड़ कर ही लेगा !
 इब चिंता की कोई बात नहीं है !


शनिवार, 14 मई 2011

परदे हमारे चेहरों पर हैं , दिमागों पर नहीं !

रोज सुबह घर के सामने नीम के पेेेड़ के नीचे पक्षियों के लिए मिट्टी के तसले में पानी भर कर रखती हूँ ...जब चिड़ियों का झुण्ड उसमे पानी पी रहा होता है या फिर उसमे नहा कर अपने पंख झाड़ता किलोल करता है तब पानी के छींटे बहुत सुन्दर दृश्य बनाते हैं . कुछ दिनों से पानी भरते समय देखती हूँ कि पानी बहुत ही गन्दला -सा और पूरा भरा ही रहता है जैसे गन्दा पानी होने के कारण किसी पक्षी ने पिया ही ना हो ...गौर किया तो देखा कि एक कौवा कहीं से रोटी का टुकड़ा लेकर आता है  और पानी के पात्र में डुबो देता है ....इस रहस्य को मैं समझ नहीं पाती कि वह कौवा ऐसा क्यों करता है ...रोटी का टुकड़ा आराम से खाने के बाद भी तो पानी पी सकता है  मगर शायद उसे पानी पीना ही नहीं होता . बस उस पानी को गन्दा करना होता है ...और उसकी इस हरकत के कारण पानी के पात्र में काई भी जम जाती है , बदबू मारता है सो अलग ...रोज उसे मांजना पड़ता है . ताजा पानी रखते ही अगर छोटी चिड़ियाँ पानी पी ले तो उनकी किस्मत वरना एक बार कौवे के आने के बाद बस वे दूर से उस पानी को देख ही सकती हैं . कौवा चोंच मार कर उन्हें भगा देता है और फिर उस पानी में रोटी डाल कर चला जाता है ...अब मैं भी दिन में कितनी बार उसका पानी बदल सकती हूँ आखिर ... उस कौवे को देखते जाने कितने इंसानी चेहरे आँखों के सामने घूम जाते हैं  जो बिना अपने किसी फायदे के दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं ...दुष्ट प्रवृति पक्षियों और मनुष्यों में एक -सी ही होती है , अब इसका विश्लेषण कौन और कैसे करे कि किसने किससे सीखा ...अब ये काम तो किसी बुद्धिजीवी के लिए ही उचित है ...

बुद्धिजीवी से याद आया कि एक दिन यहाँ टिप्पणी में लिख दिया " किसी भी लेखक /लेखिका की रचनाओं को पसंद करने के लिए भाई , बहन , माता , मित्र आदि का संबोधन देना आवश्यक क्यों है . आखिर कैसे बुद्धिजीवी हैं हम लोग !
और मैंने इसमें कुछ गलत नहीं लिखा या कहा .... ब्लॉगजगत में बहुत से ब्लॉगर्स ऐसे हैं जो आपके लेखन प्रयास पर आपकी त्रुटियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए अपनी संतुलित प्रतिक्रिया देकर उसे बेहतर बनाने में मदद करते हैं मगर मुझे नहीं लगता कि उन्हें किसी रिश्ते का नाम देकर ही उनका आभार प्रकट किया जा सकता है ....कुछ ब्लॉगर्स से असीम स्नेह और प्रोत्साहन मिला है मुझे मगर वे भली भांति जानते /जानती हैं कि अपनी भावनाओं या उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मुझे उन्हें किसी रिश्ते के संबोधन की जरुरत नहीं है ... हालाँकि इस आभासी दुनिया में मेरे भी कुछ भाई -बहन हैं और वे भली भांति जानते हैं कि मेरे लिए इन शब्दों /रिश्तों के क्या मायने हैं ...इस विषय पर अमरेन्द्र ने बहुत संतुलित और संजीदा टिप्पणी की है ...

मेरी टिप्पणी पर एक विदुषी बहन चिहुंक उठी और विद्वान् ब्लॉगर का तमगा थमा दिया ...वैसे तो हम शत प्रतिशत महिला ही हैं इसलिए विदुषी कहलाया जाना चाहिए था ...अब कोई हमेशा अपने आपको साधारण गृहिणी कहता रहे और अचानक बुद्धिजीवी ब्लॉगर की जमात के में गैर इरादतन ही सही स्वयं को भी शामिल कर ले तो विदुषियों का ऐतराज़ जायज़ है ...

अब आपको वो किस्सा भी बयान कर ही दें जिसने हमें स्वयं को बुद्धिजीवी समझने की धृष्ट अकल प्रदान की ...क्या है कि कुछ बहुत बेहतर लिखने वाले साहित्यकार टाईप ब्लॉगर्स कभी हमारे ब्लॉग पर दर्शन नहीं देते . उनका लिखा हम पढ़ते हैं .वाकई बुद्धिजीवियों टाइप ही लिखते हैं ..तो हम यही सोचे कि इ लोग विशेष लेखन पर ही टिप्पणी देते हैं ...फिर देखा उन्हें उन विषयों पर टिपियाते जिन पर काफी पहले लिखा जा चुका है और ... एक समान विषय पर ही कहीं बड़ी -बड़ी टिप्पणी , तो कहीं उपस्थिति भी दर्ज नहीं तो हमको लगा कि ये महान लेखक लोग बुद्धिजीवी हैं और सिर्फ बुद्धिजीवियों के ब्लॉग पर टिपियाते हैं  तो हमरे ब्लॉग पर नहीं आने का कारण हमारा साधारण लेखन ही रहा होगा ..मगर जब ढेरों अशुद्धियाँ वाले लेखन , टिप्पणी लेनदेन विवाद , गाय -कुत्ते के साथ फोटो खिंचाने के किस्से और तो और आशिकी की खीर के खटाई होते किस्से में तड़का देते देखा तो अपने साधारण होने का भ्रम मिटने लगा ...
एक दिन पतिदेव अमिताभ बच्चन जी के ब्लॉग के बारे में बात कर रहे थे - देखो , इतना व्यस्त होने पर भी समय निकालते हैं लिखने के लिए ....सही बात है ... मगर वे आज प्रतिष्ठा के जिस मुकाम पर हैं , सिर्फ ये भी लिख दे कि आज मुझे छींक आई , जुखाम हुआ , यहाँ गए , वहां गए तो भी लोग आराम से पढ़ लेंगे .
उन्हें आम ब्लॉगर्स की तरह विषय ढूँढने नहीं पड़ते ...तो जरुरत अपने लिए एक ऊँचा मचान बनाने की है . बाद में आप चाहे जो लिखे , छापे ...

उन्ही विदुषी ब्लॉगर पर किसी की टिप्पणी पढ़ी कि आभासी दुनिया क्या होती है . जो ब्लॉगर हैं , वे वास्तविक ही हैं तो ये दुनिया आभासी कैसे हुई ...
बात तो जमी हमको भी मगर हमारे लिए तो यही सच है कि हम सिर्फ अपनी कम्प्यूटर स्क्रीन पर आने वाले नाम से ही परिचित हैं इसलिए हमारे लिए तो ये दुनिया आभासी ही है ...जिस दिन कोई ब्लॉगर सम्मलेन अटेंड कर लेंगे तब शायद हम भी इसे आभासी कहना छोड़ देंगे ...
तो आभासी दुनिया के ही एक विद्वान् /विदुषी ब्लॉगर (पुरुष /महिला सस्पेंस बने रहने दीजिये ) से बात हुई चैट पर कि फलाने ब्लॉग पर फलाना ब्लॉगर सबसे पहले टिपियाता/टिपियाती है ...मुझे तो इसमें कोई भेद नजर नहीं आया क्योंकि ये हर इंसान कि व्यक्तिगत इच्छा है कि वह क्या पढना चाहता/चाहती है . कोई भी पाठक अपनी पसंद का विषय सबसे पहले पढ़ना चाहता है तो संभवतः वही व्यक्ति उसका पहला पाठक भी होगा ...इसमें इश्किया जैसा कोई समीकरण मुझे तो समझ नहीं आया . मैं उनकी सोच को संकुचित मान भी लेती मगर चूँकि बहुत से ब्लॉगर व्यक्तिगत रूप से एक दूसरे के संपर्क में हैं तो शायद वे ज्यादा जानते होंगे . यह सोचकर मन को समझा लिया ...इसी तरह महान बुद्धिवादीयों के ब्लॉग पर ही नहीं उनकी आपसी फेसबुकिया बातचीत में भी धर्म और जाति- विशेष को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी पढ़ने के साथ ही अपने साधारण होने का भ्रम भी मिटता गया ...देखती हूँ अपने आस- पास भी ऐसे /ऐसी ही आधुनिक /आधुनिकाओं को जो , दिखने/दिखाने में पूरी तरह प्रगतिवादी , नए फैशन की हेयर स्टाईल /परिधानों में , मगर कभी उनसे बात कर लो तो सारी असलियत सामने आ जाती है हालाँकि सभी आधुनिक /आधुनिकाएं इस तरह के दोहरे मापदंड वाले नहीं होते हैं ...जब दिमाग पर पर्दा हो तो सिर्फ बेबाकी और बेपर्दगी से ही आधुनिक नहीं बना जा सकता ...इनसे तो हम पर्देदार ही अच्छे , जिनका दिमाग तो खुला है ...क्योंकि परदे हमारे चेहरों पर हैं , दिमागों पर नहीं !


नोट...कुछ कहानियाँ हैं जो दिमाग से कागज पर उतरना चाह रही है  मगर उससे पहले दिमाग की काट -छांट ज़रूरी थी !

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

ब्लॉग की नगरी मा कुछ हमारा भी हक़ होईबे करी ...काहे नही टिपियाएंगे??

ब्लॉग की नगरी मा कुछ हमारा भी हक़ होईबे करी ...काहे नही टिपियाएंगे??

अभी कुछ दिनों पहले चिट्ठाजगत के धड़ाधड़ टिप्पणियां कॉलम में अपनी बहुत सारी टिप्पणियों पर अपने ब्लॉग का पता देखा तो मारे डर के हालत खस्ता हो गयी ... ये कहाँ -कहाँ टिपिया आए हम ..इससे पहले कि  कोई पलटकर हमसे पूछ ले कि आप कौन होती हैं इतनी  टिप्पणियाँ करने वाली आख़िर गीत ,ग़ज़ल, तकनीक , राजनीति , सामाजिक मुद्दे आदि का आपको ज्ञान ही कितना है  आप ठहरी "साधारण गृहिणी  " .  हम तो अपना स्पष्टीकरण पेश कर ही देते हैं।

शुरुआत तो पहले यही से कर लेते हैं कि आख़िर ब्लॉग है क्या ...इतने सारे ब्लॉग्स को पढ़ने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि ब्लॉग हमारी निजी डायरी का वह हिस्सा है जिसे हम सार्वजनिक करना चाहते हैं .. अपने आसपास चलने वाली गतिविधियों में ,सामाजिक दिनचर्या में जो भी रोचक, आश्चर्यजनक और ज्ञानवर्धक नज़र आता है उससे उपजे सवाल अथवा उन सवालों के जवाबों को दूसरों से साझा करने का ही तो एक अच्छा व सुलभ माध्यम।

अब डायरी में अपने विचारों को उतारने के लिए शब्द - संयोजन , वाक्य - विन्यास , अलंकार आदि की ज्यादा समझ और आवश्यकता नहीं  होती है । इन परिस्थितियों के मद्देनजर अगर साहित्य कम लिखा जा रहा है तो ...कि फरक पैंदा है ? हालाँकि ब्लॉग लेखन में साहित्यकारों और तकनीकी विशषज्ञों की भी कोई कमी नहीं है . ऐसे में सामान्य  रचनाकारों को सरल ,सहज भाषा में लिख लेने दीजिए ना ...जितना ज्यादा लिखेंगे कलम की धार ( कम्प्यूटर पर तो टाइपिंग की जाती है ना ..तो टाइपिंग ... नहीं  नहीं  अँगुलियों की धार पैनी होगी तो और कुछ नही तो सितार - गिटार जैसा कुछ बजा कर ही संतोष कर लेंगे !! ) उतनी ही पैनी होगी । 

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान "

जन्मजात प्रतिभावान विरले ही होते हैं । जिन्होंने लताजी के शुरुआती दौर के गाने सुने हैं जान सकते है कि उनके इस सुरीले गले के पीछे उनकी कितनी रियाज़ छुपी है । यदि गुलज़ारजी के गीत लेखन का सफर बीड़ी जलायिले से शुरू होकर हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू से गुजरता हुआ मोरा गोरा अंग लई ले की तरफ़ बढ़ता तो भी क्या उनकी रचनाधर्मिता पर सवाल उठाये जा सकते थे ??

और जब थोड़ा बहुत लिख लिया है तो अपनी रचना को सराहे जाने का का इन्तिज़ार लाजिमी है ..प्रत्येक रचनाकार को अपनी हर रचना प्रिय ही लगती है ...ठीक वैसे ही जैसे कितनी भी बेसुरी मां अगर अपने बच्चों को लोरी सुनाकर सुला रही हो तो किसी स्वरकोकिला से कम नही लगती । प्रशंसा पाने का आग्रह तो वाजिब है मगर दुराग्रह नहीं !!

अब आते हैं टिपियाने की ओर .. अब यह सवाल कि टिप्पणी कौन  करे .. कौन न करे ..क्यों करे ..क्यों न करें ..तो एक बात बता दें कि लोकतंत्र में सबको अपनी अभिव्यक्ति का जितना अधिकार है उतना ही दूसरों की अभिव्यक्ति पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का भी है ।  इसमें  दूसरों की गरिमा को ठेस न पहुंचे इसका ध्यान अवश्य  रखा जाना चाहिए । रचनाकारों का हौसला बढ़ाने के लिए की गयी टिप्पणी पर उस विषय में पारंगत होना कोई आवश्यक नही है ।

अमिताभ जी की आवाज को रेडियो पर नकार दिए जाने के बावजूद वे कला जगत के जिस उच्चतम शिखर पर शोभायमान है. उसके पीछे कारण पत्र - पत्रिकाओं या अन्य दूसरे माध्यमों (टीवी ,इन्टरनेट आदि ) में कला मर्मज्ञों द्वारा लिखी या पढ़ी जाने वाली समीक्षाओं से ज्यादा प्रेरणा अपनी हाड़तोड़ मेहनत की कमाई का हिस्सा खर्च करने वाले कला से अनभिज्ञ मेहनतकशों की वाहवाही अथवा तालियों की गड़गड़ाहट है ...

तो लिक्खाड़ और टिप्पणीकार भाइयों और बहनों, घबराना नहीं डटे रहना ...हतोत्साहित करने वाली टिप्पणियों पर भी जश्न  इस तरह मनाना कि...
अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफिल में है !! "

तो अब आप हमारे लिखे पर लाल ताते होते रहें...हम तो अपना स्पष्टीकरण दे चुके ...इससे पहले कि कोई सवाल उठे !

चलते चलते विविधताओं से भरे इस देश में जन्म लेने पर थोड़ा गर्व भी महसूस कर लें ...कि ..जहाँ लैंग्वेज लर्न पर एक धेला भी खर्च करे बिना भी इतनी भाषाएँ या बोलिया सीख पाये ...और तो गर्व करने लायक इस देश में कुछ बचा नहीं है .....।

नेट पर ज्यादा समय नहीं दे पा रही हूँ ...इसलिए दूसरे ब्लॉग्स पर टिप्पणी नहीं कर पाने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ ...यह लेख ब्लॉग लेखन की शुरुआत के कुछ समय बाद ही लिखा था ...थोड़ा सुधार कर दिया है ...झेल लीजिये ...!


मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

मत दीजिये मेडल , बधाई तो दे ही दीजिये .......

कल मिथिलेश से बातचीत में जब उसे अपनी उम्र बताई (हालाँकि मैंने कभी कोशिश नहीं कि है अपनी वास्तविक उम्र छिपाने की ...मेरे ऑरकुट और फेसबुक अकाउंट में बाकायदा जन्मतिथि अंकित है ) तब से ही मस्तिष्क लगातार चिंतन मनन कर रहा है ...वास्तव में उम्र तो काफी हो गयी है ... मानो या मत मानो ...उम्र तेजी से रेत की तरह हाथ से फिसलती जाती है ...खतरा होने पर बिल्ली की तरह आँख मूँद कर बैठने से तो खतरा टलता नहीं ...इसलिए हम भी बढती उम्र के इस सच को साहस से स्वीकार कर लेते हैं ...

वृद्धजन पर छाई लरिकाई है ...को तो जैसे तैसे अनदेखा कर भी दिया मगर जब अदाजी ने भी " बूढ़ भाई हैं हम बेचारी " कहकर स्वीकार कर ही लिया है तो इस सच्चाई को स्वीकार कर लेने में ही भलाई नजर आ रही है ...उम्र के पड़ावों को गिनते हुए अफ़सोस गहराता जा रहा है ....उफ़...इतनी उम्र हो गयी ...कोई तमगा हासिल नहीं किया ....पहुँच गयी श्रीमानजी के पास ...जो रात का खाना खाने के बाद चश्मा लगाये कल्याण का जीवनचर्या अंक पढ़ रहे थे (ज्यादातर मैं ही पढ़ती हूँ )...इसमें विभिन्न ऋषियों और ऋषिपत्नियों (महर्षि अगत्स्य और महादेवी लोपामुद्रा,महर्षि गौतम और महादेवी अहिल्य आदि )की जीवनचर्या का उल्लेख करते हुए गृहस्थों को अपने जीवन को सदाचार के साथ बीतने के दिशा निर्देश दिए गए हैं ...
मैंने बात बढ़ाते हुए कहा ... " जी ...कई दिनों से मन में रहा है कि कभी कोई मेडल नहीं मिला जिंदगी में ...और ये जिंदगी तो भागी जा रही है ...क्यों नहीं आप ही दे देते हैं सद गृहस्थन का मेडल ..."
चश्मे से घूरते हुए श्रीमान बोल उठे ...." ठीक है ...इस अंक में महादेवी लोपामुद्रा के सद्गुणों का वर्णन है ...तुलना कर के देख लेता हूँ ... "
अँधा क्या चाहे दो ऑंखें ...हम भी साथ साथ पढना शुरू कर दिए...

बृहस्पति महाराज ने महादेवी लोपामुद्रा की प्रशंसा करते हुए ऋषि अगत्स्य से कहा ...
" आपके भोजन का लेने पर ये अन्न ग्रहण करती हैं , जब आप खड़े होते हैं ये बैठी नहीं रहती , आपके सो जाने पर सोती हैं और आपके जागने से पहले जाग जाती हैं , आपके आयु बढे इसलिए आपका नाम अपने जिव्हा पर नहीं लाती , ये कभी घर के द्वार पर देर तक खड़े नहीं रहती , स्वामी के भोजन से बचे हए अन्न और फल आदि को वे स्वयं ग्रहण करती हैं , गृहकार्य में कुशल हैं , सदा उत्साहयुक्त और प्रसन्न रहती हैं , अधिक खर्च नहीं करती , आपकी आज्ञा के बिना कोई व्रत-उपवास नहीं करती , जहाँ अधिक जान समुदाय जुटा हो , ऐसे उत्सव को देखने से दूर रहती हैं , पति की आज्ञा के बिना तीर्थों में भी नहीं जाती , विवोहोत्सव देखने की इच्छा नहीं करती , जब पतिदेवता सुखपूर्वक सोये , बैठे अथवा आराम करते रहते हैं , उस समय अत्यंत आवश्यक कार्य होने पर भी ये पति को नहीं उठाती , ओखली, मूसल , झाड़ू , सिल और देहली आदि पर कभी नहीं बैठती , घर में घी , नमक , तेल आदि समाप्त हो जाने पर पतिव्रता स्त्री सहसा यह कहती कि ये वस्तुएं नहीं हैं ....

दिल ख़ुशी से बल्लियों उछला जा रहा था कि आज तो मेडल मिल कर रहेगा ...कोई पानी हाथ में देकर कसम खिला ले हमारे पतिदेव से ...खड़े खड़े ही प्राण त्याग दे यदि ये गुण हम में ना हो तो ....

कि तभी पतिदेव अचानक पढ़ते पढ़ते रुक गए और मंद मंद मुस्कुराने लगे ....गर्दन हिलाते हुए बोले ..." भूल जाओ मेडल , होपलेस केस है तुम्हारा " ....
इस तरह अचानक ब्रेक लगते देख भी हम निराश नहीं ये ..." क्या कहते हो जी , ये सब गुण तो हममे है , आप इंकार कैसे कर सकते हो "
" हाँ ...बस यहीं तक के गुण मिलते हैं ...आगे ...?" उनके प्रश्नवाचक निगाहे तीर की तरह जा गडी ...
" क्या है जरा मैं भी तो देखूं ...." मैंने आगे पढना शुरू किया " स्त्रियों के लिए श्रेष्ठ नियम बताया गया है कि वह स्वामी के चरणों की पूजा करके भोजन करे " ...हम अटकने लगे ..." साल में 4-5 बार(चौथ व्रत और दिवाली )हमारे चरण छू लेती हैं आप वो भी इस तरह जैसे चिकोटी काट रही हो ...पूजन तो खैर संभव ही नहीं है "

आगे पढना शुरू किया ..." यदि पति कोई कड़ी बात कह दे तो भी ये उसका उत्तर नहीं देती , उनके दंड देने पर ये प्रसन्न ही होती हैं , रंज अथवा बुरा नहीं मानती ... बस ..." अब और ज्यादा बर्दाश्त नहीं हुआ ...दिमाग खिसकने लगा ...
..." अभी तो महर्षि गौतम और देवी अहिल्या की जीवन चर्या पढनी बाकी है ...शायद आपको कुछ आशा वहां से मिल जाए ..." भाव भंगिमा बदलते देख आग उगलती हमारी नजरों से बचने के लिए चश्मा चढाते हुए पतिदेव बोल उठे ...
दिमाग भन्ना गया हमारा तो ..." उनके दंड देने पर प्रसन्न हो ले ...ये क्या बात हुई ...रहने दीजिये ...हमको नहीं चाहिए कोई मेडल आपसे ..." कहते हुए पुस्तक उनके हाथ में थमा दी ...

अभी भी हिम्मत हारने जैसी बात कहा थी ...टीवी पर मिसेज इंडिया प्रतियोगिता का ऐलान किया जा रहा था ... अदिति गोवित्रिकर का हवाला देते हम भी इस प्रतियोगिता पर गौर करते ही कि पहले कदम पर ही कद के मामले में सूई अटक गयी ....चलो जाने दो ...ख़ूबसूरती ना सही ...अभिनय का पुरस्कार तो मिलेगा ही ... जिसमे हर भारतीय मध्यमवर्गीय गृहिणी निपुण होती है ...वे सारी जिंदगी इसके अलावा और करती क्या हैं ...
घर में अचानक मेहमान आ जाये , चाय बनाने का मन नहीं हो तो झट " दूध फट गया ...पता नहीं आजकल कैसा दूध आ रहा है "
बढ़ते हुए बजट को काबू में करने के लिए कई जरुरी चीजों पर कटौती करते हुए इन्हें यह कहते हुए अक्सर सुना जा सकता है ..." इनको और बच्चों को तो ये सब बिलकुल पसंद ही नहीं है (मसलन महंगे होटल में खाना खाना , माल में मूवी देखने जाना आदि आदि ) ...
ननद या बहन का बेटा क्रिकेट का जौहर दिखाते हुए खिडकियों के शीशे तोड़ जाए तो अन्दर ही अन्दर जलते भुनते (कर दिया इतना नुकसान ..अपने खुद के घर में तो खरोंच भी नहीं आने दे )ऊपर से मुस्कुराते " अरे .. बच्चे तो ऐसे ही करते हैं शरारतें ..कोई बात नहीं " कितने नमूने गिनों उनके अभिनय के ....अनगिन ...

मगर कहाँ ....अभिनय के पुरस्कार की लाइन में भी हम मात ही खा गए ...देखे अपने आस पास नजर घुमा कर तो एक से एक अभिनेत्रियाँ भरी पड़ी है ...कई तो बाकायदा अभिनय कक्षा से प्रशिक्षित हो कर आई हैं ....

तभी कही पता चला कि ब्लॉग लेखन में भी मेडल मिलता है ....अब यहाँ बौद्धिक लोगों की आभासी दुनिया में पर रंग रूप कद कोई मायने नहीं रखता इसलिए अपने लिए अपार सम्भावना देख कूद पड़े मैदान में .....मगर ये क्या ...मुंड मुंडाते ही ओले पड़े ....सब एक से एक ज्ञानी ...फिर भी हम कौन इतना आसानी से मैदान छोड़ने वालों में से थे ..." कुछ बात हम ही में है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ..
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा "
बिना विदुषी हुए जो भी उल्टा पुल्टा आता था ...कहानी , कविता , संस्मरण , लेख सब लिख दिए ....मगर अभी मेडल प्राप्त करने के लिए बहुत मुकाम तय करने हैं ...पहले तो तस्वीर होनी चाहिए पर ( यहाँ भी मुंह देख कर तिलक निकाला जाएगा ...पता नहीं था )...और सबसे जरुरी रूग्ण स्त्रैणता / स्त्रियोचित मानसिक रुग्णता (?)नहीं होनी चाहिए ...मतलब रामचरितमानस के पाठ के साथ यहाँ वहां दिए गए लिंक में झाँकने की हिम्मत भी होनी चाहिए ...हाँ ...ये मध्यमवर्गीय रुग्णता तो हो सकती है ...और होगी क्यों नही ...हैं ही मध्यमवर्गीय ....क्यों नाहक भ्रम पाले ....यह रुग्णता सिर्फ और सिर्फ स्वयं की खिंची हुई लक्ष्मण रेखा को स्वीकार करती है ...दूसरों की बनाई हुए रेखाओं को नहीं ... इसलिए यहाँ भी कोई मेडल मिलने की संभावना दूर दूर तक नजर नहीं आ रही ....
एक अदाजी से थोड़ी बहुत उम्मीद थी कि देर सबेर कोई मेडल दे ही देंगी मगर उनके साहित्य पुरस्कारों की आवश्यक शर्तें देखकर आखिरी उम्मीद भी समाप्त हो गयी ....

चलिए... मत दीजिये कोई मेडल ...

बधाई तो दे ही दीजिये ....खिंच खांच कर 100 पोस्ट लिख दिए हैं ....
अग्रिम आभार ....







......................................................................................................................................................

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

टिप्पणी करना और टिप्पणी पाने की चाह रखना क्या सचमुच इतना बुरा है .....!!



किसी भी पोस्ट को पढने के बाद मन में जो भी विचार उठते हैं , उनका सम्प्रेषण ही टिप्पणी है ....कलम के धनी साहित्यकारों और इस आभासी दुनिया से दूर काफी नाम कमा चुके लेखकों और लेखिकाओं को टिप्पणी मिलने या नहीं मिलने से कोई फर्क नहीं पड़ता ...मगर जिन्होंने ब्लॉग के माध्यम से ही अपने आप को अभिव्यक्त करना सीखा हो तो लिखने के बाद उसकी प्रतिक्रिया जानने की उत्सुकता रहती ही है ...टिप्पणी से प्राप्त विचारों और सुझावों से अपनी सोच को और व्यापक करने का तथा लेखन में सुधार लाने का हौसला मिलता है...

मैं ज्यादा दूर क्यों जाऊं ...अपना ही उदाहरण पेश ना कर दूँ ...!!

अख़बारों में पढ़ा था कि गूगल ब्लॉग लेखन की निःशुल्क सुविधा उपलब्ध कर रहा है ....तो बस ऐसे ही पहुच गयी एक दिन ब्लॉगर.कॉम पर ...सोचा ...ब्लॉग बना कर देखते हैं...महज कौतुकवश ही...कई दिन बीत गए उसमे यूँ ही सुधार करते ...इस बीच दूसरों के ब्लॉग पढ़ती रही ...मगर लम्बे समय तक साहस ही नहीं हुआ कि उनपर कमेन्ट कर सकूँ ...यूँ तो पढने लिखने का शौक बहुत पुराना था मगर लेखन सिर्फ डायरी तक ही सीमित था ...या बच्चों के विद्यालय में होने वाले वाद विवाद और निबंध प्रतियोगिता में उनकी मदद करते हुए लिखने तक ...२-३ साल तक एक पत्रिका के लिए हल्का- फुल्का सम्पादकीय भी लिखा था, मगर इधर कुछ वर्षों से लिखना बिलकुल बंद सा हो गया था ...अपनी लिखी कवितायेँ आदि अपने एकाध खास मित्रों के अलावा किसी से कभी शेयर नहीं की थी ...एक दिन ब्लॉग पर कुछ लाईंस लिख ही डाली ...और लिख कर भूल गयी ...२-३ बाद अचानक देखा तो इतनी सारी टिप्पणीयांऔर स्वागत सन्देश ... और लिखने का हौसला मिला....फिर धीरे धीरे फोलोअर्स बनते गए और टिप्पणीयां भी ....जिनमे अक्सर लेखन और ब्लॉग सम्बन्धी सुझाव मिलते रहे ....और इन टिप्पणी का ही असर है कि एक साधारण गृहिणी की जिंदगी जीते पहली बार किसी अखबार में अपनी लिखी कविता भेजने का साहस कर पायी ...तो मेरे लिए तो ये टिपण्णीयां किसी वरदान से कम नहीं है ..क्या अब भी आप कहेंगे कि टिपण्णी देने के लिए ही टिपण्णी करना सही नहीं है ...कौन जाने ये टिप्पणी कितनी छुपी हुई प्रतिभाओं प्रोत्साहित कर सामने आने का मौका और हौसला प्रदान कर दे ...इसलिए टिप्पणी तो जरुर की जानी चाहिए ...भले बिना पढ़े की जाए ....मुझे इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती ...!!

अब कई बार किसी सार्थक बहस के बीच भी हास्य उपजता ही है ....ये जरुर है कि कई लोग उसे व्यक्त नहीं करते और अपनी गंभीरता प्रकट करते हुए टिप्पनी कर देते हैं और कई हास्य प्रधान लोग इस पर चुटकी लेने से बाज नहीं आते ...क्या सार्थक और गंभीर विषय रोते धोते या दार्शनिकता से ही उठाये और निपटाए जा सकते हैं ....!!

हंसी आपको कब कहाँ और कैसे आ जायेगी ...यह कोई निश्चित नहीं है ...यदि हो तो मशीनीकरण होते हुए इसका वास्तविक आनंद ही समाप्त हो जाएगा ... सड़क पर चलते हुए कोई अचानक किसी से टकराकर गिर जाए , कोई सभ्य इंसान सूट-बूट में सज धज कर जा रहो और उसके कपड़ों या सर पर या कौवा बींट कर दे , राह चलते किसी के कपडे कही अटक कर फट जाए , क्या ऐसे मौके पर बहुधा हंसी नहीं आ जाती है ...और कई बार तो शिकार व्यक्ति खुद भी हंस पड़ता है ....नियम के अनुसार तो ये तो बहुत गंभीर बात है कोई बेचारा सड़क पर गिरा पड़ा और आप हंस रहे हो , कौवे ने किसी की दुर्गति कर दे आप फिर भी हंस रहे हो ....मगर क्यूंकि हास्य तनाव और परेशानी से निजात दिलाने की एक प्रमुख क्रिया है ...मौके बेमौके गंभीर बातों पर हंसी आ जाती है और आप सामान्य होकर परेशानी से निजात पाने का तरीका ढूँढने लग जाते हो ...क्या हास्य वाकई इतनी ज्यादा आलोचना किये जाने योग्य है....
जीवन में हास्य ...यहाँ देख सकते हैं कि अवसाद से मुक्ति पाने के लिए जीवन में हास्य चिकित्सा का रूप ले चुका है ...

ब्लॉग लेखन करते , पढ़ते और उन पर टिपण्णी करते हुए ब्लोगर्स के बीच एक रिश्ता सा बन जाता है ....इसी कारण उनके बीच अनौपचारिकता कायम हो जाती है ...ऐसे में कई बार गंभीर अथवा सार्थक लेखों पर भी हलकी फुलकी हास्यात्मक टिप्पणी आ ही जाती है ...जब तक इस तरह की हास्यात्मक टिप्पणी किसी को लक्ष्य बना कर ना की जाये...मुझे नहीं लगता कि यह कोई आपत्तिजनक कार्य है ......बिलकुल नहीं ...बस यह ध्यान रहे कि कोई हमारे मजाक से परेशान , दुखी या लज्जित ना महसूस करे ....

तो बंधु , बांधव , सखा , सखियों ...जी खोल कर टिपियायें...हंस हंस कर टिपियायें ....बिना पढ़े टिपियायें , चाहे जैसे टिपियायें ...मगर टिपियायें जरुर ...!!





******************************************************************************************