नवरात्र के नौ दिन श्रीराम को समर्पित रहे ...ये सच है कि इससे पहले इतना डूब कर श्री रामचरित मानस का पाठ कभी नहीं किया (जय हो ब्लोगिंग देवा ...गंभीरता से पढ़ना सिखा दिया ) ...पढ़ते पढ़ते कई स्थान पर रुक कर मनन भी किया ...बहुत कुछ नया नए प्रकार से सीखने को ,जानने को मिला ...उसका कुछ अंश आप सबसे बाँट लिया है ...देखें ....
दुष्टों का स्वभाव .....सुनहु असंतंह के सुभाऊ। भूलेहु संगति करीअ न काहू ॥
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई । जिमी कपिलाही घालइ हरहाई ॥
अब दुष्टों का स्वभाव सुनो , कभी भूलकर भी उनकी संगती नहीं करनी चाहिए । उनका संग सदा दुःख देनेवाला होता है जैसे हरहाई गाय कपिला गाय को अपने संग से नष्ट कर डालती है .....
खलन्ह ह्रदय अति ताप बिसेषी । जरहिं सदा पर संपत्ति देखी ॥
जहँ कहूँ निंदा सुनहि पराई । हरषहिं मनहूँ परी निधि पाई ॥
दुष्टों के ह्रदय में बहुत अधिंक संताप होता है । वे परायी संपत्ति (सुख ) देखकर सदा जलते रहते हैं । वे जहाँ कहीं दूसरों की निंदा सुन पाते हैं , वहां ऐसे हर्षित होते हैं मानो रास्ते में पढ़ी निधि (खजाना ) पा लिया हो ।
काम क्रोध मद लोभ परायन । निर्दय कपटी कुटिल मलायन ॥
बयरु अकारन सब काहू सों । जो कर हित अनहित ताहू सों ॥
वे काम ,
क्रोध, मद और लोभ के परायण तथा निर्दयी, कपटी , कुटिल और पापों के घट होते हैं । वे बिना कारण ही सब किसी से बैर किया करते हैं । जो भलाई करता है उसके साथ भी बुराई करते हैं ।
झूठई लेना झूठई देना । झूठई भोजन झूठई चबेना ॥
बोलहिं मधुर बचन जिमी मोरा। खाई महा अहि ह्रदय कठोर ॥
उनका झूठा ही लेना और झूठा ही देना होता है । झूठा ही भोजन होता है और झूठा ही चबेना होता है (अर्थात वे लेन - देन के व्यवहार में झूठ का आश्रय लेकर दूसरों का हक़ मारते हैं और चबेना चबाकर माल खाने की बात करते हैं ) जैसे मोर (बहुत मीठा बोलता है परन्तु ) का ह्रदय ऐसा कठोर होता है कि वह महान विषैले सर्पों को भी खा जाता है । वैसे ही दुष्ट भी ऊपर से मीठे बचन बोलते हैं परन्तु ह्रदय के बड़े निर्दयी होते हैं ।
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद ।
ते नर पांवर पापमय देह धरे मनुजाद ॥
वे दूसरों से द्रोह करते हैं , और पराये धन, परायी स्त्री और पराई निंदा में आसक्त रहते हैं । वे पामर और पापमय मनुष्य नर शरीर में धारण किये हुए राक्षस ही हैं ।
लोभई ओढ़न लोभई डासन । सिस्नोदर पर जमपुर त्रासन्न ॥
काहू की जों सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहीं जनू जुडी आई ॥
लोभ ही उनका ओढना और बिचौना होता है । वे पशुओं के सामान होते हैं , उन्हें यमपुर का भय नहीं लगता । यदि किसी की बडाई सुन लेते हैं तो ऐसी सांस लेते हैं , मनो उन्हें जूडी आ गयी हो ...
जब कहूँ के देखहिं बिपति। सुखी भये मनहूँ जग नृपति ॥
स्वारथ रत परिवार बिरोधी । लम्पट काम लोभ अति क्रोधी ॥
और जब किसी को विपत्ति में देखते हैं , तब ऐसे सुखी होते हैं मानो जगत भर के राजा हो गए हों । वे स्वार्थपरायण परिवार वालों के विरोधी, काम और लोभ के कारण लम्पट और अत्यंत क्रोधी होते हैं ।
माता पिता गुरु विप्र न मानहीं । आपु गए अरु घालहि आनहि ॥
करहिं मोह बस द्रोह परावा । संत संग हरी कथा न भावा ॥
वे माता पिता , गुरु किसी की भी नहीं मानते। आप तो नष्ट हुए ही रहते हैं , साथ ही अपने संग से दूसरों को भी नष्ट करते रहते हैं । मोहवश दूसरों से द्रोह करते हैं। उन्हें न संतों का संग अच्छा लगता है , न भगवान की कथा सुहाती है ।
अवगुन सिन्धु मंदमति कामी । बेद बिदूषक परधन स्वामी ॥
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा । दंभ कपट जिय धरे सुबेषा ॥
वे अवगुणों के समुद्र , मंदबुद्धि कामी और पराये धन को लूटने वाले होते हैं । वे दूसरों से द्रोह रखते हैं। उनके ह्रदय में कपट और दंभ भरा होता है परन्तु वे सुन्दर वेश धारण किये रहते हैं ...
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