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सोमवार, 23 जुलाई 2012

लड़कियां इतनी खुश कैसे रह लेती !!


एक ज़माने में सभी लड़कियां खूबसूरत थी या नहीं  रोती बहुत थी. चक्की चलाते आटा पिसती , तेज धूप में मीलों सिर पर पानी की गागर उठाये चलती , कपास कातती, खेतों से सिर पर मनों वजन उठाये उबड़ खाबड़ सड़क पर लड़खड़ा कर  चलते सहमकर बातें करती , हंसती मुस्कुराती यूँ कि जैसे रोती थी .
वक़्त से पहले झुकती कमरें , चेहरों की झुर्रियों वाली उन रोती हुई उदास स्त्रियों में से ही किसी एक ने रची एक कहानी , यह सोच कर कि उनकी बेटी को भी यूँ ही रोना ना पड़े ....
ठुड्डी पर दोनों हाथ टिकाये एक उदास बच्ची को उसकी माँ ने पास बुलाया , गुदगुदाया ...क्या हुआ ?
कुछ नहीं ...अनमनेपन से नहीं कहते हुए  उसकी आँखों के पीछे उदासियों का शुष्क समंदर लहराया ... 
हूँ ...माँ की आँखों में प्रश्न नहीं थे ! वह भी कभी एक ऐसी ही उदास बच्ची थी , उसकी नानी भी , दादी भी ....
मगर उस माँ को इन उदासियों को यही रोक देना था ...
तुम्हे पता है , मैं जब छोटी थी मेरे माँ ने मुझे एक कहानी सुनायी थी , तुम सुनोगी ...
हाँ हाँ, क्यों नहीं . मगर परियों वाली , सफ़ेद घोड़े के राजकुमार की कहानी तो तुम मुझे कई बार सुना चुकी ....अब लड़की की आँख में आकाशदीप झलका.
कहानी तो सुनायी मैंने  लेकिन कहानी कहते हुए माँ ने जो कहा  मैंने नहीं सुनाया ...
तुम्हे पता है जिस वक़्त परमात्मा ने सृष्टि रची स्त्री को बनाया . उसी समय उस ने किसी को उसके लिए बनाया जो उसे हर समय प्रेम करता है , हर स्थिति में , उसके होने में , ना होने में ! अच्छे- बुरे होने में , सफल -असफल होने में ! वह उसे कभी मिलता है  कभी नहीं मिलता है , कभी दिखता है  कभी नहीं दिखता है ...मगर वह होता है या होती भी है !   

ऐसा हो सकता है मां , ऐसा होता है !! 

हाँ. होता है ना . वह हमेशा सफ़ेद घोड़े पर आने वाला राजकुमार ही नहीं होता . हाथ पकड़कर पुल पार कराने वाला पिता भी हो सकता है . चोटी खींच कर भाग जाने वाला भाई  रूठ कर मनाने वाली बहन चिढाते रहने वाला मित्र  कोई भी हो सकता है ...वह दृश्य हो या अदृश्य , मगर वह होता जरुर है ! 

लड़की की आँखों के शुष्क समंदर में आशाओं का पानी उतर आया था ...

तुमने मुझे बताया , मगर सब उदास बच्चों को कैसे पता होगा ....
तुम उनको यही कहानी सुनाना !

लड़की ने इस कहानी के आगे सोचा ... कहानी सुनाने के साथ वह स्वयं भी तो वैसी ही हो जाए तो , जैसे कि किसी को ईश्वर ने किसी के लिए बनाया , उसे भी बनाया ...
आँचल के साए में घेर लेने वाली मां , अनुशासन में सुरक्षित  रहने की सीख देता पिता , उसकी पसंद की चीज बहुत खिझा कर देने वाला  वाला स्नेहिल भाई या बहन , सन्मार्ग को प्रेरित करता मित्र , कंटीली राहों पर क़दमों के नीचे फूल बिछाने वाला प्रेमी या हाथ पकड़कर हर मुश्किल में साथ रहने वाली प्रेमिका ....
वह जितनी अपने करीब आती गयी वैसी ही होती गयी  जैसे कि ईश्वर ने उसे किसी के लिए बनाया . 

उस लड़की ने कहानी में सब कहा  जोड़ा और स्वयं भी वैसी हो गयी . जब वह लड़की बड़ी हुई . माँ हुई तब उसने अपनी बेटी को सुनायी  यही कहानी ... पीढ़ी दर पीढ़ी सब कहते सुनते गये . खुशहाल होते गये ....

वरना ऐसा कैसे हो सकता था कि लड़कियां इतनी खुश रह लेती !!!!

सोमवार, 16 जुलाई 2012

कब मिल पायेगा लड़कियों को एक सुरक्षित समाज ....


कहीं किसी शहर के एक कमरे (कमरा कहा है , कौन लोंग हैं --अंदाज़ा लगायें ) में कुर्सियां लगा कर विडियो पर फिल्म देखी जा रही थी  . दृश्य देखते अचानक इन्ही लोगों के बीच एक पत्रकार जैसा व्यक्ति  बदहवास- सा नजर आता है . साथियों के पूछने पर  कुछ नहीं कहता , अचानक उठ कर चल देता है . दूसरे दिन उस व्यक्ति की बहन  की  आत्महत्या की खबर अख़बारों में . 
नहीं जानती कितनी सच्चाई थी इन उडती -सी ख़बरों में , मगर इस तरह हुआ एक बेइन्तहा खौफनाक काण्ड का खुलासा जिसने सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न राज्य में अफरातफरी मचा दी  . जिस तरह परते खुलती गयी , लड़कियों की आत्महत्याओं की संख्या बढती गयी. 
सुनने में आया कि इस दलदल में लड़कियां अपनी मर्जी से जानबूझकर नहीं आई ...एक लड़की, उसकी सहेली  , फिर उसकी सहेली , किसी की ननद , किसी की भाभी , किसी की कोई  ...अपने बचाव के लिए दूसरे को फंसाने  से शुरू हुए इस  ब्लैकमेलिंग के  सफ़र की गिरफ्त में संभ्रांत परिवारों की जाने कितनी लड़कियां भंवर की तरह उलझती  गयी . 
हममे से शायद ही कोई इस तथ्य से अपरिचित होगा  कि एक सभ्य माने जाने वाले समाज में व्यापक स्तर पर ब्लैकमेलिंग क्यों कर संभव हो पाती है . लड़कियों/स्त्रियों के भीतर अपनी या परिवार की बदनामी का भय या फिर  अपने  अपने साथ हुई अनहोनी का जिक्र अपने परिवार से करने का साहस ना हो पाना,  साहस कर भी लिया तो दोषी उन्हें ही ठहराया जाना ...सबसे दुखद यह है ऐसे संगीन मामलों की शुरुआत अक्सर  नजदीकी रिश्तेदार , करीबी मित्रों से ही होती है .  
यदि उस दिन उस व्यक्ति ने वह विडियो नहीं देखा होता तो जाने यह सीरिज जाने कितनी लम्बी चलती .... जिन लोगों का जिक्र यहाँ हैं वे शायद अपनी ड्यूटी निभा रहे थे , मगर ऐसे लोगो की कमी नहीं है जो अपने शौक के लिए ऐसी  फ़िल्में देखते हैं और बड़े फख्र से मनोवैज्ञानिक कारणों का तर्क देते हुए उसका स्पष्टीकरण भी देते हैं . कहा जाता है कि जब लड़कियां खुद अपने आप को उघाड़ रही है तो हमें देखने में हर्ज़ क्या, बल्कि उन्हें बोल्ड होने की संज्ञा देते हुए उनकी प्रशंसा की जाती है . कितने ही तर्कों से इसे ढांकने की कोशिश की जाए मगर सच यह है कि इस तरह की फ़िल्में या साहित्य समाज में एक निम्न स्तर की घृणित उत्सुकता जगाती है जिसकी आंच उन बोल्ड/मजबूर  लड़कियों से होती हुई सामान्य घरों तक पहुँचती है . उच्च वर्ग की बोल्ड लड़कियां अंग प्रदर्शन कर  करोड़ों कमाती हैं मगर इसके बुरे साईड इफ़ेक्ट के रूप में सामान्य घरों की लड़कियां  या स्त्रियाँ उन निम्न स्तरीय निर्माताओं के हाथ की कठपुतली बनती है  जो कम पैसे खर्च कर करोड़ों कमाना चाह्ते हैं ,  लड़कियों की बोल्डनेस को ढाल बनाने वाले उपर्युक्त घटना से जान सकते हैं कि वे बोल्ड किस प्रकार  बनाई जाती है. घृणित उत्सुकता  सस्ते विकल्प के रूप में छिपे कैमरों को किसी मॉल के चेंजिंग रूम से  लेकर किसी होटल के कमरे तक पहुंचाती है . परेशान लड़कियां चीख कर खुले आम कहती हैं कि जब बिकना ही है तो अपने दाम और अपनी शर्तों पर क्यों नहीं---- काश यह समाज   इन शब्दों के पीछे  की गहन  पीड़ा , क्षोभ , दर्द , टीस को महसूस कर सकता . दरअसल उनकी चीख सफेदपोशों के चेहरे पर झन्नाट थप्पड़  है जिससे बौखलाते हैं हम सब मगर  हम उनकी तकलीफ को महसूस नहीं करते , बल्कि उन्हें चालू , कुलटा , वेश्या , लालची, व्यभिचारिणी  के उपनाम दे कर निश्चिन्त हो जाते हैं . 

इस बीच देश को शर्मसार करने गुवाहाटी की घटना से आहत लोंग तर्क देते नजर आते हैं कि इव टीजिंग की घटनाएँ स्त्री- पुरुष को एक- दूसरे से अलग रखने के कारण संभव हो पाती है . तब तो ये निर्माता बड़ा नेक(??) करम कर रहे हैं .
आदि हो जाने का क्या मतलब है , मुझे  यही समझ नहीं आया . क्या ये लोंग अपने घर में अपनी  माँ -बहनों-भाभी -चाची-या अन्य महिला रिश्तेदारों  के साथ नहीं रहते ?  बच्चे कैसे शिक्षा प्राप्त करें यह अलग बात है , वे साथ पढ़ते हैं , लिंग विभेद के बिना आपस में बातचीत करते हैं , इसलिए उन्हें एक दूसरे से बात करने में संकोच नहीं होता , यह बिलकुल अलग बात है . इसका इव टीजिंग से कोई  वास्ता  नहीं है. स्त्रियों के प्रति अभद्र व्यवहार किसी  व्यक्ति/ समाज विशेष की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है .  
यदि स्त्री -पुरुष का अलग संसार ही इन दुष्कृत्यों का कारण है  तो इस दृष्टिकोण  से  हर धर्म के साधू -सन्यासी , ब्रह्मकुमारी , सिस्टर या नन, अविवाहित स्त्री- पुरुष , विभिन्न कारणों से एक दूसरे से दूर रहने वाले  पति- पत्नी आदि, इन  सभी को  दुराचारी या विपरीत लिंग के प्रति अभद्र हो जाना चाहिए. इस प्रकार के तर्क  दुराचरण को सिर्फ एक आवरण प्रदान करते हैं.  

कुछ लोगो का हास्यास्पद तर्क सुना / पढ़ा कि लड़कियों का खुला स्वभाव या उनके छोटे वस्त्र ही इव टीजिंग की घटनाओं का कारण बनते हैं या उकसाते हैं . आये दिन अखबार रंगे होते हैं छोटे बच्चों के साथ दुराचरण की ख़बरों से . क्या मासूम बच्चे किसी प्रकार की उकसाहट का कारण बन सकते हैं .    क्या पूरे वस्त्र पहने स्त्रियाँ अभद्र नजरों, कटाक्षों या व्यवहार से बच पाती हैं ...नहीं .  
बुरी नजरों या अभद्र व्यवहार का कारण  मानसिक रुग्णता ही अधिक होती है . 
दुष्ट प्रवृतियाँ बुरी संगति , घटिया साहित्य या मानसिक रुग्णता के कारण होती है , निराकरण इन परिस्थितियों का किया जाना चाहिए . 
मेरी समझ से दुराचरण या अभद्र व्यवहार के दोष से बचने के लिए स्त्री -पुरुषों को  एक दूसरे के शरीर का  आदि बनाये जाने की बजाय  आत्मनियंत्रण सीखने /सिखाने की आवश्यकता अधिक  है  . विभिन्न समाजों में स्त्रियों या लड़कियों को यह बहुत समय से सिखाया जाता रहा है , इसलिए पुरुषों के प्रताड़ित होने की संख्या ना के बराबर रही है.  यदि हम सामाजिक संतुलन के लिए स्त्रियों को दुर्व्यवहार अथवा अभद्र व्यवहार से बचाना चाह्ते हैं तो पुरुषों को भी उसी मात्रा में संयम और आत्मनियंत्रण सीखने और सिखाये जाने की आवश्यकता अधिक है ना कि स्त्रियों को और अधिक बंदिशों में रहने /रखने अथवा उघाड़ने की सीख दिए जाने की . 

समस्या जिस भी कारण से हो , आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण से बढ़कर और कोई समाधान मुझे नजर नहीं आता .
आत्मसंयम के प्रश्न पर मुझे  स्वामी विवेकानंद से जुडा संस्मरण याद आता है ...  
अमेरिका भ्रमण के समय एक महिला ने स्वामी जी से विवाह की इच्छा प्रकट की क्योंकि वह उनकी विद्वता पर  मोहित थी . स्वामी जी ने जब उस महिला से उनसे विवाह का कारण जानना चाहा तो उसने बताया कि वह विवेकनद जैसे जहीन बच्चे की माँ बनना चाहती है . तब उन्होंने स्वयम को ही उनके बच्चे के रूप में प्रस्तुत किया .  




(यह अधूरा लेख ड्राफ्ट में सेव था , पिछले दो दिन व्यस्तता में रहे , तभी रश्मि रविजा की पोस्ट नजर आ  गयी  . स्त्रियों के प्रति अभद्रता और उन्हें बाजार बना दिया जाना , दोनों ही विषय एक दूसरे से सम्बद्ध नजर आये तो उसकी पोस्ट की टिप्पणी के रूप में लेख को  विस्तार दिया ) 

शुक्रवार, 29 जून 2012

बात तो दिमाग के खुलेपन की है ....

गत 25 माई को राजस्थान की एक  दिलेर जांबाज सुपुत्री  दीपिका राठौर ने एवरेस्ट पर फ़तेह हासिल कर इस स्थान पर झंडा फहराने वाली पहली राजस्थानी महिला होने का गौरव प्राप्त किया . भ्रूण हत्याओं , दहेज़ हत्याओं की  ख़बरों के बीच यह खबर एक सुखद बयार सी लगी . भ्रूण हत्याओं  के कारण लड़कियों की बीच घटती औसत जन्मदर के बावजूद  राजस्थान की बेटियों ने यूँ भी परचम कम नहीं लहराए हैं . इससे पूर्व राजस्थान की ही स्नेहा शेखावत ने 63वें गणतंत्र दिवस परेड में वायु सेना का नेतृत्व कर इतिहास रचा . गौरतलब हैं कि ये लड़कियां राजस्थान के छोटे कस्बे से निकल कर आये माता- पिता की संतान हैं . गाँवों में पाले बढे ये अभिभावक और इनकी संतान एक बेहतर उदाहरण है कि खुले दिमाग के लिए शहरी आबोहवा ही ज़रूरी नहीं है . इन अभिभावकों ने अपनी पुत्रियों को भी पुत्र की तरह ही आगे बढ़ने का अवसर प्रदान किया और परिणाम आज अपनी ख़ास राजस्थानी कुर्ती- कांचली में पूर्व मुख्यमंत्री के हाथों  मिठाई और बधाई प्राप्त करते उनके गर्वोन्मत्त चेहरे पर साफ़ नजर आता है .  




कुछ समय पूर्व ही एक राजपूत विवाह समारोह में जाना हुआ . जयमाल कार्यक्रम संपन्न हो चुका था. सामने स्टेज पर दूल्हा- दुल्हन को घेरे लम्बे घूंघट सहित राजपूती परिधान में बहुत सी स्त्रियों  को देखते हुए पतिदेव ने मुझे ही वहां जाकर दुल्हन की माँ को लिफाफा दे आने के लिए कहा क्योंकि हमें एक और विवाह समारोह में भी शामिल होना था . चूँकि मैं उन महिला से कभी मिली नहीं थी  तो पतिदेव ने बताया कि तुम   उक्त महिला का नाम लेकर किसी से भी पूछ लेना. घूंघट वाली महिलाओं के झुण्ड के बीच उन महिला तक पहुँच उन्हें बधाई देकर जाने लगी तो वे पतिदेव से मिलने मेरे साथ ही आ गयी यह कहते हुए कि बिना भोजन किये नहीं जाए . 
इस बीच मैंने उन्हें पूछ ही लिया ,लम्बे  घूंघट में इन लोगों को परेशानी नहीं होती . दुल्हन के चेहरे पर भी  लम्बा घूंघट है . तस्वीरों में चेहरा भी नजर नहीं आएगा .वे सिर्फ मुस्कुरा कर रह गयी . बाद में पतिदेव ने बताया कि वे उनके कार्यालय में कार्यकुशल रौबदार  अधिकारी  हैं. 

विवाह के कुछ वर्षों बाद एक परिचित प्रधानाध्यापिका से एक इंटरव्यू के दौरान मिलना हुआ . उलटे पल्ले की साड़ी में उनके सादा सौम्य स्वभाव ने बरबस ही मोह लिया था . मेरी हिचकिचाहट को देखते हुए उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि तुम घर में घूंघट में रही हो  सिर्फ इसलिए मत सकुचाओ . तुम्हे पता है, जब मैं विवाह होकर ससुराल आई थी तो बहुत लम्बे घूंघट में रहना होता था . शादी के बाद ही मैंने बी एड किया . तब घर से परदे में निकलती थी और वापस घर लौट कर भी उसी परदे में रहना होता था . मगर इससे मेरी शिक्षा पर कोई असर नहीं हुआ. प्रधानाध्यापिका होने का आत्मगौरव उनके  चेहरे पर इसकी चुगली खा ही रहा था . हालाँकि छोटे बच्चों के कारण होने वाली असुविधा को देखते मैं उनके  प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकी परंतु एक अच्छी सीख तो मुझे उनसे मिल ही गयी कि ढ़के हुए सिर के भीतर भी खुले दिमाग हो सकते हैं . 

हिंदी की एक विदुषी प्रोफ़ेसर जिनका स्टडी रूम  मूल्यवान साहित्यिक  कृतियों से सजा -धजा है . जब भी हमसे मिलने घर आती , अपने सास- श्वसुर  के सामने उन्हें सिर ढ़के हुए ही पाया . 

वाणिज्य की  गोल्ड मेडलिस्ट व्याख्याता , आयुर्वेद की जानी- मानी वैद्य , एल एल बी में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण प्रतिभावान वकील , जाने कितनी महिलाओं से मिलना हुआ जो घर में सिर ढ़के हुए या घूंघट में मिली . 


सगाई के लिए ससुराल से आई महिलाओं के एक हाथ लम्बे घूंघट को देखकर मैंने पास बैठी ननद से धीरे से पूछ लिया ." आपके यहाँ इतना लम्बा घूंघट निकलते हैं " . वे मुस्कुराती हुई बड़े गर्व से बोली - हाँ.  
स्वयं को बुद्धिजीवी मानने वाले इस दिल और दिमाग के कितने टुकड़े हुए, बता  नहीं सकती थी . मेरा मायका भी कोई आधुनिक बस्ती का जमावड़ा नहीं था . वहां भी महिलाएं  अपेक्षाकृत   कम परदे में मगर रहती तो थी और चूँकि विवाह की स्वीकृति भी उनके घर के रीति -रिवाज़ और संस्कारों को जानते हुए ही दी थी  इसलिए विरोध करने का कोई कारण भी नहीं बनता था . विवाह के बाद घर की बुजर्ग महिलाओं से भी लम्बे घूंघट निकलने की ताकीद मिली तो एक आह निकल कर रह गयी . बुजुर्ग महिलाओं के सामने पति से बात नहीं करना ,  जेठ- ससुर से पर्दा करना और  उनसे कुछ पूछना कहना हो तो एक मध्यस्थ की आवश्यकता . यदि  घर में कोई और नहीं हो तो क्या करें , कुछ समझ नहीं आता था .  
एक रिश्तेदार के साथ जब सिनेमा देखने निकले तो रास्ते में मुझसे बोली ." भाभी , आप ठीक से सिर नहीं ढकती है . किसी ने देख लिया तो घर पर शिकायत कर देगा ".
 मैंने बड़ी उलझन में कहा . अब क्या सिनेमा भी घूंघट निकाल कर देखा जाएगा और यहाँ इस भीड़ में मुझे कौन पहचानता है . 

विवाह के बाद के इन चौबीस वर्षों में बहुत कुछ बदला है . आज पारिवारिक कार्यक्रमों में वही परिचित महिला कहती नजर आती है ," अरे , छोडो ये सब घूंघट , आप लोंग तो जेठ -ससुर जी से बात किया करो , हम कब तक मध्यस्थ बने रहेंगे ". 

इसके विपरीत आजकल परिचित  अथवा  रिश्तेदार अपेक्षाकृत  कम पढ़ी-लिखी , आधुनिक महिलाओं से साक्षात्कार  कम नहीं होता  . सिर ढकना , घूंघट करना , बड़ों के पैर छूना जैसे कार्यों को दकियानूसी मानने वाली इन रूपसी सजी धजी महिलाओं से बात कर देख लो  तो उनकी आधुनिकता की पोल पट्टी दन से उघड़ जाती है . 

इसका मतलब यह हरगिज नहीं है कि पर्देदार महिलाएं सब सुसंस्कृत ही होती है और आधुनिकाएं बिगडै़ल या दिमाग से पैदल . गज भर घूंघट में चपड़ -चपड़ कर लड़ती स्त्रियाँ भी नजर आ जायेंगी तो  वहीं बिना परदे आँखों की शर्म लिए सभ्य महिलाएं भी .   
यह सब लिखते हुए दिमाग में हलचल भी हो रही है , सिर्फ महिलाओं के लिए ही क्यों है यह सब , आँख में लज्जा , जुबान में मिठास ...मैं यह सब क्यों लिख रही हूँ . हम लोग पुरुषों के लिए क्यों नहीं सोचते ...वे क्या पहने , कैसे बोले , उनके संस्कार , आदर्श , लिहाज़ . इन पर इतनी कम बात क्यों होती है !
खैर , फिलहाल इस दिमागी हलचल को एक तरफ रख कर अपने दिल और दिमाग की  सम्मिलित संतुलित पुकार को ही सुन लेती हूँ ....

विगत वर्षों  में यह अच्छी तरह जान लिया है कि  घूंघट या पर्दा तो एक आवरण भर है .   स्त्री -पुरुष के विभेद के बिना यह निष्कर्ष तो निकल ही आया है  कि ढके हुए सिर के भीतर खुले दिमाग भी हो सकते हैं और उघाड़े माथे के भीतर सब कुछ खाली भी हो सकता है . 

इस लिहाज़ से यह  पुरानी पोस्ट भी ताज़ा ही है ..

शनिवार, 19 सितंबर 2009

क्यों भाई क्यों ..??

अभी एक दिन लिंक से लिंक जोड़ते हुए जब एक ब्लॉग पर पहुँची तो काफी लंबे अरसे से दिमाग में उमड़ घुमड़ रहा कुछ विचारों की शक्ल लेने लगा। किसी ब्लॉग पर एक मोहतरमा बता रही थी कि उन्हें ऑरकुट के जरिये उन्हें ब्लॉग पर एक भाई मिला ...न ना ...मैं यहाँ कुम्भ के मेले में बिछडे भाई की बात नही कर रही हूँ ..उनका मतलब था कि ऑरकुट पर उनकी एक व्यक्ति से जान पहचान हो गयी ..जिसे उन्होंने भाई कहा ...तो वह लड़का बहुत भावुक हो गया ..कि आज से पहले किसी ने उसे सोशल नेट्वर्किंग साईट पर भाई नही कहा था ...बहुत अभिभूत था वह
बात बचकाना सी है जिसे नजरंदाज कर आगे किसी दुसरे लिंक पर आगे बढ़ा जा सकता था ...मगर ये दिमाग ठस से वहीं पसर गया ...आगे यह पढ़कर की ...अब उनके इस भाई को ऑरकुट पर आना पसंद नही था जबकि उनकी जान पहचान इसी मध्यम से हुई थी...
यह है हमारे अधिकांश भारतीय मध्यमवर्गीय युवकों की सोच ...मैं कहना चाहती थी ...क्यों भाईजान ...जब ऑरकुट पर आना ..दोस्त बनाना इतना ही बुरा है तो आप यहाँ किस खुशी में तशरीफ़ लिए आते हैं ...जो कार्य वह उन लड़कियों और महिलाओं के लिए बुरा नही है ...जिनका जन्मे से ..विधि से ..या मन से आपका कोई रिश्ता नही है ...वही कार्य आपकी बहन के लिए बुरा क्यों है ...क्यों भाई क्यों ...??
यह वाकया हमारे समाज में दोहरी मानसिकता वाली सोच को प्रतिबिंबित करता है ...हमारे परिवारों में बहन बेटियों बहुओं के लिए अलग नियम कानून बनाये जाते हैं जबकि होने वाली पत्नियों और बहुओं के लिए अलग ...
जब शादी के लिए लड़की पसंद करने निकलेंगे तो उनके मापदंड कुछ और होते हैं ...और जब उसी लड़की को घर की बहु बनाकर ले आयेंगे तो उसके लिए अलग नियम कानून लागू कर दिए जाते हैं ...क्या यह हास्यास्पद नही है ...शादी से पहले जिस लड़की को आपने जींस पैंट सलवार कुरता में बेपर्दा ही पसंद किया हो ...अपने घर आने के बाद उससे अपेक्षा की जाए कि ...वह 6 गज की साड़ी लपेटकर...घूँघट नही तो कम से कम सर तो ढक कर ही रखे...उसकी शिक्षा , घरेलू कार्यों में उसकी दक्षता और रुचियों की पूरी जानकारी ली जाए मगर साथ ही उससे यह अपेक्षा रखी जाए की उसकी शिक्षा दीक्षा और रुचियाँ उनकी जरुरत के हिसाब से आर्थिक भार को कम करने में काम आए ना की उसके स्वयं के व्यक्तित्व के विकास में .