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गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

प्रजा मस्त , राजा पस्त ....


राजा  के राज्य में हर ओर अमन चैन था।  अच्छी बरसात ने झीलों  ,कुओं और तालाबों को लबालब  कर दिया . फसलों की हरियाली लुभावनी थी. गायों और भैंसों को ताजा हरा चारा प्राप्त था . शुद्ध दूध, दही ,घी प्रचुर मात्रा  में उपलब्ध था।  प्रजा  को  ताजा फल ,हरी सब्जियां ,  अनाज भी उपयुक्त कीमत पर मिल रहे थे लिहाज़ा अच्छी खासी सेहत के साथ कोई भूखा नंगा नहीं था।  खेत , व्यवसाय , उद्योग और राजकीय कार्य में व्यस्त प्रजा को मनोरंजन के तमाम विकल्प भी उपलब्ध थे।  हर और ख़ुशी का साम्राज्य था। सुबह शाम खुशनुमा हुए जा रहे थे . प्रजा अपने कार्य करती ,मनोरंजन करती , खाती पीती  सोती और जागती।  

मंदिर ,मस्जिद , गुरूद्वारे ,गिरिजाघर  में समय पर झालर, घंटे ,  मंजीरों और नियमानुसार समय से होने वाली आरती , प्रार्थनाओं  ने ईश्वर को विसराने  ना दिया , मगर धीरे- धीरे राजा के महल में फरियादों की संख्या नगण्य हो गई। 

महल के बाहर टंगे घंटे ने जाने कब से टंकार नहीं सुनाई . राजा की जय हो , न्याय की विजय हो ,भी कानों में सुन नहीं पड़ते और  ना ही प्रजा में राजा की दयालुता के चर्चे। सत्ता के केंद्र का आकर्षण बने राजा के कानों  को याचना और प्रशंसा की कमी खलने लगी।  वह कैसा राजा जिसे दयालुता दिखने का मौका ना मिले .  न्याय -अन्याय की तराजू पर अपने फैसलों पर  प्रजा की  जयकार सुनने अवसर ना मिले। 

राजा के कानों में सरसराहट होने लगती। बार -बार लगता कोई पुकार रहा है  मगर दूर -दूर तक कोई नहीं।  कान थपथपाकर कर  दोनों सिरे खींच कर सुनने का प्रयास करता मगर कोई लाभ नहीं।  जैसे -जैसे समय बीतता गया कानों में खुजली  बढ़ने लगी।  बात करते , खाते पीते , सोते जागते राजा के हाथ कानों पर।   राजा  की इस परेशानी को रानियों ने ,दासियों ने  दरबारियों ने सबने देखा ,महसूस किया।  आखिर राजवैद्य जी  को बुलाया गया।  वैद्य ने हर प्रकार से निरीक्षण  कर जाना कि बीमारी तन की नहीं  मन की थी। राजवैद्य ने राज ज्योतिषी की सलाह ली और बीमारी के निराकरण हेतु प्रजा की सेवा करने  गरीबों को  वस्त्र , अनाज , आभूषण आदि दान करने तथा अनाथालय /चिकत्सालय  आदि  के निर्माण  का उपाय सुझाया गया। 

राजा ने दरबारियों से मशवरा किया और गरीबों , अनाथों , बीमारों को दरबार में उपस्थित होने को कहा  मगर यह क्या।  राज्य में कोई गरीब , अनाथ अथवा मरीज न था।  दरबार में फरियादी का स्थान खाली का खाली। राजा की खुजली दिन बी दिन बढ़ती ही जाए। 
राजा की व्यग्रता देखकर कुछ वरिष्ठ मंत्रियों दरबारियों ने मिल कर फैसला लिया . राज्य में कर बढ़ा दिए गए . खेतों में खड़ी फसलों को  गौशाला और अश्वशाला के निवासियों के सुपुर्द कर दिया गया .  सर्दी में जल रहे अलाव की अग्नि रहस्मय रूप से खलिहानों तक पहुँच गयी।  प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गयी। कुछ ही दिनों में कंगाल/ गरीबों और मरीजों की संख्या बढ़ती गयी। प्रजा के दुखों का भार बढ़ते राजा के महल तक जा पहुंचा।  आये दिन महल के बाहर बने घंटे की टंकार सुनाई देती रहती। राजा  के कानों की खुजली और सरसराहट कम होने लगी। 
 फरियादी की बढ़ती संख्या देख शासन ने मुनादी करवाई . राजा प्रति सप्ताह गरीबों को अपने हाथों से अन्न , वस्त्र , दवा आदि  दान करेंगे। जिस तरह राजा दान करते , उसी तरह जनता पर कर की दर बढ़ा दी जाती। कर बढ़ते ..प्रजा व्यथित  होती . राजा दान करते .  प्रजा राजा की दयालुता की सरहाना करते हुए अति विनम्रता से दान ग्रहण करती।  

चतुर दरबारियों ने राजा के कानों की खुजली का स्थाई इलाज़ ढूंढ निकाला।  राजा अब सदा के लिए स्वस्थ था।  

शनिवार, 20 जुलाई 2013

संता -बंता का व्यक्तित्व प्रशिक्षण ...

भयंकर प्रतिस्पर्धी इस युग में अधिकांश मानव चाहे- अनचाहे तनाव , कुंठा ,मनोविकार , अवसाद से  गुजरते ही हैं . संतुष्ट ख़ुशी  जीवन बिताने वाले भी कभी न कभी ऐसे कठिन पलों का सामना करते हैं . इसलिए आजकल तमाम प्रकार के शिक्षण शिविर जैसे   जीवन जीने की कला , योग , तनावमुक्त कैसे रहें , जैसे चलने वाले केन्द्रों और गुरुओं की चल निकली है . कौन  नहीं चाहता लब्‍धप्रतिष्‍ठ, स्वस्थ , सर्वोच्च बने रहना .

संता -बंता इससे अछूते कैसे रहते . सोचने लगे कि आजकल धंधा भी मंदा चल रहा है तो क्यूँ ना ऐसा ही कोई शिक्षण शिविर लगा लिया करें , बड़े लोग आयेंगे , संपर्क होंगे , नाम -दाम सब मिलेगा . मगर एक मुश्किल थी कि उनके पास ऐसी कोई डिग्री नहीं थी ,ना ही वे प्रशिक्षित थे . नामी- गिरामी अनुमोदनों के  बिना कौन आता उनकी कक्षा में .  जो सबसे पहले उन्होंने स्वयं  के प्रशिक्षण का जुगाड़ किया और एक ऐसे ही शिविर में अपना नाम दर्ज करवाया .

पहले ही दिन उपदेशक ने उन्हें पढाया ....

"व्यक्तित्व विकास की इस कक्षा में आपका स्वागत है .मैं आशा करता हूँ कि मेरे अनुभव और ज्ञान से आपलोग लाभान्वित होंगे ...आईये ...सबसे पहले हम जानते हैं व्यक्तित्व के बारे में....व्यक्तित्व क्या होता है ...हर इंसान अपने व्यवहार , आचार , विचार से एक विशिष्ट व्यक्ति होता है ...हर इंसान के अपने आपको अभिव्यक्त करने का तरीका होता है और इसी से उसका व्यक्तित्व उजागर होता है ...मगर सबसे पहले हम जान ले कि व्यक्ति कितने प्रकार के होते हैं.

प्रत्येक व्यक्ति इस समाज की ईकाई है , इसलिए स्वस्थ समाज की संरचना के लिए प्रत्येक व्यक्ति की आदतों और  सामाजिक व्यवहार का विश्लेषण करते हुए हम उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए सुझाव देते हैं , योजनायें बनाते हैं . सर्वप्रथम हम जानेंगे कि व्यक्ति कितने प्रकार के होते हैं . हमारे इस समाज में इन दिनों  चार प्रकार के व्यक्ति पाए जाते हैं जिनका वर्गीकरण हम निम्न लक्षणों के आधार पर करेंगे .

ये चार प्रकार के व्यक्ति इस प्रकार हैं ---

1..... वे जो हमेशा अपना और दूसरों का भला चाहते हैं , उनके लिए दुआएं करते हैं .

2.... वे जो तब तक दूसरों का भला करते हैं जब तक कि दूसरा उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाए .

3.... वे जो अपने फायदे के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं .

4.... वे जो बिना किसी अपने फायदे के दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं ...

आप सब सामाजिक  प्राणी है ,  आस पास व्यक्तियों के इन प्रकारों से आपका मेलजोल होता ही होगा ,  अब आप सब मुझे इन चारों प्रकार के व्यक्तियों के उदहारण देकर समझाएं .

संता -बंता ने आपस में विचार- विमर्श कर चार उदाहरण खोज ही निकाले . दोनों एक साथ ही उठ खड़े हुए . मगर मुश्किल ये कि एक बार में एक ही व्यक्ति को बोलने की इजाजत थी . दोनों की खींचतान में फंसे गुरूजी बोल पड़े ,"  ऐसा करों , तुम दोनों बारी- बारी से अपनी बात कहो ".

संता सर खुजाता हुआ खड़ा हुआ ...." सर जी , पहला उदहारण तो मेरा ही ले लो ....मैं किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता , सबके भले के लिए प्रार्थना करता हूँ " .

अच्छा बंता ,अब तुम बताओं .... उपदेशक ने पूछा.

बंता भी अपनी सीट से उठा ..."  सर जी , दूसरा उदहारण तो जी आप मुझे ही जान लो , जब तक कोई मुझे परेशान नहीं करता .... तब तक मैं भी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता ".

अब फिर से संता की बारी आयी ...." ओ जी , सर जी , आप तो सब जानते ही हो जी ...मेरा भाई ....जालिम सिंह .....जहाँ उसको अपना फायदा नजर आ जाता है ....तो दूसरों को परेशान करने में पीछे नहीं हटता " .

अब बारी आई  चौथे उदहारण की . इस बार उपदेशक ने कहा कि तुम दोनों साथ मिल कर इसका एक उदहारण पेश करो ....

दोनों एक साथ बोल पड़े ...." लो जी , ये कौन सी मुश्किल है ....वे जो बिना अपने किसी फायदे को दूसरों को तकलीफ पहुंचाते है ...वो तो हैं जी...जी ...जैसे कि हिंदी ब्लॉगर और जी यह मामला जेंडर निरपेक्ष है ."

उपदेशक मन ही मन भयभीत हुआ . जो इतने  होशियार बन्दे रहे क्लास में , हर सवाल का जवाब ऐसी होशियारी से दिया ते मेरे उपदेश कौन सुनेगा मगर ऊपर से प्रसन्नता का प्रदर्शन  करते हुए मीठे  स्वर में कह उठा -- शाबास , जब तुम व्यक्तित्व के बारे में इतना कुछ जानते हो तुम्हे  प्रशिक्षण की जरुरत ही नहीं है ...मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है . जाओ और दूसरों को प्रशिक्षित करो.



रविवार, 3 मार्च 2013

चाँद को देखो जी ....



सर्दियों में खिडकियों से ताक झांकी कर लेने वाला चाँद या  गर्मियों में छत पर टहलते चौदस और पूर्णिमा का चन्द्रमा जाने कितनी बार किस- किस तरह  न मोह लेता है . 
हलकी बहती ठंडी हवा , दूर तक शांत माहौल और उस पर   धीमी आवाज़ में रेडियो पर बज रहे  रात का समां  झूमे चन्द्रमा , खोया -खोया चाँद , ये हवा ये रात ये चांदनी जैसे गीतों का सम्मोहन दूर बचपन से लेकर बुढ़ापे की और बढ़ते जस का तस है . मोहक वातावरण की खुमारी में बस ख़ामोशी से सुनते  इन गीतों के साथ ओस की बूंदों सा भीगता मन  अम्बर के  जाने किस रहस्यमय लोक में भ्रमण कर आता है। 

चाँद अपने आप में विशिष्ट है . नाम में भी  स्त्रीलिंग या पुल्लिंग का भेद नहीं .. शशि , इंदु  है तो  सुधांशु , हिमांशु , मृगांक, मयंक भी . श्रापित हो  शिव के सर चढ़ उन्हें शशिधर बनाता है. स्वयं घटते- बढ़ते संदेसा भी देता है . कुछ भी स्थिर नहीं , ना सुख , ना दुःख ...सुख गया तो दुःख भी जाएगा  ! अँधेरी रातों को जगमग करता एक चन्द्रमा सितारों के घने झुरमुट पर भारी है .  बुझे मनों  में भ्रम या आस जो कहे जगाये रखता है . अमावस की रात कितनी लम्बी हो , पूर्णिमा भी होगी ! 
बदली कितनी घनी हो , फाड़ कर आसमान का सीना झलक दिखला देता है अक्सर! 

किसी प्रिय ने चाँद के हाथों अपने प्रियतम को संदेसा भेजा  तो कोई बहन भाई की राह तकते चाँद को उसे राह दिखने की फ़रियाद करती है . 
किसी ने माशूक को कहा चाँद  तो किसी का लाल हो गया उसका चाँद . किसी भूखे पेट बच्चे को रोटी सा नजर आया चाँद तो किसी का मामा बन गया . कितने गीत लिखे गए , तस्वीरें ली गयी , चित्र बनाये गए , परंतु वह खूबसूरती आंकी ना जा सकी . 

यह तो हुई भावुक दिलों , संवेदनशील कलम या मन की दास्ताँ .  खुश होकर कुछ देर गा ले इंसान -  आजकल पाँव जमीन पर नहीं पड़ते मेरे . 
कल्पना या खवाबों की उड़ान में बेशुमार विचर  आये मन मगर भावुकता से परे एक कठोर धरातल भी है जिसपर हर इंसान को चाहे /अनचाहे पैर टिकाने ही पड़ते हैं . आखिर तो हम इंसान हैं . पक्षी तो है नहीं कि पर फैलाये आसमानी बादलों को निहारते तो कभी गर्दन झुक कर नीचे पृथ्वी के नदी , झरने ,पहाड़ों को निरखते  मीलों  उड़ते रहो . थक जाओ तो कही किसी पेड़ , मकान , तारों की छत पर दो मिनट सुस्ता  लिए और फिर वही उन्मुक्त उड़ान .  

चाँद को करीब से देखने की चाहत में विज्ञान ने भी क्या नहीं किया . बरसों बरस  दूरियां आंकी , अनुमान लगाते  गणनाएं की  जो जान लें की कितनी दूरी है इस चाँद और हम इंसान के बीच . दूरबीन से न हुआ तो टेलिस्कोप लगा कर देख लिया .और जब देखा तो कितने भरम टूटे होंगे ...

कि  चाँद की धरती तो बड़ी उबड़- खाबड़ है . बड़े गड्ढे हैं वहां . चाँद से पृथ्वी को देखे तो वह भी चाँद सी ही नजर आये जिसे पृथचन्दा कहते हैं यानि की इसी अन्तरिक्ष में हमारी धरती भी किसी के लिए चाँद सी है . वह " किसी "  अभी हम सबसे अनजाना है हालांकि किस्से कहानियों में जाना- पहचाना भी !

कुछ वैज्ञानिको ने तो यह शोध भी किया कि  यदि चाँद से धरती की  दूरी कम हुई तो धरती पर प्रलय जैसी स्थितियां हो सकती है . माने कि चाँद टंगा  रहे वही  दूर , हम पृथ्वीवासियों के  लिए यही ठीक है .
 चाँद पर पहुंचे एक चंद्रयात्री का अनुभव  तो यही बताता है कि कोई नहीं , पहुंचे चाँद पर तो ठीक था . वहां से देखने वाले दृश्य साफ़गोई से तो न बताते वह भी तब जब की प्रोग्राम लाईव हो . 

लेखकों /कवियों / कवयित्रियों के लिए अत्यधिक आवश्यक है की विज्ञान और विज्ञान की छात्रों /छात्राओं की ओर से आँखें मूंदे ही रहे वर्ना चाँद से उनकी तुलना पर क्या न भुगतना पड़  जाए . चाँद से तुलना के खतरे हजार  है .

जाहिर है किसी खगोलशास्त्री को आपने कह  दिया कि मुखड़ा चाँद सा है तो वह लट्ठ लेकर ना पीछे पड़  जाए .  बन्दे/बंदी  ने टेलिस्कोप से चाँद को बहुत करीब से बार -बार देखा है. आपकी तारीफ़ को जाने क्या समझ ले!

वर्षों पुरानी पत्नी  (पुरानी तो पत्नी ही होगी न , प्रेमिका तो होने से रही  ) को चाँद कह दिया तो तड़ से जवाब मिल जाए  - जानती हूँ तुम्हारे इरादे . अब वहीँ आसमान में  टंगे देखना चाहते हो पर मैं तुम्हारी यह चाहत पूर्ण नहीं होने दूँगी . यही रहूंगी तुम्हारी छाती पर मूंग दलते !

कई समझदार टाईप के पति /प्रेमी गा -गा कर कहते नजर आते हैं - चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था  .  
सोचो तो... जो बेचारी भोली -भाली माशूकाओं को असल बात पता चले तो  के जी , सानू चंगी तरह मलुम है साडी इन्नी बढिया  किस्मत कित्थों  हुई " अपणी किस्मत में तो तू ही सी  !!  
समझ भी लो  उनके दुख/ दर्द को . 😝

साहित्यकार और कवि के लिए चाँद महबूबा , माशूका , प्रेमिका  कुछ भी हो , कुछ भी कहें परंतु
किसी भूखे गरीब को चाँद दिखा दिया तो उसे चाँद में रोटी- सा गोल होने के अतिरिक्त क्या नजर आयेगा ..... 

सोमवार, 17 मई 2010

ईस्ट इंडिया कंपनी जी , आओ नी सा ....पधारो म्हारा और म्हारा पड़ोसिया का देस

परदेसी थारी ओल्यु घणी आव , पागल मन न कुण समझाव

(परदेसी तुम्हारी बहुत याद आती है , पागल मान को कौन समझाए )

ईस्ट इंडिया कंपनी जी , आओ नी सा ....पधारो म्हारा और म्हारा पाड़ोसिया का देस

क्यूंकि म्हाका माजना अस्या ही है ...
(
क्योंकि हम इसी लायक हैं )

जो विष बीज थे बार गया अब फल फूलां से लद गा । आर देखो तो सही थांकी बोयोडी फसल कसी लहलहा गयी है थानको बोयोड़ो आर थे ही काट ले जाओ.... ...थे तो दो टुकड़ा करना की ही सोच्या , अब तो इत्ता टुकड़ा होण लग्या है कि थांकी तो पौ बारह हो जायेगी ...सौ सालं री गुलामी करार थे म्हाँकी असी आदत बिगाड दी कि अब तो म्हें स्वतंत्र रह ही कोणी सका ...

(जो विषबीज आप बोकर गए थे , अब फल और फुल्लों से लड़े पेड बन चुके हैं ...आकर देखो तो सही , आपकी बोई हुई फसल कैसी लहलहा गयी है ।, आपका बोया आप ही काट कर ले जाएँआपने तो दो टुकड़े करने की ही सोची थी अब तो इतने टुकड़े होने लगे हैं कि आपकी तो पौ बारह हो जाएगीसौ साल की गुलामी देकर हमारी आदत इतनी बिगड़ दी कि अब हम स्वतंत्र रहने के काबिल ही नहीं रहे )

म्हाका माथा कोई परेशानी ना पड़ा तो म्हें एकजुट हो ही कोणी सकां ...थे आओगा ....थान्को लगायोड़ो बोर्ड जगामगाव्गो " इंडियंस एंड डॉग्स र नोट अलावुड" थोडा हंटर चालोग , नीलां की खेती करोगा , जद तो जार थोड़ी हलचल होवागी , पण अबकी थान अत्ति परेशानी कोणी उठानी पडसी ....क्यूंकि एक होर लड़ने मरण जस्सी अबो हवा तो अब म्हांका रही कोणी ...तो फेर अत्तो कईं सोच्नो लाग्यो हा ....आर थांकी सत्ता संभालो ....

(जब तक हमारे सर पर मुसीबत नहीं हो , हम हिन्दुस्तानी एक जुट नहीं हो सकते , आप आयेंगे , पके लिखे बोर्ड जगमगायेंगे " इंडियंस एंड डॉग्स नोट अलावुड" , नील की खेती होगी , हंटर चलेंगे , तब जाकर थोड़ी हलचल मचेगी , मगर अब आपको इतनी परेशानी नहीं होगी हमें तोड़ने में , क्यूंकि एक होकर लड़ने मरने जैसे आबो हवा अब हमारे देश में नहीं रही , तो अब इतना क्या सोचना है , आकर अपनी सत्ता संभालें )

हाँ ...पहलि का जियां हीरा जवाहरात का लालच में मत आजो ...अब अठा कोणी लाधगो , कचरों घनो ही मिल जावगो , भाषा , बोली , जात , धरम का झगडा सा उपज्यो कचरों , भर भर थाल ले जाओ थांका देस.....

(हाँ , पहले की तरह हीरे जवाहरात के लालच में यहाँ मत आना , यहाँ नहीं मिलेगा , भाषा जाति, धर्म बोली के झगडे से उपजा कचरा ही मिलेगा , जिसे बेशक आप थाली भर कर ले जाएँ अपने देश )

ओर अबका आण म तो अब तो थाना रास्ता ढूंढना की जरुरत भी कोणी पडसी ....देस क हर कोना पर थांका आण की जगह बना राखी ह ... जो रास्तो थानों आसान लाग आपकी मर्जी स चुन र आ सको हो ...म्हांका सिपाही खुद थान इज्ज़त स्यूं लेर सिंहासन तक पहुंचा देसी ..बस अब ज्यादा मत सोचो , आ ही जाओ , पण म्हास पेली म्हांका पाड़ोसियाँ का आजो ....

(और इस बार आपको आने के लिए रास्ते ढूँढने की जरुरत नहीं होगी देश के हर कोने में आपके लिए रास्ते खुले हैं , अपनी मर्जी से जो आसान लगे, चुन लें , हमारे गद्दार साथी खुद आपको इज्ज़त से सिंहासन तक पहुंचा देंगे , बस अब ज्यादा मत सोचो , ही जाओ , पर हमसे पहले हमारे पड़ोसियों के आना )




(पहली बार राजस्थानी भाषा में लिखने का प्रयास किया है .... वैसे इतना मुश्किल भी नहीं है इसे पढना मगर रंजनाजी और अदाजी के सुझाव के अनुसार देवनागरी में भी लिख दिया है )

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

जनता को गुलाम बनाये रखने के खास उपाय ...दिमाग के घोडे दौडाएं ...कुछ उपाय आप भी बताएं

क्या आप जानते हैं ...अंग्रेज मासूम भारतीयों (पाकिस्तानी और बंगलादेशी भी गिन लीजिये ) पर पूरे 100 वर्षों तक निरंकुश शासन किस प्रकार कर पाए ...इस दौरान उनकी रणनीति क्या थी ...
भारत के इतने बड़े भू- भाग और जनता को गुलाम बनाये रखने के लिए अंग्रेजों ने एक ख़ास मूल मंत्र अपनाया था ...उनका मानना था ... " इनको भूखा रखो ...नंगा रखो ...बस इन्हे सम्मान दो ..." । उनकी शासन व्यवस्था को चलाने के लिए भेजे गए अफसरों को खास तौर पर इस रणनीति को अपनाने की ताकीद की जाती थी ....बाद के वर्षों में इसमे "फूट डालो राज्य करो" का मंत्र भी जुड़ गया था ...अब इतने लंबे अरसे तक गुलामी की बेड़ियों में जकडे रहे ....अंग्रेजों का नमक खाया ...तो कुछ न कुछ उनके गुणों (!!) का अवशेष तो हम भारतीयों में रहना स्वाभाविक ही है ...अब इसके पीछे किस वैज्ञानिक का कौन सा फार्मूला लगेगा ...ये बताने जितनी अपने शैक्षणिक योग्यता नही है ...ये आप स्वयं सोचें ...हो सके तो हमें भी बताएं ...
अंग्रेज चले गए ...अपनी अंग्रेजियत और निरंकुश शासन चलाने के ....निरीह जनता को वर्षों गुलाम बनाये रखने के अपने मूल मंत्र उपहार में हमें दे गए ...कालांतर में इनका उन्नयन होता गया और मंत्र जुड़ते गए ...कुछ मंत्रो की बानगी यहाँ है ....


बेशक घंटो बिजली कटौती करें दरें बढायें

कूलर
एसी पर दाम घटाए

शिक्षा चिकित्सा गाँव गाँव उपलब्ध न हो
घर घर मोबाइल इन्टरनेट पहुंचाए
भले ही डीजल पेट्रोल के दाम बढायें
कारें मोटरसाईकिल सस्ती कराएँ

किसानों को देसी सस्ते बीज खाद पानी बिजली उपलब्ध ना हो
विदेशी कीटाणुनाशक बोरी भर सस्ती पहुंचाएं
कन्या भ्रूण हत्या पर रोक न लगा पायें
मिस इंडिया प्रतियोगिता जरुर कराएँ
आटा चीनी दाल राशन महंगा हो भले
सस्ती शराब जरुर उपलब्ध कराएँ
पंचायत नगरपालिका में अशिक्षित महिलाओं का प्रतिशत बढाये
प्रशिक्षित किरण बेदी को जबरन सेवानिवृति दिलाएं
भले लोकल बस मेट्रो के पास मंहगे कर दे
धार्मिक यात्रायें मुफ्त कराएँ
सैनिक रक्षा खर्चों में कटौती कर दे
सांसद विधायकों के भत्ते बढायें
पुलिस के लिए टूटी जिप्सी घटिया बाईक काफी हैं
जनता के नुमायिन्दों को लिमोजिन दिलवाएं

जनता की नब्ज दबाने को दिए हैं ये थोड़े से उपाय
कुछ अपना दिमाग दौडाएं
राजनैतिक दलों को और भी नए गुर सिखाएं
कुछ अपने भी विचार बताएं


आपके अनमोल विचारों और सुझावों का स्वागत और इंतज़ार है ....इनाम विनाम दिलाने जैसा हमारा आर्थिक स्तर नही है ...हम तो बस ये दुआ कर सकते हैं कि ....आपके उपायों और सुझावों पर राजनैतिक दलों की दृष्टि पड़ जाए ...शायद किसी दल के थिंक टैंक में आपका नाम जुड़ जाए...!!



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