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रविवार, 6 अक्टूबर 2013

गिरा अनयन नयन बिनु बानी.... शब्दों के चितेरे तुलसीदास


रामचरितमानस हिन्दुओं का एक प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ है। शारदीय नवरात्र के नौ दिनों में देवी भगवती /अम्बे की आराधना के  अतिरिक्त  रामचरितमानस के नवाह्न पारायण का भी विधान है। 

रामचरितमानस सिर्फ एक धार्मिक ग्रन्थ की भांति ही नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की  चमत्कृत कर देने वाला महाकाव्य /कृति के रूप में भी  उल्लेखनीय है।  तुलसीदास की काव्य प्रतिभा अलौकिक प्रतीत होती है ,  अब वह श्रीराम के अलौकिक रूप /शक्ति के प्रभाव /वर्णन के कारण है या प्रकृति प्रदत्त , यह राम ही जाने। 

अपनी सम्पूर्ण धार्मिक  , आध्यात्मिक  चेतना को एकत्रित कर सिर्फ प्रभु को सर नवाते इस अमूल्य कृति का पाठन करें , या एक सामान्य पाठक के समान  तुलसीदास की अभूतपूर्व काव्य प्रतिभा युक्त रोचकता और नाटकीयता  में  एक मर्यादित समाज की संकल्पना की मीठी झील की तरह रस के भंवर में गोते लगाये , प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा और मनसा पर निर्भर है।   

तुलसीदास अपनी   कृति में एक मर्यादित समाज में चहुँ ओर सुख शान्ति की कामना सहित  समाज में प्रत्येक संभावित  रिश्ते के लिए अत्यावश्यक मापदंड या जीवनदृष्टि निर्धारित  करते प्रतीत होते हैं।  समाजों में मानव के बीच पलने वाले प्रत्येक रिश्ते से जुडी भावनाएं , मानव मन के विभिन्न आयाम , गुण -अवगुण , चरित्र  , कार्य , कुछ भी तुलसीदास की दृष्टि और शब्दों से बाकी नहीं रहा।   उनके काव्य लेखन की विराट  प्रतिभा ने आधुनिक युग में भी मानव मन की किस दशा पर  उनके नेत्रों और शब्दों की धार को समाहित नहीं किया , कुछ शेष  नहीं रहा.

तुलसीदास जी ने शील और गुण के आदर्श प्रस्तुत करते हुए साबित किया कि अध्यात्म सिर्फ संन्यास या वैराग्य ग्रहण करना ही नहीं है , समाज में रहते हुए सामाजिक  जिम्मेदारियों को पूर्ण करते भी सन्यासी रहा  जा सकता है। समाज के कल्याण के लिए उच्च  आदर्शों और  मर्यादा की स्थापना करते हुए  दुष्टों  पर भी अपनी दृष्टि केन्द्रित करते हैं।  प्रजावत्सल राजा के सम्पूर्ण गुणों की मर्यादा तय करते हुए  भी साधारण व्यक्ति के सभी मनोभावों को विभिन्न चरित्रों के  भ्रातृत्व , पितृत्व ,  मातृत्व   माया , मोह , ममता , लोभ , ईर्ष्या , चुगलखोरी ,  आदि सभी गुणों -अवगुणों को शब्दों में चित्रित किया है।   
  
रामचरितमानस के  प्रथम सर्ग  बालकाण्ड में तुलसीदास  विभिन्न दृश्यों जैसे श्रीराम और उनके भ्राताओं  के जन्म ,स्वयम राज दशरथ और रानियों के साथ जनमानस की ख़ुशी , नगर की शोभा ,   बाल्यकाल की क्रीड़ायें , गुरुकुल के कठोर अनुशासित जीवन के लिए जाते पुत्रों से भावविह्वल माता -पिता , जनकनंदिनी सीता से श्रीराम का प्रथम दर्शन आदि  में चमत्कृत करती शब्दों की भाषा  से समस्त  मानवीय भावनाओं और  संवेदनाओं को उद्धरित करते हैं।  

बालकाण्ड में श्रीराम और सीता के प्रथम मिलन का दृश्य बहुत ही मनोरम बन पड़ा है।  अपने गुरु विश्वामित्र के निर्देशन में श्रीराम अपने भ्राता लक्ष्मण के साथ सीता  स्वयंवर में उपस्थित हैं। राम और लक्ष्मण  गुरु की पूजा अर्चना के लिए   बाग़ से फूल  चुनने पहुंचे ,   जनकनन्दिनी सीता भी सखियों के साथ बाग़ में सरोवर के नजदीक  गिरिजा मंदिर में पूजन के लिए आती है। तुलसीदास ने इन दृश्यों में शब्दों की सुन्दर चित्रकारी द्वारा राम और सीता के मनोभावों का मनोरम वर्णन किया है।  मानव रूप में जन्मे  राम मानव मन के किसी भी कोमल भाव से अछूते नहीं रहे , युवावस्था में भावी जीवनसंगिनी को निरखते राम के मन में प्रेम और क्षोभ एक साथ हिलोरे मारता है , वहीँ सीता भी भावी जीवनसाथी के रूप में राम की कामना के साथ पिता जनक के प्रण का स्मरण कर दुखी होती हैं। तुलसीदास के शब्दों में सीता के प्रथम दर्शन के बाद एकांत में चन्द्रमा से सीता के मुख की तुलना करते  किशोर /युवा मन की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं.

तुलसीदास शब्दों के चितेरे रहे.  शब्दों की  कारीगरी से मानव मन के विभिन भावनाओं का कुशल चित्रण करते हैं. तुलसीदास अपने शब्दों के भाव कौशल से किशोर हृदयों के प्रथम मिलन के विलक्षण मनोहारी दृश्यों की रचना करते हैं। स्वयं तुलसीदास के शब्दों में ही देखें … 

राम के सौंदर्य का बखान करती सखी कहती है 
"  गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।।
यानि वाणी बिना नेत्र की है और नेत्रों के वाणी नहीं है। 

कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही
कंकण (हाथों के कड़े), करधनी और पायजेब के शब्द सुनकर श्री रामचन्द्रजी हृदय में विचार कर लक्ष्मण से कहते हैं- (यह ध्वनि ऐसी आ रही है) मानो कामदेव ने विश्व को जीतने का संकल्प करके डंके पर चोट मारी है।

अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥

ऐसा कहकर श्री रामजी ने फिर कर उस ओर देखा। श्री सीताजी के मुख रूपी चन्द्रमा (को निहारने) के लिए उनके नेत्र चकोर बन गए.
शाब्दिक अर्थ है " नीमि (निमि पलकों के झुकने  को कहते हैं ) ने पलकों में रहना छोड़ दिया यानि  नयन खुले के खुले रह गए " . 
भावार्थ निमि जो जनक के पूर्वज रहे हैं , ने होश्राप मुक्त होने पर अपने रहने के लिए पलकों में स्थान माँगा था। चूँकि जनकनंदिनी सीता उनकी  पुत्री हुई , और मर्यदावश बेटी दामाद के मिलन को देखना  उचित नहीं माना जाता। इसलिए ऐसा भान हुआ कि राम और सीता के मिलन को देख निमि  पलकें छोड़ कर चले गए। 

देखि सीय शोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥

सीताजी की शोभा देखकर श्री रामजी ने बड़ा सुख पाया। हृदय में वे उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुख से वचन नहीं निकलते। (वह शोभा ऐसी अनुपम है) मानो ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता को मूर्तिमान कर संसार को प्रकट करके दिखा दिया हो।
जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥
सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥

जिसकी अलौकिक सुंदरता देखकर स्वभाव से ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है। वह सब कारण (अथवा उसका सब कारण) तो विधाता जानें, किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मंगलदायक (दाहिने) अंग फड़क रहे हैं।

सीताजी भी श्रीराम की छवि से चकित और मुग्ध हैं… 

थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥
अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥

श्री रघुनाथजी की छबि देखकर नेत्र थकित (निश्चल) हो गए। पलकों ने भी गिरना छोड़ दिया। अधिक स्नेह के कारण शरीर विह्वल (बेकाबू) हो गया। मानो शरद ऋतु के चन्द्रमा को चकोरी (बेसुध हुई) देख रही हो।

लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥

जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥

नेत्रों के रास्ते श्री रामजी को हृदय में लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजी ने पलकों के किवाड़ लगा दिए (अर्थात नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं)। जब सखियों ने सीताजी को प्रेम के वश जाना, तब वे मन में सकुचा गईं, कुछ कह नहीं सकती थीं।
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता॥
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥

जब सखियों ने सीताजी को परवश (प्रेम के वश) देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगीं- बड़ी देर हो गई। (अब चलना चाहिए)। कल इसी समय फिर आएँगी, ऐसा कहकर एक सखी मन में हँसी।

गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥

धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितुबस जाने॥

सखी की यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गईं। देर हो गई जान उन्हें माता का भय लगा। बहुत धीरज धरकर वे श्री रामचन्द्रजी को हृदय में ले आईं और (उनका ध्यान करती हुई) अपने को पिता के अधीन जानकर लौट चलीं।

देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।

निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥
मृग, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने सीताजी बार-बार घूम जाती हैं और श्री रामजी की छबि देख-देखकर उनका प्रेम कम नहीं बढ़ रहा है। (अर्थात्‌ बहुत ही बढ़ता जाता है)।

रात्रि के नीरव एकांत  में   प्रेम से वशीभूत हो चन्द्रमा के मुख से देवी सीता की तुलना करते मनन करते  हैं ....

प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥

बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥
(उधर) पूर्व दिशा में सुंदर चन्द्रमा उदय हुआ। श्री रामचन्द्रजी ने उसे सीता के मुख के समान देखकर सुख पाया। फिर मन में विचार किया कि यह चन्द्रमा सीताजी के मुख के समान नहीं है।
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥
खारे समुद्र में तो इसका जन्म, फिर (उसी समुद्र से उत्पन्न होने के कारण) विष इसका भाई, दिन में यह मलिन (शोभाहीन, निस्तेज) रहता है, और कलंकी (काले दाग से युक्त) है। बेचारा गरीब चन्द्रमा सीताजी के मुख की बराबरी कैसे पा सकता है?
घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥
कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥
फिर यह घटता-बढ़ता है और विरहिणी स्त्रियों को दुःख देने वाला है, राहु अपनी संधि में पाकर इसे ग्रस लेता है। चकवे को (चकवी के वियोग का) शोक देने वाला और कमल का बैरी (उसे मुरझा देने वाला) है। हे चन्द्रमा! तुझमें बहुत से अवगुण हैं (जो सीताजी में नहीं हैं।)।

किशोर मन की समस्त अवस्थाएं- सौन्दर्य , चकित , प्रेम , लज्जा , भय ,क्षोभ , अभिव्यक्ति में शेष कुछ न रहा ! 

अद्भुत … 

कुछ और यहाँ  भी ....

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

गरीबनवाज श्री रघुनाथ ...रामचरितमानस से कुछ चौपाईँयां ...

रामचरित मानस की ये चौपाईँआं अर्थ सहित लिखने का कोई प्रवचन देने जैसा उद्देश्य नहीं है ....बदलते समय और समाज के विकास के साथ हमारे जीवन और सामाजिक गतिविधियों , आचार -विचार, नैतिक मूल्यों में भी परिवर्तन होता है ...परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है , और कुछ हद तक इसका पालन भी होना चाहिए ...मगर जब जीवन से जुड़े हर क्षेत्र (राजनीति , खेल , मनोरंजन )में बुरा और ज्यादा बुरा में से चुनने लगे हैं ...तो धर्म को भी इसी बदली दृष्टि के साथ स्वीकार करना चाहिए ...जिस कार्य से जीवन में सहजता हो , वही किया जाए ...आँख मूंदकर लकीर पीटने जैसा ना संभव है , ना स्वीकार्य होना ही चाहिए ...

कुछ और मोती
...



उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करई सप्रीति ...

दुष्टों की यह रीति है कि वे उदासीन , शत्रु अथवा मित्र किसी का भी हित सुनकर जलते हैं यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह दास प्रेमपूर्वक उनसे विनय करता है ....

बंदउं संत असज्जन चरना दुखप्रद उभय बीच कछु करना
बिछुरत एक प्राण हरि लेही मिलत एक दारुण दुःख देहि

अब मैं संत और असंद दोनों के ही चरणों की वंदना करता हूँ , दोनों ही दुःख देने वाले हैं परन्तु उनमे कुछ अंतर कहा गया है ..वह अंतर यह है कि एक (संत ) से बिछड़ते समय प्राण हर लेते हैं , वही दूसरे (असंत ) मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं ...अर्थात संतों का बिछड़ना मृत्यु के समान दुखदाई है तो असंतों का मिलना भी इतना ही दुःख देने वाला है ....

उपजहिं एक संग जग माहिं जलज जोंक जीमि गुन बिलगाहिं
सुधा सुर सम साधू असाधु जनक एक जग जलधि अगाधू

संत और असंत दोनों ही जगत में एक साथ पैदा होते हैं पर कमल और जोंक की तरह उनके गुण भी अलग- अलग होते हैं। कमल दर्शन और स्पर्श से सुख देता है , किन्तु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही खून चूसने लगती है साधु अमृत के समान (मृत्युरूपी संसार से उबारने वाला ) और असाधु मदिरा (मोह , प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करने वाला ) के समान है दोनों को उत्पन्न करने वाला जगात्रुपी अगाध समुद्र एक ही है ...(शास्त्रों में समुद्रमंथन से ही अमृत और मदिरा दोनों की उत्पत्ति बताई गयी है )

भल अनभल निज निज करतूति लहत सुजस अपलोक बिभूति
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू
गुन अवगुन जानत सब कोई जो जेहिं भाव नीक तेहि सोई

भले और बुरे अपनी -अपनी करनी के अनुसार सुन्दर यश और अपयश संपत्ति पाते हैं अमृत , चन्द्रमा , गंगाजी , साधु , विष और अग्नि कलियुग के पापों की नदी अर्थात कर्मनाशा और हिंसा करने वाला व्याघ्र , इनके गुण-अवगुण सब जानते हैं , किन्तु जिसे जो भाता है , उसे वही अच्छा लगता है

खल अघ अगुन साधु गुन गाहा उभय अपार उदधि अवगाहा
तेहिं ते कुछ गुन दोष बखाने संग्रह त्याग ना बिनु पहिचाने

दुष्टों के पापों और अवगुणों और साधुओं के गुणों की कथाएं, दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं इसी से कुछ गुणों और दोषों का वर्णन किया गया है क्योंकि बिना पहचाने उनका ग्रहण अथवा त्याग नहीं हो सकता है

भलेउ पोच सब बिधि उपजाए गनि गुन दोष बेद बिलगाए
कहहिं बेद इतिहास पुराना बिधि प्रपंचु गुन अवगुण साना

भले - बुरे सभी ब्रह्मा के ही पैदा किये हुए हैं , पर गुण और दोषों का विचार कर वेदों ने उनको अलग - अलग कर दिया है वेद, इतिहास , और पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण - अवगुणों से भरी सनी हुई है

अस बिबेक जब देई बिधाता तब तजि दोष गुनहिं मनु राता
का सुभाऊ करम बरिआई भलेउ प्रकृति बस चुकई भलाई

विधाता जब इस प्रकार का विवेक (हँस का सा ) देते हैं तब दोषों को छोड़कर मन गुणों में अनुरक्त होता है काल -स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग (साधु ) भी माया के वश में होकर कभी -कभी भलाई से चूक जाते हैं ...

जो सुधरी हरिजन जिमि लेहिं लि दुःख दोष बिमल जासु देहिं
खलकरहिं भाल पाई सुसंगूमिटहिं मलिन सुभाउ अभंगू

भगवान् के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और दुःख दोषों को मिटाकर निरमल यश देते हैं , वैसे ही दुष्ट भी कभी -कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं , परन्तु कभी भंग होने वाला उनका मलिन स्वभाव नहीं मिटता है ...

लखि सुबेष जग बंचक जेऊबेष प्रताप पूजिअहिं ते
उघरहिं अंत होई निबाहूकालनेमि जिमि रावण रहू

जो ठग हैं , उन्हें भी अच्छा वेश बनाये देखकर बेष के प्रताप से जग पूजता है , परन्तु एक --एक दिन उनके अवगुण चौड़े (दोष जाहिर होना ) ही जाते हैं , अंत तक उनका कपट नहीं निभता जैसे, कालनेमि , रावण और राहू का हाल हुआ

कियेहूँ कुबेष साधु सनमानूजिमी जग जामवंत हनुमानू
हानि कुसंग कुसंगति लाहूलोकहूँ बेद बिदित सब काहू

बुरा वेश बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है , जैसे जगत में जाम्बवान और हनुमानजी का हुआ बुरे संग से हानि और अच्छे संग से लाभ होता है , यह बात लोक और वेद में हैं और सब जानते हैं ...


कुछ विशेष ...
गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी॥

भावार्थ:-वे प्रभु श्री रघुनाथजी गई हुई वस्तु को फिर प्राप्त कराने वाले, गरीब नवाज (दीनबन्धु), सरल स्वभाव, सर्वशक्तिमान और सबके स्वामी हैं। यही समझकर बुद्धिमान लोग उन श्री हरि का यश वर्णन करके अपनी वाणी को पवित्र और उत्तम फल (मोक्ष और दुर्लभ भगवत्प्रेम) देने वाली बनाते हैं

इस चौपाई में श्री रघुनाथ के लिए गरीबनवाज और सूफी हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह (अजमेर ) का गरीबनवाज के नाम से प्रसिद्द होना ...सुखद ही तो है .... !


प्रयत्न तो बहुत किया है कि सही शब्द ही लिखूं , फिर भी जो त्रुटियाँ रह गयी हैं , उनके लिए अल्पज्ञ मान कर क्षमा करें ...

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

रामचरितमानस से चुन लिए कुछ मोती...

नोट ...यह प्रविष्टि कोई प्रवचन या उपदेश नहीं है . रामचरितमानस को अर्थ सहित समझने का प्रयास मात्र है ...

रामायण और रामचरितमानस हिन्दू संस्कृति के प्रमुख ग्रन्थ हैं ...हर घर में इनका होना अनिवार्य है ...श्रीराम के जीवनवृत पर आधारित श्रद्धा से जुडी होने के कारण अतुलनीय पूज्यनीय तो है ही मगर ....सिर्फ धर्म की दृष्टि से ही नहीं , कविता या महाकाव्य के रूप में भी यह विलक्षण है ...अलंकारों का ऐसा सुन्दर उपयोग और किसी भी महाकाव्य या ग्रन्थ में नहीं है ....इसे पढ़ते हुए व्यकित चकित , चमत्कृत रह जाता है ...इतनी असाधारण प्रतिभा दैवीय ही हो सकती है ....

वाल्मीकि को संसार का आदि कवि माना जाता रहा है क्यूंकि उनके सम्मुख कोई ऐसी रचना नहीं थी जो उनका पथ प्रदर्शन कर सके ...इसलिए रामायण महाकाव्य उनकी मौलिक कृति है और इसलिए ही इस महाकाव्य को आदिकाव्य भी कहा जाता है ...
वाल्मीकि रामायण संस्कृत का महाकाव्य है जिसमे वाल्मीकि ने राम को असाधारण गुणों के होते हुए भी उन्हें एक मानव के रूप में ही चित्रित किया है ...जबकि रामचरितमानस में तुलसीदास ने राम को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में ...

चुन लाई हूँ कुछ मोती ...आप भी आनंदित हो लें ...

तुलसीदास की राम के विवरण और वर्णन में अपनी असमर्थता को प्रकट करती विनम्रता देखते ही बनती है...परन्तु कुटिल खल कामियों को हंसी- हंसी में विनम्रता के आवरण में कब तंज़ कर जाते हैं , पता ही नहीं चलता ....

मति अति नीच ऊँची रूचि आछी चहिअमि जग सुर छाछी ।।
छमिहहिं सज्जन मोरी ढिठाई सुनिहहिं बालबचन मन भाई ।।

मेरी बुद्धि तो अत्यंत नीची है , और चाह बड़ी ऊँची है चाह तो अमृत पाने की है पर जगत में जुडती छाछ भी नहीं है सज्जन मेरी ढिठाई को क्षमा करेंगे और मेरे बाल वचनों को मन लगाकर सुनेंगे

जों बालक कह तोतरी बाता सुनहिं मुदित मन पित अरु माता
हंसीहंही पर कुटिल सुबिचारी जे पर दूषण भूषनधारी

जैसे बालक तोतला बोलता है , तो उसके माता- पिता उन्हें प्रसन्न मन से सुनते हैं किन्तु कुटिल और बुरे विचार वाले लोंग जो दूसरों के दोषों को ही भूषण रूप से धारण किये रहते हैं , हँसेंगे ही ...

निज कवित्त कही लाग नीका सरस होई अथवा अति फीका
जे पर भनिति सुनत हरषाहीं ते बर पुरुष बहुत जग नाहिं

रसीली हो या फीकी अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती किन्तु जो दूसरे की रचना को सुनकर हर्षित होते हैं , ऐसे उत्तम पुरुष (व्यक्ति ) जगत में बहुत नहीं हैं ...

जग बहू नर सर सरि सम भाई जे निज बाढहिं बढ़हिं जल पाई॥
सज्जन सकृत सिन्धु सम कोई देखी पुर बिधु बाढ़ई जोई

जगत में तालाबों और नदियों के समान मनुष्य ही अधिक है जो जल पाकर अपनी ही बाढ़ से बढ़ते हैं अर्थात अपनी ही उन्नति से प्रसन्न होते हैं . समुद्र - सा तो कि एक बिरला ही सज्जन होता है जो चन्द्रमा को पूर्ण देख कर उमड़ पड़ता है ...


महाकाव्य लिखने में तुलसी की विनम्रता देखते ही बनती है ...जहाँ आप -हम कुछेक कवितायेँ लिख कर अपने आपको कवि मान प्रफ्फुलित हो बैठते हैं और त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाते ही भृकुटी तान लेते हैं , वहीँ ऐसा अद्भुत महाकाव्य रचने के बाद भी तुलसीदास खुद को निरा अनपढ़ ही बताते हैं ...

कबित्त विवेक एक नहीं मोरे . सत्य कहूँ लिखी कागद कोरे ...

काव्य सम्बन्धी एक भी बात का ज्ञान मुझे नहीं है , यह मैं शपथ पूर्वक सत्य कहता हूँ ...
मगर श्री राम का नाम जुड़ा होने के कारण ही यह महाकाव्य सुन्दर बन पड़ा है ..

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी . अहि गिरी गज सर सोह तैसी
नृप किरीट तरुनी तनु पाई . लहहीं सकल संग सोभा अधिकाई ...

मणि, मानिक और मोती जैसी सुन्दर छवि है मगर सांप , पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी सोभा नहीं पाते हैं ...राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर पर ही ये अधिक शोभा प्राप्त करते हैं ..

अति अपार जे सरित बर जून नृप सेतु कराहीं .
चढ़ी पिपिलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं..

जो अत्यंत श्रेष्ठ नदियाँ हैं , यदि राजा उनपर पुल बंधा देता है तो अत्यंत छोटी चीटियाँ भी उन पर चढ़कर बिना परिश्रम के पार चली जाती हैं ...

सरल कबित्त कीरति सोई आदरहिं सुजान ...

अर्थात चतुर पुरुष (व्यक्ति ) उसी कविता का आदर करते हैं , जो सरल हो , जिसमे निर्मल चरित्र का वर्णन हो ...

जलु पे सरिस बिकाई देखउं प्रीति की रीती भली
बिलग होई रसु जाई कपट खटाई परत पुनि ..

प्रीति की सुन्दर रीती देखिये कि जल भी दूध के साथ मिलाकर दूध के समान बिकता है , परन्तु कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है ) स्वाद (प्रेम )जाता रहता है ...

दुष्टों की वंदना और उनकी विशेषताओं का वर्णन बहुत ही सुन्दर तरीके से किया है ...
संगति का हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ...इसको भी बहुत अच्छी तरह समझाया है ..-

गगन चढ़इ राज पवन प्रसंगाकीचहिं मिलइ नीच जल संगा
साधु असाधु सदन सुक सारिणसुमिरहिं राम देहि गनि गारीं

पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वही नीच (नीचे की ओर बहने वाले ) जल के संग में कीचड़ में मिल जाती है ...साधु के घर में तोता मैना राम -राम सुमिरते हैं और असाधु के घर के तोता मैना गिन गिन कर गलियां बकते हैं ...

धूम कुसंगति कारिख होई लिखिअ पुरान मंजू मसि सोई
सोई जल अनल अनिल संघाता होई जलद जग जीवन दाता

कुसंग के कारण धुंआ कालिख कहलाता है , वही धुंआ सुन्दर स्याही होकर पुराण लिखने के काम आता है और वही धुंआ जल , अग्नि और पवन के संग मिलकर बादल होकर जगत में जीवन देने वाला बन जाता है ...

नजर और नजरिये के फर्क को भी क्या खूब समझाया है ...
सम प्रकाश तम पाख दूँहूँ नाम भेद बिधि किन्ह।
ससी सोषक पोषक समुझी जग जस अपजस दिन्ह॥

महीने के दोनों पखवाड़ों में उजियाला और अँधेरा समान रहता है , परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है . एक को चन्द्रमा को बढाने वाला और दूसरे को घटाने वाला समझकर जगत ने एक को यश और दूसरे को अपयश दिया ...



क्रमशः