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रविवार, 16 जून 2019

मुंबईनामा.....





जब हम छोटे थे. हाँ भई! हम भी छोटे मतलब बच्चे थे कभी. आज बड़े हो गये अपने बच्चों से कहो तो पेट पकड़ कर हँस ले यह कहते हुए कि इमेजिन ही नहीं होता कि आप लोग भी बच्चे थे.
मजाक में कही बात मगर गंभीर ही है. हम नहीं सोच पाते अपने बड़े बुजुर्गों के लिए कि उनका भी कभी बचपन , लड़कपन या युवावस्था भी रही होगी. माँ अचानक छोड़ गईं साथ तब सहानुभूति रखने वाले उम्र बताने पर कह देते चलो उम्र तो थी, नाती पोते , पड़पोते भी थे. मन कचोटता है स्वयं को मगर हमें तो कभी लगा ही नहीं.

हाँ तो जब हम छोटे थे तब मुंबई को मुख्यतः अमीरजादों और फिल्मी कलाकारों के कारण ही जानते थे.  छोटे से कस्बे में पत्र पत्रिकाओं द्वारा ही बाहर की दुनिया से जुड़े होते थे.
उन पत्र पत्रिकाओं विशेषकर फिल्मी पत्रिकाओं में इन सितारों   के भी फर्श से अर्श तक जाने के किस्से इस अंदाज में बयान होते कि सामान्य वर्ग से आये युवा भी सितारा बनने के लिए झोला उठाये चल देते थे. कुछ ही सफल होते और अधिकांश धोखे की कहानियों के पात्र बन जाते. मुंबई की बारिश और छोकरी, दोनों का भरोसा नहीं करना चाहिए. कब रास्ता बदल लें. यहाँ पेट भरना आसान है मगर घर मिलना नहीं. यही सुनते आये थे हमेशा।
शहरी क्षेत्र का विस्तार होते होते कहावतें किस्से और मान्यताएं भी बदलती ही जाते हैं. हमने जितना पत्र पत्रिकाओं से जाना था  उससे इस शहर और उसके बाशिंदों  की छवि ह्रदय हीन, मतलबपरस्त ही रही जहाँ किसी को किसी से कोई मतलब नहीं. आस पड़ोस में कौन रहता, क्या करता कोई जानना नहीं चाहता. दरअसल यहाँ लोगों की स्वयं के जीवन में इतनी भागदौड़ और उलझनें रहती हैं कि वह दूसरों के बारे में सोचे कब...मगर तीन वर्ष पहले जब मुंबई जाना हुआ तो यह भ्रम भी टूटा.
 राखी के दिन भरी दोपहर में अन्य विकल्प न होने के कारण  लोकल ट्रेन में जाने की जरूरत हुई . यूँ तो दोपहर में लोकल में इतनी अधिक भीड़ नहीं होती मगर राखी का दिन होने के कारण जबरदस्त भीड़ थी. एक ट्रेन मिस भी की मगर दूसरी भी वैसी ही लदी फंदी. भीड़ के धक्के से डब्बे में चढ़ तो गये मगर अंदर आगे बढ़ें कैसे.  अपने शहर में तो बस में भी चढ़ने का अभ्यास नहीं और यहाँ ऐसे फँसे कि लगा अंतड़ियां न पिचक जाये. जैसे तैसे धक्के खाकर पाँच छह कदम आगे बढ़ी. इतनी ही देर में दूसरा स्टॉप आ गया. भीड़ में कचूमर बना जा रहा था तभी एक स्त्री की तेज चीखती आवाज आई जो भीड़ को बुरी तरह हाथ और लात दोनों से धक्का दे कर आगे धकेल रही थी.
ट्रेन चलने पर जैसे-तैसे मुड़ कर देखा तो उसने अपनी बाहों से एक दूसरी स्त्री को घेर कर पकड़ा हुआ था जिसकी गोद में छोटी बच्ची भी थी. अधेड़ उम्र की उस स्त्री ने सीट पर बैठी सवारियों को उस बच्चे को गोद में लेने को कहा. कई हाथ आगे बढ़े. किसी ने बुरी तरह रोते बच्चे को गोद में लिया, किसी ने बच्चे की माँ केे पर्स को. अंदर सवारियां उस बच्ची को पुचकार कर चुप करा रही थीं , कोई अपनी बोतल से पानी पकड़ा रहा था, तो कोई टॉफी. थोड़ी -थोड़ी जगह बनाकर उस स्त्री को उसके बच्चे के पास पहुंचाया और एक लड़की ने उसके लिए अपनी सीट छोड़ दी. एक तरह से राहत की साँस लेती वह अधेड़ स्त्री अभी भी गेट के पास ही खड़ी थी कि अगला स्टॉप उसका ही था. जिस महिला पर चीखी थी जोर से, उसी से मुस्कुराते हुए कह रही थी  इतने छोटे बच्चे को लेकर चढ़ गई .बिल्कुल किनारे खड़ी थी कि ट्रेन चल पड़ी. मैं धक्का नहीं लगाती तो क्या करती.  मन धक सा हो गया. रोज कुछ न कुछ लोग गिरते हैं चढ़ते उतरते...
उस भीड़ में फँसे हुए भी मन एक प्रसन्नता से भर गया. भीड़ में तन्हा है कहीं तो कहीं सुरक्षित भी.
कान से सुने और आँखों से देखे में भी  कुछ तो फर्क होता है. वैसे देखने में भी आँखों को बस सीध में जो दिखता है, वही तो दिखता है. एक घटना से ही यह अनुमान भी लगा लेना कि धोखा होता ही नहीं, धोखे की पृष्ठभूमि तैयार करने जैसा ही है.
 इंस्टाग्राम पर हँसती मुस्कुराती तस्वीरों के पीछे का प्रत्यक्ष सन्नाटा हो कि लँगड़ी मारकर आगे बढ़ जाने वाले किस्से हों. इस शहर के धोखे की भी लंबी दास्तान दर्ज है दिल- दिमाग को झिंझोड़ती सी.
मगर फिर भी कुछ आकर्षण है इस शहर का. हवाओं में समुद्र के पानी की महक है तो जुबान पर उसके नमक का स्वाद भी. इसलिए लोग खींचे चले आते हैं आज भी सौ शिकायतें करते भी....
तभी तो  कहलाती है यह मायानगरी .


शुक्रवार, 14 जून 2013

पहचाना सफ़र अनजाने लोग .

सुपर फास्ट एक्सप्रेस तेजी से दौड़ती जा रही है . चलो दिल्ली की बदबू से तो छुटकारा  मिला .  सिकंदराबाद वाया दिल्ली के लिए दिल्ली पहुंचे तो बदबू के मारे बुरा हाल था , कभी सोचा नहीं था की दिल्ली इतनी बदबूदार होगी ...बस स्टैंड से लेकर रेलवे स्टेशन तक बदबू का साम्राज्य .... गलती शायद यह रही की हम हजरत निजामुद्दीन स्टेशन जाने के लिए मेन बस स्टैंड से पहले ही रुक गए  ....सड़कों से जैसे बदबू की भापें उठ  रही थी . स्टेशन पर भी यही हाल .  जब ट्रेन दिल्ली से रवाना  हुई तब जाकर इस बदबू से छुटकारा मिला .  घंटों माथा भन्नाया रहा . देश का दिल कही जाने वाली राजधानी में आम आदमी को इस बदबू में रहना होता है ?? !!

रेल  के रवाना होने पर ही ध्यान जाता है कि सहयात्री कौन है . छुट्टियाँ होने के बावजूद कोच ज्यादा भरा नहीं था . कुछ सीट्स खाली नजर आ रही थी.  शायद इंदौर या भोपाल से दूसरे यात्रियों का रिजर्वेशन था . कोच में नजर दौडाई तो हर तरफ लगभग एक ही उम्र के बच्चे कोई लैपटॉप तो कोई मोबाइल पर आँखें और अंगुलियाँ गडाए . पता चला चंडीगढ़ की किसी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र हैं जो छुट्टियों में घर लौट रहे हैं .

ये पीढ़ी अनोखी है . आस- पास की दुनिया से बेखबर  मगर मीलों और समन्दर पार की दुनिया से जुड़े हुए . एक तरह अच्छा ही है ज्यादा कायं कायं नहीं होगी.  इत्मीनान से उपन्यास पूरा होगा . 
मगर कहाँ .. अगर भाई बहन साथ में हो तो टांग खिंचाई और  सुपरफास्ट के स्लीपर कोच में हिचकोले के बीच  "लाइफ ऑफ़ पाई " नहीं पढ़ी जा सकेगी . यहाँ तो हलकी -फुलकी पत्रिकाएं या अखबार ही पलटे  जा सकते हैं।

सिर्फ एक ही छात्र ऐसा था जो चुपचाप अपना बैग  हाथ में लिए बैठा . थोड़ी हैरानी हुई.  ना मोबाइल हाथ में ना लैपटॉप बस ख़ामोशी से  क्रिकेट के दीवाने मेरे भाई भतीजे को सुन रहा था .
पूछ लिया मैंने - ये बच्चे तुम्हारे  साथ नहीं हैं ?

नहीं . हैं तो मेरी कॉलेज के .  हम सब जानते हैं एक दूसरे  को मगर ये जूनियर हैं .

इंजीनियरिंग के क्षेत्र में संभावनाओं पर आगे जानकारी देते हुए बताने लगा - 
बहुत कम्पटीशन है इस फील्ड में. आजकल कैंपस प्लेसमेंट होने का भी मतलब यह नहीं है कि  जॉब मिल गया . कई बार कॉल लेटर नहीं भी आते हैं . मेरे फादर का रेडीमेड गारमेंट्स का शोरुम है मगर मेरा इंटरेस्ट इंजीनियरिंग में है इसलिए उन्होंने मुझे रोका  नहीं .  माँ पापा की हेल्प करती है बिजनेस में . मैं आगे लाईफ में इसी लाईन में रिसर्च करना चाहता हूँ , आदि -आदि.  अपने भविष्य की योजना शेयर करता रहा .

मेरे हाथ में  उपन्यास   देखकर बोला - अच्छा नॉवेल है . इस पर फिल्म भी बन चुकी है . 
मैंने कहा - हाँ , इसकी समीक्षा मैंने पढ़ी है . मूवी की भी  मगर खुद पढना चाहती थी . अभी यहाँ कंसंट्रेट नहीं हो रहा है . 
बड़े स्नेह से कहने लगा  - आपको देखना है ये मूवी.   मेरे लैपटॉप पर है  तब मैंने ध्यान दिया था कि अपने साथियों से विपरीत इस बच्चे के हाथ में ना मोबाइल है  ना लैपटॉप है . भीड़ से अलग लगने वाले बच्चे . 
भाई -बहनों से पूछा तो सबने एक सुर में गर्दन ना में हिला दी .  मैंने कहा - रहने दो , मेरे बाल -बच्चे बोर होने लगेंगे .
 
 इतने लोगो के बीच आप से ही इतना घुल मिल कर बात करने वाले बच्चे से मिलना अच्छा लगा  . कॉर्नर की ऊपर की बर्थ पर एक बच्चे को अपने पर्स से माँ -पिता की तस्वीर निकाल कर देखते हुए चुपके से आँखों की कोर पोंछते भी देखा . कुछ देर बाद वही बच्चा किसी बुजुर्ग महिला को खिड़की से बाहर शहर के बारे में तेलगु में समझाते नजर आ गया .

पढाई के लिए घर से दूर रहने वाले ये बच्चे माता- पिता को मिस करते ही होंगे . जिस भी स्त्री में माँ की झलक दिखती हो , अपनापन हो जाता होगा .
 माँ होने का सुखद एहसास और अनजान बच्चों  के लिए भी माँ जैसी ही स्त्री होने का अहसास कई बार गर्व महसूस करवाता है . 
 हैदराबाद के चिल्कुर बालाजी  के बारे में बताते हुए कहने लगा  कि आप वहां जरुर जाना.   वहां मांगी हुई हर मन्नत पूरी होती है . परीक्षा से पहले और बाद में विद्यार्थियों का तांता लगा होता है वहां . मन्नत मांगते समय आवश्यक है कि ग्यारह परिक्रमा की जाए , मन ही मन प्रार्थना की जाए की मन्नत पूरी होने पर हम परिक्रमा पूर्ण करेंगे . 
उस बच्चे को याद करते हुए हैदराबाद पहुँचते ही मैंने सबसे पहले चिल्कुर बालाजी जाने का कार्यक्रम ही बनाया . देखकर अच्छा लगा कि भक्तों की भीड़ को नियंत्रित करने से लेकर प्रसाद बांटने तक मंदिर का पूरा प्रबंधन स्त्रियों के हाथों में है .  
ईश्वर हमारी और ऐसे जहीन बच्चों की सभी  सद्इच्छाये अवश्य  पूरी करें ! 

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

मथुरा , वृन्दावन धाम की यात्रा ....

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर सभी नहा धोकर तैयार हुए , मंदिर पहुंचे तब तक मंगला आरती तो हो चुकी थी ...मंगला झांकी के दर्शन कर के ही संतुष्ट होना पड़ा ...फिर चल पड़े हम मथुरा की ओर ...

मार्ग में अधिकांश मकान नीले और हरे रंग से पुते हुए थे ...
चरण मंदिर से शहर का विहंगम दृश्य
मथुरा में द्वारकाधीश जी के नजदीक पहुंचे ही थी कि एक गाईड पीछे पड़ गया ...गाडी के साथ चलते मंदिर और पार्किंग के बारे में बताने लगा ...जैसे तैसे उससे पीछा छुड़ा कर हम भागे मंदिर की ओर , वहां दर्शन में सिर्फ 5 मिनट बचे थे . ...मंदिर के विशाल प्रांगन में भीड़ -भाड़ होने के बावजूद दर्शन आराम से हो गए...प्रसाद लेकर बाहर निकाले तो ड्राईवर गाडी सहित फरार मिला ...वही गाईड फिर नजर आ गया ..." चलिए , आपकी गाडी उधर घाट के पास पार्क कर दी है " साथ -साथ चलते जयपुर में किस स्थान पर रहते हैं , क्या गोत्र है ...आदि आदि पूछने लगे ...हमने समझाया कि हम यहाँ पहली बार नहीं आये हैं , हमें सब पता है " मगर फिर भी वो साथ साथ ही चलता रहा ...विश्राम घाट पर सूर्योदय की छटा निराली थी ...पिछली बार के मुकाबले यहाँ सफाई भी थी ...
विश्राम घाट पर सूर्योदय

अब हमने रुख किया कृष्ण जन्मभूमि की ओर ....गाईड अभी भी साथ था ..आखिर कुछ रूपये देकर उन्हें हाथ जोड़ लिया ...इस तरह जबरन पीछे पड़ने के कारण गुस्सा तो बहुत आ रहा था मगर फिर ये भी लगा कि ये भी उनके रोजगार का ही एक हिस्सा है ....
कृष्ण जन्मस्थान पर भरी सेक्युरिटी का इंतजाम था ...चप्पे- चप्पे पर कमांडो अपनी गन संभाले हुए सतर्क ...कितनी अजीब बात है जिन प्रभु के चरणों में हम सुरक्षित होने जाते हैं , वे खुद भी इन गार्ड की निगरानी में हैं ...देश में हालात को देखते हुए ये जरुरी भी है मगर कचोटता बहुत है ...जन्मभूमि से बिलकुल सटी ही मस्जिद का हरा गुम्बद नजर आ रहा था ...कंस की कैद में वसुदेव और देवकी के पुत्र कृष्ण ने जेल में ही जन्म लिया था ... वह स्थान अब पूज्यनीय है ....महान लोंग अपने कर्मों से किसी भी स्थल को पूज्यनीय बना देते हैं , वरना कोई जेल में भी जाता है प्रभु के दर्शन करने ...:)कडकडाती सर्दी में भी सुबह इतनी जल्दी मंदिर में अच्छी खासी चहलपहल थी ....कश्मीरी युवकों का एक दल भी नजर आया , वहीँ एक विदेशी भक्त महिला भगवान् के सामने जोर -जोर से अपनी तकलीफ /शिकायत बयान कर रही थी " तुमने गीता में यह उपदेश क्यों दिया , मैं कल से अपना कर्म ही कर रही हूँ , सब मुझपर हँस रहे हैं " पता नहीं , पुजारियों और उस महिला के बीच क्या रार हो गयी थी ...
मंदिर से बाहर आते हुए वहां बनी दुकानों से हमारे साथ की अम्माजी ने काफी अपने पोते-पोतियों , बहू -बेटियों के लिए अंगूठियाँ , चेन आदि खरीदी ....मुझे भी याद आया , दादी की तीर्थयात्रा से लौटने पर उनसे मिलने वाली छोटी -छोटी भेंट के लिए हम कितने उत्साहित रहते थे ...कुछ समय बाद ही चाहे वे किसी काम की ना रहे ...लिखते हुए ही याद आया की माँ भी अभी मुंबई और सिर्धि साई बाबा की यात्रा पर हैं ...लगी होंगी बच्चों के लिए खरीददारी में ...

पागल बाबा के मंदिर की सातमंजिला संगमरमरी ईमारत लुभाती हैं मगर यहाँ सफाई व्यवस्था इतनी दुरुस्त नहीं है ...यहीं इलेक्ट्रोनिक झांकियां भी अपनी अव्यवस्था के बावजूद अच्छी लगी ...

पागल बाबा का मंदिर

बाँके बिहारी जी श्री कृष्ण ....हँसते हैं सब उनके खड़े होने के अंदाज़ पर ...की स्वाभाव का ही इतना बांका है की सीधे खड़ा ही नहीं हुआ जाता ...ये हमारे धर्म की विशेषता है की हम अपने ईश्वर के साथ मजाक कर सकते हैं , चिढ़ा सकते हैं और तो और गोद में भी खिला सकते हैं...

हमारा अगला पड़ाव था वृन्दावन का इस्कॉन टेम्पल ...मंदिर का निर्माण करने वाले स्वामीजी की समाधि पर फूल बने हुए है जिन पर चलते हुए " हरे कृष्ण हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे . हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे " कहना होता है ...बहार निकलते ही वे सज्जन मिल गए जिन्होंने राम -कृष्ण लिखे कार्ड हमें दिए थे जो हमें उन्हें वापस लौटाने थे ...मेरे आगे कड़ी बेटियों से उनकी शिक्षा के बारे में पूछा तो उन्हें ढेरों आशीर्वाद देते हुए वाही कार्ड उन्हें वापस देते हुए अपनी किताबों के बीच रखने का निर्देश दिया ...बच्चे महाखुश ...अब मुझसे मुखातिब होकर उन्होंने कहा ..." आप इनकी मम्मी हैं " मेरे हाँ कहने पर आशीर्वाद देते हुए बोले, "लक्की मॉम "...ख़ुशी के मारे मेरे पैर कहाँ रहते जमीन पर ....वरना ज्यादा समय यही सुनना पड़ता है " लान का एक छोरो हो जातो "(बेचारी के एक बेटा हो जाता )...:)
श्रीरंगनाथ मंदिर


वृन्दावन में ही भगवान् रंगनाथ एवं गोदाजी का मंदिर है ...यह वृन्दावन का सबसे बड़ा मंदिर है ...संयोग की ही बात है की धनुर्मास के पहले ही दिन इनका दर्शन लाभ प्राप्त हुआ ... मायके में श्रीवैष्णव धर्म का पालन किये जाने के कारण इस मास को उत्सव की तरह मनाया जाता रहा है ...ससुराल में यह सब छूट गया है इसलिए ऐसे प्रयोजनों पर अचानक घर या मंदिर पहुँच जाना बहुत सुख देता ...इस पवित्र मास में प्रत्येक सुबह विशेष प्रकार की खिचड़ी या खिरान्न का प्रसाद तो हमारी कमजोरी रहा है ....
यूँ तो मथुरा -वृन्दावन में हर गली में मंदिर हैं ...जितना दर्शन लाभ करो , कम है ...मगर हमने अपनी यात्रा यही रोकी और जयपुर के लिए रवाना हो गए ......

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

गोवर्धन परिक्रमा .........



बहुत समय से गोवर्धन परिक्रमा का कार्यक्रम टल रहा था ...कभी मौसम के कारण तो कभी परिक्रमा मार्ग पर चल रहे निर्माण कार्य से होने वाली असुविधा के कारण ..मगर पिछले दिनों कमर कस ही ली कि कुछ भी हो परिक्रमा तो करनी ही है ...इधर घुटनों में कुछ तकलीफ के कारण घबराहट थी कि इतना पैदल चलना हो भी पायेगा या नहीं ...कहाँ तो शहर में एक किलोमीटर भी पैदल नहीं चला जाता ,और कहाँ परिक्रमा मार्ग पर २१ किलोमीटर की पैदल यात्रा नंगे पैर ...एक तसल्ली थी कि रिक्शे में बैठ कर भी परिक्रमा दी जा सकती है ...यही सोचा कि अगर चला नहीं जायेगा तो फिर इसे ही आजमाएंगे ....साथ में एक बुजुर्ग महिला थी ...उनके जोशोखरोश को देखकर हमने भी हिम्मत कर ली ...पूजा पाठ बहुत ज्यादा नहीं करती हूँ मैं और ना ही अन्धविश्वासी हूँ मगर फिर भी खुद का इस कदर पैदल चल लेना मुझे स्वयं को आश्चर्यचकित कर देता है ....


जयपुर से गोवर्धन के मार्ग पर ज्यादा स्थान राजस्थान की सीमा में आता है , बीच में लगभग किलोमीटर का मार्ग उत्तर प्रदेश की सीमा में है , फिर से राजस्थान ....सड़क की बदहाली शुरू होते ही ड्राइवर ने बताया कि अब हम उत्तर प्रदेश की सीमा में हैं तो सबकी एक साथ हंसी छूट गयी ...जब बिहार की सदियों पुरानी खस्ता हाल सड़के सुधारी जा सकती हैं तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं हो सकता ....किससे पूछा जाए ये सवाल ... इस पूरे मार्ग पर सरसों के लहलहाते खेतों ने मन प्रसन्न कर दिया ...अच्छी सर्दी और इससे पूर्व होने वाली बरसात ने खेतों पर दूर दूर तक जैसे पीली चादर ही बिछा रखी है ...


राहत की बात ये हैं कि गोवर्धन पर्वत के चौडाई में होने वाले विस्तार को रोकने के लिए जालियां लगाकर पर्वत को सुरक्षित किया गया है ...यहाँ वन विभाग का कार्य संतोषजनक है ... कुछ स्थानों पर नील गाय भी नजर गयी ...

खैर ...गिरिराज धरण का नाम लेकर शुरू कर दी पैदल यात्रा ...परिक्रमा के पहले पड़ाव में गिरिराज मंदिर में गोवर्धन पर्वत के मुखारविंद पर दुग्ध अर्पण कर प्रारंभ की गयी यात्रा लगभग 11किलोमीटर की है , जबकि दूसरी परिक्रमा " राधा कुंड परिक्रमा " लगभग 10 किलोमीटर की ....पूरी परिक्रमा 8 के आकार में की जाती है .....एक पूरी परिक्रमा के बाद फिर से दूसरी जगह से प्रारंभ कर दूसरी परिक्रमा ...इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ दुग्ध अर्पण सिर्फ दोपहर तक किया जा सकता है...श्रृंगार के बाद यकीन करना ही मुशिकल हो जाता है कि यह वही स्थल है जहाँ सुबह दुग्ध अर्पण किया गया था ... परिक्रमा पथ पर यात्रियों की सुविधा के लिए काफी कार्य किया जा रहा है हालाँकि अभी बहुत अधिक सुधार की दरकार है ...
मुखारविंद स्थल को लेकर भी भिन्न मत हैं ...कुछ लोंग परिक्रमा के पथ पर आने वाले दूसरे स्थान को ही वास्तविक पूजा स्थल मानते हैं ...



परिक्रमा मार्ग पर दोनों ओर बनी चाय , नाश्ते उपलब्ध कराती सैकड़ों दुकाने यात्रियों के विश्राम स्थल का कार्य भी करती हैं ...

उनके साथ ही लगभग हर दुकान पर बजती कृष्ण राधा की धुन , मीरा के भजन, सहयात्रियों के जय श्री राधे का जयघोष वातावरण में एक अलग सी चेतना भर देते हैं ... साथ चल रही बुजुर्ग महिला का उत्साह और आत्मविश्वास देखने योग्य था....रास्ते में पड़ने वाले चरण मंदिर में जहाँ सीढिया नहीं है , उबड़ खाबड़ पत्थरों के बीच ही चढ़ना पड़ता है , हम टालना चाह रहे थे , वे बड़े उत्साह के साथ चढ़ गयी....कई बार बैठना पड़ा उन्हें और सांस फूलती रही , मगर उनके उत्साह में कोई कमी नहीं थी ....ऐसे प्रेरणास्पद व्यक्तित्वों का साथ हम सबमे ऊर्जा का संचार कर रहा था ...परिक्रमा पूर्ण होते रात गहरा गयी थी ....बिजली की व्यवस्था भी बहुत डगमगाई हुई थी ...ये गनीमत है कि शुक्ल पक्ष की एकादशी का चन्द्रमा अपनी पूर्ण आभा के साथ मार्गदर्शन कर रहा था ....परिक्रमा पूर्ण होते रात के लगभग बज गए थे ...पूजन के उपरांत विश्रामस्थल पर जाकर सबकी हालात ऐसी थी कि बस जहा जगह मिले वहीँ पसर जाए ....आरामदायक स्थान मिल गया फिर भी और सभी बिना खाए पिए लुढ़क लिए ...सुबह जल्दी उठकर मंगला आरती के दर्शन जो करने थे ...



क्रमशः