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शुक्रवार, 20 मार्च 2026

आओ री गौरैया!



पागलपंथी जैसा कुछ लिखा होगा. आज लगता है कि क्या सच ही वह समय पागलपंथी का था या अब!



कुछ पोस्ट पर  पढ़ने में आया कि आज( या कल?) गौरैया दिवस था. स्मरण हुआ कि कुछ वर्षों पूर्व घर इनसे गुलजार रहा करता था. एक दो ब्लॉग पोस्ट भी लिखी थी इन पर. 

पर इधर के दो चार वर्षों में गौरैया कहीं नजर न आ रही. पेड़ पौधे दाना पानी सब कुछ वैसा है पर गौरैया नहीं. आजकल मैना मी कम दिखती है. बस कबूतरों की भरमार है. जिनके आतंक से बचने के लिए ज्यादातर लोगों ने कबूतर जाली लगवा ली है और दाना पानी रखना भी बंद कर दिया है.

 जाली लगने से छोटी चिड़िया भी नहीं आ पायेगी . सिर्फ इसी सोच ने अब तक बालकनी को खुला रखा है. पर सब तरफ बंद दरवाजे कबूतरों को हमारे दर पर धक्का देते हैं जैसे. शायद जल्दी ही अपनी बालकनी को भी कबूतर जाली से ढ़कना पड़े.  फिर कहीं आस रहती है कि यदि गौरैया आई तो बाहर से ही लौट जायेगी!

पिछले चार वर्षों में तो दिखी नहीं पर इंतजार है!


https://vanigyan.blogspot.com/2013/05/blog-post.html?m=1

 https://vanigyan.blogspot.com/2019/04/blog-post.html?m=1

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

इक बंगला बना न्यारा.....






कल सुबह किसी कार्य से घर से बाहर जाना हुआ. शाम तक वापस लौटी तो बाहर बरामदा बड़े तिनकों, नीम की ताजा पत्तियों और फूलों, धागे के छोटे, लंबे टुकड़े आदि से भरा पड़ा था. कल ऐसी कोई आँधी भी नहीं थी कि कचरा उड़ कर इस प्रकार इकट्ठा हो जाये. चीं चीं की आवाज सुनकर उपर देखा तब सब माजरा समझ आया. उपर गणेश जी के आले में तिनके मुँह में दबाये चिड़िया रानी नीड़ के निर्माण में लगीं थीं. पर्याप्त स्थान न होने के कारण बड़ी मेहनत से लाये उसकी निर्माण सामग्री इधर उधर गिर रही थी. मुझे यह भी लगा कि आले में स्थित गणपति को नुकसान न हो. बिटिया को आवाज लगाई . उसने प्लास्टिक और टेप की सहायता से आला पैक कर दिया. परंतु चिड़िया का चोंच में तिनके लिए आना जाना चलता रहा. माता पुत्री का मन विचलित होता रहा . एक अपराध बोध - सा था कि हम नन्हींं चिड़िया को उसके नीड़ को निर्माण करने में बाधा पहुँचा रहे. सोचा कि अमेजन से बर्ड हाउस मँगवा कर लगा दूँ ताकि इनको भटकना नहीं पड़े हालांकि हम जानते हैं कि वे अपनी इच्छानुसार ही स्थान तय करती हैं . ऑनलाइन ऑर्डर करने पर भी एक सप्ताह तो कम से कम लगना ही था. तब तक यह चिड़िया क्या करेगी!
आखिरकार उपाय सूझा. गत्ते का एक पुराना कार्टून मिल गया जिसको सँभालकर रखा था किसी आर्ट वर्क के लिए. उसमें कुछ बड़े दो गोल छिद्र कर दिये. बालकनी की ग्रिल में बाँधने के लिए रस्सी नहीं मिली तो पूजाघर में रखी मोली को काम में लिया. उपलब्ध होता तो रंगीन कागज लपेट इसे सुंदर/ आकर्षक बना लेती . 
जैसे तैसे बाँध तो दिया , अब चिड़िया को तुरंत उसमें कैसे बुलाया जाये!  नीचे बिखरे हुए तिनके तुरंत फुरंत घोंसले में ऐसे लटकाये कि चिड़िया को बाहर से दिखता रहे. हालांकि चिड़िया के लिए बर्ड फीडर लगा रखा है और दिन भर उनका आवागमन लगा रहता है. फिर भी इस चिड़िया को इस घोंसले तक पहुँचाने के लिए उसके आसपास चावल, बाजरा और ज्वार  के थोड़े से दाने बिखेर दिये . एक बरतन में अलग से पानी भी उसके पास रख दिया.  सिर्फ दस मिनट में ही चिड़िया को तिनके सहित वहीं मंडराते देखा तब खुशी का ठिकाना नहीं था. कल से उन्हें उड़ उड़ कर तिनके लाते , जमाते देख बड़ा सुकून मिल रहा. ईश्वर करे इस घर में उसके नन्हे मुन्ने सुरक्षित रहें, खेले कूदें और फिर उड़ना सीख फुर्र हो जायें....प्रार्थनाओं में आप भी शामिल हो सकते हैं...

इस बड़ी सी दुनिया में बसी अपनी छोटी सी दुनिया और उसमें भी उस चिड़िया को अपने नीड़ का निर्माण करते देख अत्यंत प्रसन्नता हो रही जैसे किसी का उजड़ता घर बसा दिया हो. पक्षियों  की दुनिया कितनी अलग है मगर कितनी अपनी भी. हम स्वयं घर बसाते हैं मगर हमारी उसी गृहस्थी में किसी और को अपना घर बसाते देख प्रसन्न होना कम ही होता है.  वैसे तो पक्षी भी अपने घोंसलों में किसी और को फटकने नहीं देते मगर घोंसले बनाने का उनका उद्देश्य बच्चोँ को जन्म देना और उन्हें उड़ना सिखाना ही होता है. पंख सक्रिय होते ही उड़ जाते हैं बच्चे और फिर चिड़िया भी अपने उस घोंसले में वापस नहीं आती शायद. देखा नहीं कभी मैंने. पाश्चात्य संस्कृति जितनी ही आधुनिक है पक्षियों की जीवनशैली भी....
क्या पश्चिम में भी पक्षियोंं का जीवन इसी प्रकार चलता है. क्या विषम पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण वहाँ उनके घर स्थाई होते हैं  या वहाँ भी निश्चिंत और उन्मुक्त उड़ान ही भरते हैं कल की चिंता छोड़ कर ....

बुधवार, 3 जून 2015

और कुछ न कर सके पर शोर तो मचाया ही .......

एक दोपहर रसोई में घुसते हुए  बाहर खुलने वाले जाली के दरवाजे से बेटी को बाहर के मेन गेट से किसी चीज का तेजी से गमलों की तरफ़ बढने की एक झलक सी दिखी. उत्सुकता लिये दरवाजा खोल कर बाहर जाने का उपक्रम किया मगर पुनः साँप साँप  चिल्लाते लौट पडी. एकबारगी मुझे यकीन नहीं हुआ कि उसे कोई भ्रम हुआ होगा. एक बार खुली गैलरी में कागज के डब्बे के पीछे गिरगिट के तेजी से  छिप जाने से गोहिरा का भ्रम हो गया था जो बडी मशक्कत के बाद दूर हुआ था.
खैर. कहाँ है कहती हुई गमलों की तरफ़ कदम बढाया तो तीन चार आकार में कुछ बडी सी चिडिया उन्हीं गमलों को घेर कर अपनी चोंच से प्रहार करती दिख पडी.
पहले तो ख्याल आया कि यह नन्ही चिड़िया साँप का क्या कर लेगी  मगर फिर उनकी चुस्ती फुर्ती ने समझा दिया। एक तो वे समूह में थी और शोर मचा रही थीं।  चिड़ियों से और कुछ न हुआ मगर शोर मचाया ही।  यह शोर  सावधान  कर ही देता हैं।  प्रकृति इंसान को सारे सबक भी स्वयं ही सिखाती है।  हर कमजोर से कमजोर व्यक्ति में कुछ न कुछ सामर्थ्य होता ही है और इसी दम पर वह अपना अस्तित्व बचाये रख सकता है।


  यह चिडिया भी नई सी ही हैं हमारे इलाके में. इधर एक वर्ष में ही नजर आने लगी है. गौरैया के रंग जैसी मगर आकार में कुछ बड़ी  अकसर  गमलों के पौधों और बडे पेड़ों  पर उधम मचाते कीट पतंगो को अपनी चोंच में दबाये या पानी भर कर रखे पात्र में स्नान ध्यान करती सी दिख जाती हैं. ये कभी भी एक अकेली नहीं आती बल्कि तीन चार के समूह में होती हैं।  कई बार इनकी घुन्नी सी लाल आंखों और चोंच में अटके कीट पतंगों को देख कर बच्चे इसे शिकारी चिडिया कहने लगे हैं.
जब गमलों की ओर थोडा झुक कर देखा तो निरीह अवस्था में सिकुडा सा साँप  नजर आ गया. थोडी देर उन गमलो को पार कर अपनी चोंच से भेद देने की असफल कोशिश करती रहीं मगर साँप उसी तरह कोने में सिकुडा पडा रहा. जब थक हार कर वे उड़ गईं तब जाकर उसने अपना आकार फैलाना शुरू किया जैसे भरपूर अंगडाई ले रहा हो और तभी हमें होश आया कि साँप कुतुहल का विषय नहीं विषैला भी  हो सकता है.
घबराहट के मारे कुछ सूझा नहीं. पेड़ पौधों की आड़ में जाने कहाँ छिप जाये. इस लिये उस पर नजर रखते हुए पडोसी परिवार  को आवाज लगाई कि उनकी ओर वाली दीवार पर पाइप से पानी डालें और इधर हम बाल्टी भर पानी ले बैठे. दोनों तरफ़ से पानी की बौछार से परेशान गुस्से और खीझ में बिलबिलाता हुआ दरवाजे को पार कर उससे सटी छोटी सी बगिया में घुस कर अनार के  पेड़ पर चढ कर निश्चिंत बैठ गया जैसे वहाँ बैठ कर हमारी बेचैनी के मजे ले रहा हो.
पेडो के झुरमुट में साँप का बैठे रहना चिंता का विषय होना ही था.
इस बीच वन विभाग में कार्यरत भाई को फोन कर पूछा कि अब क्या किया जाये . भाई ने एक NGO का नंबर देकर उनसे सम्पर्क करने को कहा. फोन मिला कर उनसे कहा कि साँप पकडने के लिये जल्दी आयें।  तब उधर से एक व्यक्ति आश्चर्य मिश्रित हकलाहट में पूछ रहा था कि पहले आप यह बताओ कि आपको यह नंबर किसने दिया.  हमने कहा कि  दिया तो हमारे भाई ने ही है जो इसमें क्या हो गया।
इस पर वह भाई की पूछताछ करने लगा कि वह कौन हैं , क्या करते हैं।
जब हम पूछे कि आप यह पूछताछ क्यों कर रहे तब  उधर से जवाब आया कि यह Women Empowerment NGO का नंबर  है.
उस समय दिमाग में चिंता साँप की थी मगर जब बाद में इस संयोग पर सोचा तो हँसी के दौरे पड़ गये. अगला व्यक्ति क्यों बौखलाया यह भी  समझ आ गया।
भाई को दुबारा फोन किया और उसे सारा माजरा बताया।  भाई ने बताया कि दोनों नंबर साथ ही लिखे थे तो शायद गलती से दूसरा नंबर दे दिया।  इस गलती में कितनी बड़ी गफलत हो जानी थी।  कहीं  उस NGO  ने साँप पकड़ने को व्यंग्य में ले लिया होता तो क्या होता।  बाद में यही सोच कर खूब मुस्कुराये हम।
दुबारा सही नंबर लेकर फिर फोन मिलाया।   वहां फोन करने पर मौजूद व्यक्ति ने साँप  का रंग , लम्बाई आदि पूछ कर सूचना दी कि हालांकि यह साँप विषैला नहीं है मगर आप उससे दूर रहे और निगरानी रखें। साथ ही यह जानकारी भी कि यह स्वयंसेवी संस्था स्वयं साँप  पकड़ने का कार्य नहीं करती बल्कि साँप पकड़ने वालों से संपर्क कर उन्हें भेजती है।  इसके लिए उन्हें धन भी देना पड़ेगा।  जब साँप सर पर हो तो धन की कौन सोचता है।  हमने कहा आप भेजो तो , हम पैसे दे देंगे।  थोड़ी देर बाद उनका दुबारा फोन आया कि हमारा आदमी तीस से चालीस मिनट में आयेगा तब तक आप साँप  पर निगरानी रखें।  पेड़ पर चढ़े साँप की इतनी देर निगरानी कोई आसान कार्य है!  जाने कब उतरकर किधर चल दे मगर साहस बंधा हुआ था कि हमलोग पांच छह जने थे जो बारी बारी उसका ध्यान रख सकते थे।
तब तक यहाँ से गुजर रहे दो व्यक्ति माजरा जानने आ गये।  उन्होंने कहा कि हम अपने तरीके से पकड़ लेंगे इसे।  फिर जैसे तैसे उसे पकड़ा गया  और उन लोगों को पैसे देकर विदा किया गया।
सब कार्यक्रम संपन्न हो चुकने के बाद NGO  से दुबारा फोन आया कि हमारा आदमी बीस मिनट में आप तक पहुँच जाएगा।  हमने भी कह दिया कि अब उनको आने की जरुरत नहीं , काम हो चुका  है।

मंगलवार, 7 मई 2013

चुन चुन करती आई चिड़िया ....


खाने पीने का इंतजाम देखा तो घर ही बसा लिया

ग्रीष्म की हर नयी सुबह उगता सूरज नया -सा दिखता है . नव आशा ,नव उमंग , नव उत्साह .  शीतल मंद बयार के साथ सब कुछ धुला साफ़ सुथरा शांत स्निग्ध . ऐसे में हर सुबह की मीठी नींद पक्षियों के कलरव से टूटे तो आस पास एक दिव्य  खुशनुमा सकारात्मक परिवेश से  गदगद मन प्रकृति के समक्ष नतमस्तक हो उठता है . 

गौरैया दिवस पर अर्चनाजी ने पेशकश की गौरैया की  तस्वीर साझा करने की .  ढेर सारी तस्वीरें खींच डाली गौरैया की .फुर्तीली चिड़िया गैलरी के क्लीनिंग एरिया में पीछे जालियों के बीच से भी  बड़े आराम से भीतर चली आती हैं . उस दिन फोटो खींचते ध्यान ही नहीं रहा कि पुराने  स्टोव और मटकी की आड़ में घास फूस इकठ्ठा कर अपनी कुशल इन्जिनीरिंग का नमूना दिखाती चिड़िया अपने  नीड़ के निर्माण में  लगी हुई हैं .

अभी यही कोई एक सप्ताह पहले खिड़की से चिड़िया की मधुर चहचहाहट तीखी कर्कश सी लगने  लगी तो जाकर देखा कि आखिर माजरा क्या है . कई बार बिल्ली मौसी की लुक छिपी वाली पदचाप या अन्य पशु पक्षियों को आसपास भांप कर ये इसी प्रकार  चीखती रहती है . हालाँकि जाली और शीट से कवर होने के कारण बड़े पक्षियों का भीतर आना तो संभव  नहीं  मगर एकाध बार पास पड़ोस में सांप , गोइरा  ,नेवला होने की खबर चौकन्ना रखती है . देर तक इधर उधर कुछ नजर नहीं आया मगर चिड़िया और चिड़ा  जाली से चिपके लगातार चीं चीं मचाये हुए थे . अचानक फर्श  पर नजर आ गयी एक छोटी सी चिड़िया ..
तो यह बात है .  माँ चिड़िया अपने बच्चे को शायद उड़ना सिखा  रही थी  मगर पंख पूरे खुले नहीं होने के कारण उड़ नहीं पाया और  नीचे फर्श पर उतर आया या कौन जाने अपने परों पर ही उठा लाई हो उसे सैर कराने . जब तक इनके बच्चे उड़ना ना सीख  जाए  कभी - कभी इन्हें भी जरुरत होती है चारदीवारी से घिरे बसेरे की . हर थोड़ी देर में चिड़िया अपनी चोंच में खाना भर लाती और उस छोटे से बच्चे के मुख में खिलाती . चिड़ा तो बस निगरानी ही करता रहता  जैसे ही कोई दूसरी चिड़िया उनके पास आने की कोशिश करती दोनों चोंच मार कर उसे भागने पर मजबूर कर देते . और हम जाली के पास खड़े बैठे इस नज़ारे को देखते रहे . आखिर खड़े कब तक रहते . इनकी चहलपहल हमें सारे काम छोड़ कर यही टिकने को मजबूर जो कर रही थी . खैर , हमने भी एक प्लेट में पानी और कुछ खाने का इतंजाम कर दिया ताकि चिड़िया को ज्यादा भागदौड़ ना करनी पड़े . दूसरे दिन सुबह आँख खुलते ही छोटी चिड़िया के दर्शन को भागे तो आज उनके साथ एक और छोटी चिड़िया थी . हद तो तब हुई जब तीसरे दिन एक और तीसरी चिड़िया भी उनके कुनबे में शामिल हो गयी . अब घर का काम काज कौन करता . 
हम माँ बेटियां बस सारे दिन चिन्नी , मिन्नी और गिन्नी (हमने तो इनके नाम भी रख दिए  ) की तीमारदारी , अवलोकन  और तस्वीरें खींचने में व्यस्त . कपड़ों का ढेर इकठ्ठा हो गया क्योंकि वाशिंग मशीन चलाने  पर इनको परेशानी हो सकती थी . करते भी क्या . पूरी गैलरी पर इनके परिवार का कब्ज़ा जो हो गया था . 
माँ चिड़िया का बार बार उड़ना , हर थोड़ी देर में चोंच में खाना  भर खिलाना और यह भी याद रखना कि  अब किस बच्चे को खिलाने की बारी है . पिता चिड़े  का तार से लटके,  जाली से चिपके इनकी निगरानी और सुरक्षा के प्रति चौकस सवधान रहना .  कभी कभी हरी या सूखी दूब चुन लाना और मादा चिड़िया का उस पर चीखना ...
बेटी बोली - माँ शायद ये गुस्सा कर रही है चिड़े  पर . क्या मेरे बच्चे इस सूखी  ख़ास पर रहेंगे  :) . कितना भी खाना -पानी सामने रखा हो , उसमे से खा ले मगर थोडा बहुत अपनी  मेहनत का लाये बिना भी। इनको  चैन नहीं .
.
अक्सर  नारियों की सोशल कंडिशनिंग पर बात होती है मगर इन पक्षियों की जीवन प्रक्रिया के अवलोकन से यही खयाल आता रहा कि अपने बच्चों या परिवार के लिए खाने पीने का इंतजाम करना , ममता से भर कर खिलाना  यह सिर्फ सोशल कंडिशनिंग नहीं है . भला  कौन सिखाता है मादा चिड़िया  को  अपने बच्चों का इस तरह ध्यान रखना . पिता चिड़े  को उनकी सुरक्षा के प्रति सावधान और सतर्क  रहना .  मनुष्यों में भी यह प्रकृति प्रदत्त ही अधिक है जैसे पक्षियों में हैं .

अपने घर के भीतर उनके लिए एक छोटा सा घर बन जाने और उनके लिए खाने पीने का इंतजाम कर मन कितना संतुष्ट और  प्रफुल्लित हुआ. शब्दों में समझाना संभव नहीं और इस आत्मसंतुष्टि की मात्रा को नापने का कोई यन्त्र भी नहीं  ! 

अब तक एक चिड़िया उड़ चुकी है . एक नहीं रही और एक छोटी सी चिड़िया अभी भी आँगन में इधर उधर फुदक रही है , शायद कल तक वह भी उड़ जायेगी . 

कितना प्रेम से ही पालते हैं ये भी अपनी संतानों को मगर बिना शर्त . कोई अपेक्षा नहीं . जैसे ही उड़ना सीख जायेंगे इन्हें छोड़ जायेंगे , जानते हुए भी !  
हम मनुष्यों ने इनसे उड़ना तो सीखा , मगर बिना शर्त प्रेम क्यों नहीं  !! 

इनकी अठखेलियों के बीच मन में अनगिनत विचार आते रहे .सोचती रही हमसे इस छोटी सी चिड़िया का बसेरा ही नहीं उजाड़ा गया बल्कि उनके रहने खाने पीने की सुरक्षित व्यवस्था में मन लगा रहा . 
आखिर कैसे लोग मनुष्यों के बसेरे उजाड़ कर सुकून की नींद ले पाते हैं  ? उन्हें नींद कैसे आ पाती है , वे खुश कैसे रह सकते हैं , रह पाते हैं ...कैसे!!!

मन में विचार आया कि क्यों ना सम्पूर्ण मानव जाति के लिए कुछ समय मनुष्यों के लिए पशु पक्षियों की सेवा और अवलोकन अनिवार्य कर दिया ( है न पागलपंथी )  , शायद कुछ मन बदले उनका ... 

शायद !!!!       



गुरुवार, 21 जनवरी 2010

मेरे घर की खुली खिड़की से .....



मेरे घर की खुली खिड़की से
अलसुबह
जगाता है मुझे
चिड़ियों का कलरव गान.....

ठिठोली कर जाती है
रवि की प्रथम किरण
अंगडाई लेते कई बार.....



पूरनमासी का चाँद भी
झेंपता हुआ सा
झांक लेता है बार -बार....

झर-झर झरते पीले फूल
देते हैं दस्तक
खिडकियों पर कई बार.....



मीठी तान छेड़ जाती है
मदमस्त हवा
चिलमन से लिपटकर बार-बा....

खिडकियों से ही नजर आती है
कुछ दूर ...बंद खिड़कियाँ ..
हवेली की ऊँची दीवार......


सुबह-शाम
देख कर उन्हें
सोचती हूँ
कई बार ....

ऊँचे जिनके मकान होते हैं
छोटे कितने उनके आसमान होते हैं ....



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वसंत आया मेरे घर की छोटी सी बगिया में ....